हर साल सर्दियां शुरू होते ही दिल्लीएनसीआर में प्रदूषण को लेकर बहस तेज हो जाती है. हवा जहरीली होने लगती है तो पराली जलाने के मुद्दे पर सबसे पहले पंजाब का नाम चर्चा में आ जाता है. लेकिन अब सरकारी आंकड़े इस पुरानी बहस की बदलती तस्वीर सामने रख रहे हैं. मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार ने पिछले चार वर्षों में पराली जलाने की घटनाओं में बड़ी कमी दर्ज की है.

के आंकड़ों के अनुसार पंजाब में 2022 में पराली जलाने की 49,922 घटनाएं दर्ज हुई थीं, जो 2025 में घटकर महज 5,114 रह गईं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। और 2026 में अभी तक सिर्फ 474 घटनाएं भी सामने आई है. यानी लगभग 93 प्रतिशत से भी ज्यादा की गिरावट. यह बदलाव ऐसे समय में सामने आया है, जब पराली प्रबंधन देश की सबसे बड़ी पर्यावरणीय और कृषि संबंधी चुनौतियों में शामिल है.
एमपी में क्या है पराली जलाने की स्थिति
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के CREAMS कार्यक्रम द्वारा 6 अक्टूबर 2026 को जारी बुलेटिन के अनुसार, 15 सितंबर से 6 अक्टूबर के बीच सात राज्यों में पराली जलाने की कुल 287 घटनाएं दर्ज हुईं. इनमें सबसे ज्यादा 118 घटनाएं मध्य प्रदेश में दर्ज की गईं, जबकि पंजाब में 88, उत्तर प्रदेश में 65 घटनाएं सामने आईं.रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि के दौरान पंजाब में किसी भी दिन पराली जलाने की घटनाएं दहाई के आंकड़े तक नहीं पहुंचीं, जबकि मध्य प्रदेश में पांच दिन ऐसे रहे जब घटनाओं की संख्या दहाई में दर्ज हुई.
आंकड़े देखें तो मध्य प्रदेश में स्थिति और चिंताजनक दिखाई देती है. वर्ष 2025 में छह राज्यों में पराली जलाने की कुल 33,028 घटनाएं दर्ज हुई थीं. इनमें अकेले मध्य प्रदेश में 17,067 घटनाएं हुईं, जो कुल मामलों के 50 प्रतिशत से अधिक थीं. इसके मुकाबले उत्तर प्रदेश में 7,290 और पंजाब में 5,114 घटनाएं दर्ज हुईं. पंजाब में आए बदलाव के पीछे सरकार द्वारा किसानों को उपलब्ध कराए जा रहे विकल्पों की महत्वपूर्ण भूमिका है.
पंजाब में पराली प्रबंधन की नींति
मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में राज्य सरकार ने पराली प्रबंधन के लिए आधुनिक कृषि मशीनों पर भारी सब्सिडी देने की नीति अपनाई है. सरकार का जोर इस बात पर रहा है कि किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए केवल जुर्माने और कानूनी कार्रवाई पर निर्भर रहने के बजाय उन्हें खेतों में काम आने वाले व्यावहारिक साधन भी उपलब्ध कराए जाएं.
पंजाब के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां के अनुसार, 2026 के सीजन में किसानों ने 21,155 फसल अवशेष प्रबंधन मशीनें खरीदी हैं. इनमें सबसे अधिक 14,384 सुपर सीडर शामिल हैं. इसके अलावा 1,721 मल्चर, 1,346 हाइड्रोलिक रिवर्सिबल एमबी प्लाऊ, 1,123 जीरो टिल ड्रिल, 927 बेलिंग मशीनें और 874 स्ट्रॉ रेक खरीदी गई हैं. इन मशीनों के जरिए किसानों को पराली जलाए बिना अगली फसल की बुवाई करने और फसल अवशेषों का दूसरे कार्यों में उपयोग करने की सुविधा मिल रही है.
सरकार व्यक्तिगत किसानों को कृषि मशीनों पर 50 प्रतिशत से ज्यादा सब्सिडी दे रही है, जबकि कस्टम हायरिंग सेंटरों, किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों और पंचायतों को 80 प्रतिशत तक सब्सिडी उपलब्ध कराई जा रही है. इस व्यवस्था का उद्देश्य उन छोटे और सीमांत किसानों को भी आधुनिक मशीनों की सुविधा देना है, जो अपने स्तर पर महंगी मशीनें खरीदने में सक्षम नहीं हैं.
धान की कटाई और गेहूं की बुवाई
पंजाब के किसानों के सामने पराली जलाने की समस्या सिर्फ पर्यावरण से जुड़ी नहीं रही है. धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच बहुत कम समय मिलता है. खेतों से पराली हटाने में मशीनों, मजदूरी और परिवहन का अतिरिक्त खर्च आता है. छोटे किसानों के लिए यह खर्च उठाना आसान नहीं होता. ऐसे में पराली जलाने की घटनाओं को केवल किसानों की लापरवाही के रूप में देखना समस्या की वास्तविक परिस्थितियों को नजरअंदाज करना होगा.
भगवंत मान सरकार की नीति में इसी आर्थिक और व्यावहारिक चुनौती को ध्यान में रखते हुए मशीनों पर सब्सिडी, सामूहिक मशीन केंद्रों और जागरूकता अभियानों को महत्व दिया गया है. किसानों को पराली जलाने के नुकसान समझाने के साथ यह भी बताया जा रहा है कि फसल अवशेषों का इस्तेमाल मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने, अगली फसल की बुवाई और जैव ऊर्जा उत्पादन में किस तरह किया जा सकता है.
पंजाब सरकार ने वित्त वर्ष 202627 के लिए पराली प्रबंधन की 600 करोड़ रुपये की कार्ययोजना भी तैयार की है. इसके तहत कृषि मशीनों की उपलब्धता बढ़ाने, किसानों को तकनीकी सहायता देने और फसल अवशेषों के वैकल्पिक उपयोग को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया जा रहा है. सरकार की ओर से साझा जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2025 में भी CRM मशीनरी के लिए लगभग 395 करोड़ रुपये की सहायता वितरित की गई थी, जिससे हजारों किसानों और संस्थाओं को लाभ पहुंचा.
बायोगैस और बायोCNG परियोजना
पराली को किसानों की अतिरिक्त आमदनी का जरिया बनाने के प्रयास भी सामने आ रहे हैं. पंजाब में कुछ किसान पराली को इकट्ठा करके बायोगैस और बायोCNG परियोजनाओं के लिए बेच रहे हैं. संगरूर के एक किसान द्वारा लगभग 12 हजार क्विंटल पराली बेचकर करीब 16 लाख रुपये की आय अर्जित करने का उदाहरण भी सामने आया है. हालांकि ऐसी कमाई बाजार, पराली की मात्रा, परिवहन लागत और खरीदारों की उपलब्धता पर निर्भर करती है, लेकिन इससे फसल अवशेषों के आर्थिक उपयोग की संभावनाएं जरूर दिखाई देती हैं.
हजारों किसानों की भूमिका भी अहम
पंजाब में इस बदलाव का श्रेय केवल सरकारी मशीनरी को देना भी पर्याप्त नहीं होगा. राज्य के उन हजारों किसानों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जिन्होंने अपनी खेती के पुराने तौरतरीकों में बदलाव किया और पराली जलाने के बजाय आधुनिक मशीनों तथा वैकल्पिक प्रबंधन के उपाय अपनाए. किसानों के सहयोग के बिना किसी भी सरकारी योजना का खेतों तक प्रभावी ढंग से पहुंचना संभव नहीं है.
यही कारण है कि पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में लगभग 93 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट को सरकार की नीतियों और किसानों के साझा प्रयास के रूप में देखा जा रहा है. मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में शुरू किए गए कार्यक्रमों ने किसानों के सामने विकल्प बढ़ाए हैं और राज्य में पराली प्रबंधन को कृषि नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है.


