भारतीय रिजर्व बैंक आज अपनी द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा के निर्णयों की घोषणा करने जा रहा है। मौद्रिक नीति समिति की तीन दिवसीय महत्वपूर्ण बैठक के समापन के बाद आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा सुबह 10 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से केंद्रीय बैंक के फैसले की जानकारी देंगे। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और उससे उत्पन्न महंगाई के दबाव के बीच आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि आरबीआई करीब साढ़े तीन साल के अंतराल के बाद रेपो दर में बढ़ोतरी का कदम उठा सकता है।

यदि केंद्रीय बैंक रेपो दर में वृद्धि का निर्णय लेता है, तो इसका सीधा प्रभाव बैंकों से ऋण लेने वाले करोड़ों ग्राहकों पर पड़ेगा। रेपो दर वह ब्याज दर होती है जिस पर वाणिज्यिक बैंक आरबीआई से धनराशि उधार लेते हैं। इस दर में वृद्धि होने से बैंकों के लिए कोष की लागत बढ़ जाती है, जिसे वे होम लोन, ऑटो लोन और पर्सनल लोन जैसे ऋणों पर ब्याज दरें बढ़ाकर ग्राहकों पर स्थानांतरित कर देते हैं। इस कदम से आम नागरिकों की मासिक किस्त का बोझ बढ़ना तय है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की बात करें तो आरबीआई ने अंतिम बार फरवरी 2023 में रेपो दर को 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 6.50 प्रतिशत किया था। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इसके बाद वर्ष 2025 में दरों में चार बार में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती की गई, जिससे वर्तमान में रेपो रेट 5.25 प्रतिशत के स्तर पर है। हालांकि, हाल के आंकड़ों के अनुसार खुदरा महंगाई बढ़कर अगस्त में 4.82 प्रतिशत हो गई है, जो जुलाई में 4.45 प्रतिशत थी। सरकार ने आरबीआई को खुदरा मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत पर सीमित रखने का आधिकारिक लक्ष्य दिया हुआ है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका और जापान जैसे प्रमुख विकसित देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों में हाल ही में की गई बढ़ोतरी ने भी भारतीय रिजर्व बैंक पर दरों में वृद्धि करने का दबाव बढ़ाया है। हालांकि विश्लेषकों की राय में मतभेद हैं, जहां एक बड़ा वर्ग 0.25 प्रतिशत की वृद्धि और कड़े नीतिगत रुख की उम्मीद कर रहा है, वहीं कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रीय बैंक तत्काल दरें बढ़ाने से बच भी सकता है। आज सुबह घोषित होने वाला यह निर्णय देश की आर्थिक दिशा और उपभोक्ताओं की जेब दोनों के लिए बेहद निर्णायक सिद्ध होने वाला है।