लखनऊ: शहर के विभूति खंड में एक प्रीमियम कामर्शियल टावर के शानदार शीशे वाले दफ्तर में एक साइबर फ्रॉड नेटवर्क चल रहा था। साइबर अपराधियों का यह आफिस किसी कॉर्पोरेट कंपनी के दफ्तर से कम नहीं था।

समिट बिल्डिंग की 11वीं मंज़िल पर चल रहे इस नकली इंटरनेशनल कॉल सेंटर ने पिछले छह महीनों में अमेरिकी लॉ इन्फोर्समेंट एजेंसियों के नाम का उपयोग करके अमेरिकियों को ठगा। साइबर अपराधियों के इस रैकेट ने अमेरिकी नागरिकों को शिकार बनाकर हर दिन करीब 25 लाख रुपये कमाए। इस रैकेट के मेंबर कभी एफबीआई एजेंट, कभी अमेजन अफसर, कभी यूएस मार्शल और कभी ट्रेजरी अफसर की नकली पहचान का इस्तेमाल करते थे।

उत्तर प्रदेश में साइबर क्राइम के खिलाफ यह अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई है जिसमें पुलिस ने 119 कर्मचारियों और मैनेजरों को गिरफ्तार किया है। इसकी जांच कर रहे पुलिस अधिकारियों के मुताबिक यह आम अपराधी गिरोह नहीं, बल्कि पेशेवर तरीके से चलाया जा रहा साइबर फ्रॉड रैकेट है।

सूर्य अस्त होते ही शुरू होती थीं काली करतूतें
लखनऊ के पुलिस कमिश्नर अमरेंद्र सेंगर ने बताया कि ‘सोलारिस सॉल्यूशन’ के नाम का यह कॉल सेंटर छह महीने से बिजनेस कॉम्प्लेक्स में दो ऑफिस यूनिटों में चल रहा था। यदि इसकी अनुमानित कमाई की पुष्टि हो तो इस रैकेट ने इन छह महीनों में 45 करोड़ रुपये कमाए होंगे। बताया जाता है कि यह साइबर अपराधी अमेरिका में कामकाज के समय के हिसाब से काम करते थे। वे सूरज ढलने के बाद शुरू करते थे। इस समय में अमेरिका में दिन होता है। कर्मचारी इंटरनेटबेस्ड कॉलिंग सिस्टम में लॉगइन करते थे। वे पहले से तय स्क्रिप्ट के मुताबिक बातचीत करते थे। इसमें टीम लीडर के मातहत एक सिस्टेमेटिक हायरार्की के अनुसार कामकाज की जिम्मेदारी तय थी।

कई आधुनिक डिवाइस की गईं जब्त
अमेरिकी ‘शिकार’ को फंसाने वाली टीम आतंकवाद और ड्रग्स के आरोपों का भय दिखाते थे। छापेमारी में पुलिस ने 103 लैपटॉप, 177 मोबाइल फोन, VoIP सिस्टम, आईबीम डायलर, डिजिटल स्टोरेज डिवाइस और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड जब्त किए हैं। इनकी जांच फोरेंसिक एक्सपर्ट कर रहे हैं।

जांच टीम ने बताया कि सिंडिकेट ने देश भर से ऐसे युवा ग्रेजुएटों को भर्ती किया था जो अच्छी अंग्रेजी बोल सकते हैं। इस रैकेट में असम, मेघालय, मणिपुर, नगालैंड, पश्चिम बंगाल, झारखंड, राजस्थान, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से हायर किया गया था। उन्हें हर महीने 30 से 40 हजार रुपये वेतन दिया जाता था। इनमें से ज्यादातर लोग गोमती नगर और विभूति खंड के आसपास किराए के मकानों में रह रहे थे।

कई कर्मचारी नहीं जानते थे कि वे धोखाधड़ी कर रहे
पुलिस का मानना है कि यहां काम करने वाले कई कर्मचारियों को शायद यह नहीं पता था कि वे एक धोखाधड़ी का काम कर रहे हैं और इसका पैमाना कितना बड़ा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि काम को अलगअलग स्पेशलाइज़्ड टीमों में बांटा गया था।