हर साल दशहरा त्योहार के दौरान, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया एक महाराजा के पारंपरिक कपड़े पहनते हैं और मराठा सांस्कृतिक परंपराओं में गहराई से जुड़े पुराने रीतिरिवाजों को निभाते हैं. वो महान मराठा योद्धा महाराजा महादजी सिंधिया के वंशज हैं. इन्होंने मुगल साम्राज्य पर मराठा शक्ति स्थापित की थी और पहले अंग्रेजमराठा संघर्ष के दौरान ब्रिटिश सेना के खिलाफ सैन्य सफलता हासिल की.

दशहरे के त्योहार पर शस्त्र पूजा करने की बहुत पुरानी और गहरी परंपरा है. इसके साथ ही, मराठा समाज को उनकी महान युद्ध विरासत, बेहतरीन सैन्य ताकत और सूझबूझ के लिए जाना जाता है. इसके दम पर उन्होंने ‘हिंदवी स्वराज्य’ बनाने के लिए बड़े प्रयास किए थे. स्कॉलर माइकल एच. ब्राउन ने सिंधिया मराठों को डॉक्यूमेंट किया, जिसमें ग्वालियर के शासकों को मूल रूप से सैन्य नेता बताया गया.
सेना में रही है महारत की खास विरासत
सिंधिया राजवंश ने सेना में महारत की एक खास विरासत बनाए रखी है, जो पेशावर की जीत और पानीपत की तीसरी लड़ाई से लेकर पहले और दूसरे विश्व युद्ध तक फैली हुई है, जिसके दौरान सिंधिया सेना ने बड़ा योगदान दिया. महाराजा जीवाजीराव एम. सिंधिया ने चार साल की उम्र में अपनी सेना की पढ़ाई शुरू की, और महारानी की अपनी पैदल सेना में एक रुपये रोजाना के वेतन पर एक प्राइवेट सैनिक के तौर पर काम किया.
उनके बारे में फील्ड मार्शल के.एम. करियप्पा ने लिखा था, दिवंगत महामहिम में घरेलू और सार्वजनिक जीवन दोनों में कर्तव्य और जिम्मेदारी की ऊंची भावना थी. निश्चित रूप से उनमें हास्य की अच्छी समझ की कमी नहीं थी. एक आदमी में गुणों का कैसा सुखद संयोजन, जो आजकल दुर्लभ भी है. उनका स्वभाव बहुत आकर्षक था. मेहमानों और बड़ेबुजुर्गों के प्रति उनका आदरसत्कार करने का तरीका और राजघराने के बड़े पद पर होने के बावजूद उनका सादा रहनसहन देखना सच में बहुत अच्छा लगता था. हम सभी के लिए एक बहुत अच्छा आदर्श.
हेनरी जॉर्ज कीन के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, महादजी सिंधिया को विश्वसनीय स्रोतों द्वारा ‘लगभग अद्वितीय क्षमता के राजनेता और सैनिक’ के रूप में वर्णित किया गया है. मराठा राज्य के जटिल और दूरस्थ राजनीतिक मामलों में संलग्न रहते हुए वे पूरे हिंदुस्तान में प्रमुखता प्राप्त कर चुके थे. इसके अलावा, उनकी कमांड में एक मिलिट्री टुकड़ी शाहजहां के लाल किले के अंदर बादशाह पर नजर रखती थी. दिल्ली में ही, एक मराठा मिलिट्री गैरीसन उनके दामाद , जिन्हें ‘देशमुख’ कहा जाता था, और एक मुस्लिम एडमिनिस्ट्रेटर, जिन्हें शाह निजामउददीन के तौर पर पहचाना जाता था, कि जॉइंट कमांड में काम करता था.
सैन्य इतिहास क्या?
काउंट गैस्टन डी बोइग्ने, जो उस समय के फ्रांस के सेवाय से जनरल बेनोइट डी बोइग्ने के बाईस साल के वंशज थे. उन्होंने शानदार जय विलास पैलेस में यूनियन मिनिस्टर सिंधिया को अपना फॉर्मल अभिवादन दिया. इस खास खानदान के जनक ने अठारहवीं सदी के दौरान महादजी महाराजा के मिलिट्री सिस्टम को मॉडर्न बनाया था, जिससे जयपुर और जोधपुर जैसी दुश्मन ताकतों के खिलाफ उनकी शानदार जीत आसान हुई, और भारत के बड़े इलाकों में सिंधिया का दबदबा बनाने में अहम भूमिका निभाई. डी बोइग्ने को एक नया मिलिट्री सिस्टम शुरू करने का क्रेडिट दिया जाता है जो किसी अजीब जीव के तेजी से फैलने के बराबर, बहुत तेजी से फैला. उन्होंने महादजी सिंधिया के लिए रेगुलर सैनिकों वाली पहली बड़ी सेना बनाई, जो सबकॉन्टिनेंट के देसी राजाओं के बीच पहले कभी नहीं देखी गई थी. इस ऑर्गनाइजेशनल मॉडल को बाद में हैदराबाद के निज़ाम और कुछ हद तक टीपू सुल्तान ने भी अपनाया.
जबरदस्त एनर्जी से भरे हुए रहते थे
सिंधिया की सेवा में, डी बोइग्ने हर दिन सुबह जल्दी शुरू करते थे और आधी रात तक काम करते थे. वो अपनी पोस्ट से जुड़ी अलगअलग ज़िम्मेदारियों को पूरा करते थे. उनके रोज़ के रूटीन में हथियारों का इंस्पेक्शन, परेड ग्राउंड पर सैनिकों की ड्रिल करना और दिन के लिए ऑर्डर जारी करना शामिल था. उन्होंने सैनिकों की भर्ती में खास मेहनत दिखाई. उनकी मिलिट्री फोर्स के इक्विपमेंट और हथियार उन्होंने खुद ही सोचे और दिए थे, और वे एक ही समय में क्वार्टरमास्टर और एडजुटेंट जनरल के तौर पर काम करते थे. मेडिकल डिपार्टमेंट और एम्बुलेंस सर्विस पर उनकी सीधी नज़र थी, और दोनों डिवीज़न ठीक से ऑर्गनाइज़्ड थे.
वे एडमिनिस्ट्रेटिव काम अपने नीचे के लोगों को देने से बचते थे, क्योंकि उनका स्वभाव कुछ ज़्यादा ही आज़ाद था, जिससे उन्हें सभी काम खुद करने पड़ते थे और उन्हें अधिकार देने में शक होता था. ज़बरदस्त एनर्जी और मेहनत से भरे होने के कारण, उन्होंने कई लोगों का काम एक साथ करने की काबिलियत दिखाई, और उनके व्यवहार ने दूसरों में भी हिम्मत भर दी. उन्होंने अपने अधीनस्थों में अद्भुत ऊर्जा और समर्पण का संचार किया. बाधाओं और मुश्किलों के सामने भी, उनके अटूट संकल्प और प्रतिबद्धता ने उन चुनौतियों को ठोस उपलब्धियों में बदल दिया. महादजी महाराज के लिए उन्होंने जो सुव्यवस्थित और अनुशासित सैन्य बल तैयार किया, वह एक कुशल सेनापति के रूप में उनकी सामरिक सूझबूझ और एक सक्षम प्रशासक के रूप में उनके व्यक्तिगत समर्पण का प्रमाण था.
अपने पूर्वजों की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते हुए, केंद्रीय मंत्री सिंधिया ने ग्वालियर के गोरखी मंदिर और मांड्रे वाली माता मंदिर में पूजाअर्चना की. इस दौरान उन्होंने सिंधिया परिवार के हथियारों और पुरानी शाही गाड़ियों की भी पारंपरिक विधि से पूजा की. जय विलास पैलेस में सिंधिया रिसर्च सेंटर और सिंधिया स्कूल के छात्रों ने उनका औपचारिक स्वागत किया. दशहरा के पावन अवसर और महाराजा माधव राव सिंधिया की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में, सिंधिया रिसर्च सेंटर ने मंत्री जी को ‘दरबार नीति’ से जुड़े 12 खंडों के दस्तावेजों का एक विस्तृत सारांश भेंट किया. इसके अलावा, मंत्री जी ने ग्वालियर के दशहरा मैदान में आयोजित पारंपरिक ‘सीमोल्लंघन’ समारोह में भी भाग लिया.
निष्कर्ष
अलगअलग भौगोलिक क्षेत्रों में, त्योहार और पारंपरिक अनुष्ठान विभिन्न संस्कृतियों के बीच आदानप्रदान को बढ़ावा देने और राजनयिक संबंधों को आगे बढ़ाने का एक अहम जरिया होते हैं. भारत में, दशहरा एक ऐसा ही महत्वपूर्ण अवसर है, जब कई पूर्व शाही परिवारों के वंशज पारंपरिक रीतिरिवाजों का आयोजन करते हैं और अपने क्षेत्रों की जनता के साथ जुड़ते हैं. ग्वालियर इसका एक बेहतरीन उदाहरण है, जहां शाही परिवार के मुखिया—जो ‘महाराजा’ की उपाधि धारण करते हैं—पारंपरिक मराठा पोशाक पहनते हैं. वे नागरिकों का अभिवादन दो रूपों में करते हैं. एक केंद्रीय मंत्री के तौर पर और दूसरा, मराठा सांस्कृतिक विरासत के संरक्षक के तौर पर. ये पारंपरिक अनुष्ठान कई देशों की राष्ट्रीय पहचान का एक अहम हिस्सा हैं और भारत की सांस्कृतिक कूटनीति में भी बहुत उपयोगी साबित होते हैं.


