चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिका के दौरे पर हैं. ट्रम्प उनके स्वागत को सीधे एयरपोर्ट तक पहुंच गए. इससे दो महाशक्तियों के मिलन की गंभीरता समझी जा सकती है. यह बात तब और महत्वपूर्ण हो जाती है, जब दोनों ही देशों के रिश्ते सामान्य नहीं हैं. ऐसे में यात्रा के उद्देश्यों को लेकर भी दुनिया में चर्चाएं तेज हो गई हैं. कुछ सवाल भी सुर्खियां बन रहे हैं. मसलन, अमेरिका चीनी उत्पादों का बड़ा खरीदार है, लेकिन अमेरिका चीन से हथियार क्यों नहीं खरीदता? वह किनकिन देशों से हथियार मंगवाता है? आइए समझते हैं.

अमेरिका दुनिया का बड़ा हथियार निर्माता और निर्यातक है. वह अपने लड़ाकू विमान, मिसाइल, युद्धपोत, टैंक और सैन्य तकनीक खुद बनाता है. इसलिए उसे चीन से तैयार हथियार खरीदने की जरूरत बहुत कम पड़ती है. लेकिन इसका जवाब सिर्फ इतना नहीं है. इसके पीछे सुरक्षा, राजनीति, तकनीक और भरोसे से जुड़े कई कारण हैं. सबसे बड़ा कारण दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है.

चीन से हथियार न आयात करने की कई वजहें

अमेरिका और चीन एशियाप्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य और राजनीतिक ताकत बढ़ाने की कोशिश करते हैं. वे एकदूसरे को संभावित प्रतिद्वंद्वी मानते हैं. ऐसे में अमेरिका के लिए चीन से हथियार खरीदना अपने ही प्रतिस्पर्धी की रक्षा उद्योग को मजबूत करने जैसा होगा. गोपनीयता और साइबर सुरक्षा भी वजह है. आधुनिक हथियारों में रडार, संचार उपकरण, सॉफ्टवेयर और डेटा नेटवर्क जुड़े होते हैं. अमेरिका को चिंता हो सकती है कि किसी विदेशी हथियार या उसके पुर्जे के जरिए संवेदनशील जानकारी तक पहुंच बनाई जा सकती है.

यह जोखिम वास्तविक है या नहीं, हर मामले में अलग जांच की जरूरत होती है. लेकिन अमेरिकी रक्षा नीति में ऐसे जोखिमों को गंभीरता से देखा जाता है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। हथियारों के साथ जुड़ी तकनीकी निर्भरता भी एक वजह हो सकती है. कोई देश जब विमान, मिसाइल या रडार खरीदता है, तो उसे लंबे समय तक उनके पुर्जों, मरम्मत, सॉफ्टवेयर अपडेट और तकनीकी सहायता की भी जरूरत पड़ती है. अगर हथियार चीन से खरीदे जाएं, तो अमेरिका को जरूरी सेवाओं के लिए उसी देश पर निर्भर होना पड़ सकता है जिसे वह अपना रणनीतिक प्रतिस्पर्धी मानता है.

शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप

कानून और सरकारी खरीद के नियम भी आड़े

अमेरिका में रक्षा खरीद केवल व्यापार का मसला नहीं है. इसके लिए अन्य कई नियम लागू हैं. इनका उद्देश्य यह तय करना है कि कौन से देश, कंपनियां और उत्पाद सरकारी सैन्य कार्यक्रमों में भाग ले सकते हैं. चीन से जुड़े उत्पादों और कंपनियों पर अलगअलग अमेरिकी प्रतिबंध और सुरक्षा पाबंदियां भी लागू हो सकती हैं. इसलिए चीन से हथियार खरीदना केवल व्यापार का फैसला नहीं होगा. उसे कानून, सरकारी नियमों और राष्ट्रीय सुरक्षा की जांच से भी गुजरना होगा.

यूं भी अमेरिकी रक्षा विभाग घरेलू उद्योग को बढ़ावा देता है. इससे देश में रोजगार, उत्पादन क्षमता और तकनीकी कौशल बने रहते हैं. अमेरिका की बड़ी कंपनियां लड़ाकू विमान, मिसाइल, हेलीकॉप्टर, जहाज और रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स बनाती हैं. अपनी रक्षा जरूरतें घरेलू उद्योग से पूरी करने पर सरकार को डिजाइन, मरम्मत और उत्पादन पर अधिक नियंत्रण मिलता है.

फाइल फोटो.

क्या अमेरिका चीन से कुछ भी नहीं खरीदता?

अमेरिका चीन से कई चीजें खरीदता है, लेकिन हथियार और रक्षा उपकरणों की खरीद अलग विषय है. आम व्यापार में इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनों या अन्य उत्पादों की आपूर्ति सामान्य है. कुछ सामग्रियों या पुर्जों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में चीन की भूमिका भी है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अमेरिका चीन से तैयार सैन्य हथियार खरीदता है. रक्षा उद्योग को कच्चे माल और जरूरी घटकों की सुरक्षित आपूर्ति भी चाहिए. इसलिए अमेरिका चीन पर निर्भरता घटाने और वैकल्पिक स्रोत विकसित करने की कोशिश करता है. खास तौर पर उन सामग्रियों के मामले में यह चिंता बढ़ जाती है जो विमान, मिसाइल, रडार और अन्य सैन्य प्रणालियों में काम आती हैं. किसी एक देश पर अधिक निर्भरता होने से संकट के समय उत्पादन प्रभावित हो सकता है.

अमेरिका किन देशों से हथियार मंगाता है?

अमेरिका अपनी सैन्य जरूरतों का बड़ा हिस्सा देश के भीतर बनाता है. विदेशी हथियारों की खरीद आम तौर पर सीमित और जरूरत के अनुसार होती है. इसमें कभी तैयार उपकरण, कभी तकनीक और कभी किसी संयुक्त परियोजना के पुर्जे या सेवाएं शामिल होती हैं. इसलिए हथियार मंगाने का अर्थ हर बार पूरा हथियार विदेश से खरीदना नहीं होता. अमेरिका के करीबी सहयोगी देशों के साथ रक्षा सहयोग है. इनमें ब्रिटेन, इटली, जर्मनी, फ्रांस, इजरायल, स्वीडन और अन्य साझेदार शामिल हैं. सहयोग का रूप हर देश और परियोजना में अलग होता है.

कुछ मामलों में अमेरिका और उसके सहयोगी मिलकर हथियार बनाते हैं. कुछ में वे एकदूसरे से तकनीक या खास उपकरण लेते हैं. संयुक्त कार्यक्रमों में किसी एक देश में बने पुर्जे दूसरे देश के सैन्य उपकरणों में लगाए जा सकते हैं. इजरायल के साथ अमेरिका का रक्षा सहयोग व्यापक है. दोनों देश मिसाइल रक्षा और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में सहयोग करते हैं. ऐसे सहयोग को सीधे यह नहीं समझना चाहिए कि अमेरिका इजरायल से बहुत बड़ी मात्रा में तैयार हथियार खरीदता है.

कई बार तकनीक साझा होती है, संयुक्त विकास होता है या एक देश दूसरे को सहायता देता है. यूरोपीय देशों के साथ भी अमेरिका के रक्षा संबंध हैं. ब्रिटेन, इटली, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश सैन्य विमानों, जहाजों, इंजन, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य रक्षा क्षेत्रों में सहयोगी हैं. उदाहरण के लिए, बहुराष्ट्रीय विमान परियोजनाओं में अलगअलग देशों की कंपनियां पुर्जे बनाती हैं. ऐसे पुर्जे किसी अमेरिकी विमान में इस्तेमाल हों, तो इसे किसी देश से पूरा विमान खरीदने के बराबर नहीं माना जाता. स्वीडन जैसे देशों से अमेरिका कभीकभी खास श्रेणी के सैन्य उपकरण या तकनीक लेता है. लेकिन किस साल कौनसा उपकरण खरीदा गया, यह सरकारी अनुबंध और आधिकारिक आंकड़ों से तय होता है. खरीद के आंकड़े भी तैयार हथियारों, पुर्जों, तकनीकी सहायता और संयुक्त उत्पादन के बीच फर्क के कारण जटिल हो सकते हैं.

हथियारों के आयात के आंकड़े कैसे समझें?

हथियारों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को मापने के अलगअलग तरीके हैं. कुछ आंकड़े केवल बड़े पारंपरिक हथियारों को गिनते हैं. कुछ में छोटे हथियार, गोलाबारूद, पुर्जे या तकनीकी सहायता शामिल होते हैं. इसके अलावा कई रक्षा अनुबंध कई साल तक चलते हैं. हथियारों की खरीदफरोख्त पर नजर रखने वाली एजेंसी सिपरी की रिपोर्ट्स में बड़े पारंपरिक हथियारों के हस्तांतरण पर जानकारी मिलती है. लेकिन यह हर तरह के रक्षा व्यापार का पूरा हिसाबकिताब नहीं है. यूं भी अमेरिका पूरी दुनिया को खुद ही हथियार की आपूर्ति करता है. रक्षा बाजार पर उसका 43 फीसदी कब्जा है. सिपरी की सूची में अमेरिका टॉप 10 आयातकों की सूची में नहीं है. मतलब स्पष्ट है कि वह न केवल अपनी जरूरत का ज्यादातर हथियार खुद बनाता है बल्कि तैयार हथियार निर्यात भी करता है. कुछ कलपुर्जे जरूर वह आयात करता है.