जब भी ग्लोबल इकोनॉमी में उथलपुथल होती है या अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया गिरना शुरू होता है, तब बैंकिंग और इकोनॉमी के गलियारों में ‘FCNR Deposits’ का जिक्र तेजी से होने लगता है. हाल ही में रिजर्व बैंक की विशेष ‘स्वैप विंडो’ के तहत भारतीय बैंकों में FCNR डिपॉजिट्स के जरिए अरबों डॉलर का भारीभरकम इनफ्लो देखा गया है. रिपोर्ट के अनुसार मात्र 42 दिनों में एफसीएनआरबी के जरिए 21 अरब डॉलर से ज्यादा चुके हैं. जानकारों का अनुमान है कि ये आंकड़ा 50 अरब डॉलर का आंकड़ा पार कर सकता है. लेकिन आम आदमी और निवेशकों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि FCNR अकाउंट क्या होता है और गैररिहायशी भारतीयों का यह पैसा भारतीय करेंसी को कैसे सहारा देता है? आइए आसान भाषा में समझते हैं.

FCNR डिपॉजिट आखिर क्या है?
FCNR का पूरा नाम Foreign Currency NonResident Deposit यानी ‘विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक जमा’ होता है. यह NRIs और PIOs के लिए भारत के बैंकों में खोला जाने वाला एक विशेष फिक्स्ड डिपॉजिट अकाउंट है. सबसे मुख्य बात ये है कि सामान्य NRE या NRO अकाउंट्स में NRI जो पैसा भेजते हैं, वह बैंक में आते ही भारतीय रुपए में बदल जाता है. लेकिन FCNR अकाउंट में पैसा विदेशी मुद्रा में ही जमा रहता है और ब्याज भी उसी करेंसी में मिलता है.
FCNR अकाउंट्स की क्या है प्रमुख खासियत
करेंसी रिस्क से पूरी आजादी
FCNR डिपॉजिट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें जमाकर्ता को एक्सचेंज रेट के उतारचढ़ाव का कोई खतरा नहीं होता. अगर किसी NRI ने 10,000 डॉलर जमा किए हैं, तो मैच्योरिटी पर उन्हें ब्याज सहित पूरा पैसा डॉलर में ही वापस मिलेगा—चाहे उस दौरान रुपया कितना भी मजबूत या कमजोर क्यों न हुआ हो.
भारत में पूरी तरह टैक्सफ्री
FCNR अकाउंट में डिपॉजिट प्रिंसीपल और उस पर मिलने वाले ब्याज पर भारत में कोई इनकम टैक्स या दूसरा टैक्स नहीं देना पड़ता.
पूरी तरह ट्रांसफेरेबल
मैच्योरिटी पूरी होने पर जमाकर्ता बिना किसी कागजी जटिलता या सरकारी अनुमति के अपना पूरा पैसा और ब्याज वापस विदेश ले जा सकता है.
अब तक कितना आ गया पैसा?
भारतीय रिजर्व बैंक ने नॉनरेसिडेंट भारतीयों से फॉरेन करेंसी में डिपॉजिट को बढ़ावा देने के लिए खास उपाय किए हैं. इन उपायों की वजह से पिछले शुक्रवार तक फॉरेन करेंसी नॉनरेसिडेंट ) डिपॉजिट के तौर पर 17.4 अरब डॉलर आए हैं, जो इस स्कीम में निवेशकों की गहरी दिलचस्पी को दिखाता है. RBI ने एक बयान में कहा कि कंपनियों ने एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग के जरिए 1.34 अरब डॉलर जुटाए, जबकि ओवरसीज फॉरेन करेंसी बॉरोइंग से 1.97 अरब डॉलर और आए.
स्पेशल FCNR डिपॉजिट विंडो समेत ये उपाय, सेंट्रल बैंक की फॉरेन कैपिटल को अट्रैक्ट करने और रुपए को सपोर्ट करने की बड़ी कोशिशों का हिस्सा हैं, जो क्रूड ऑयल की बढ़ी हुई कीमतों के दबाव के बीच रिकॉर्ड निचले स्तर के करीब बना हुआ है. RBI ने ऑथराइज्ड डीलर बैंकों से मिले सबमिशन के आधार पर लेटेस्ट फॉरेन एक्सचेंज इनफ्लो डेटा जारी किया.
फ्रेश FCNR डिपॉजिट के लिए स्पेशल फैसिलिटी 30 सितंबर तक खुली रहेगी, जबकि ECBs और OFCBs के लिए विंडो 31 दिसंबर तक जारी रहेगी. RBI की स्वैप विंडो एलिजिबल बैंकों और बॉरोअर्स को सेंट्रल बैंक के साथ कंसेशनल रेट पर एलिजिबल फॉरेन करेंसी इनफ्लो एक्सचेंज करने की इजाज़त देती है. इससे हेजिंग कॉस्ट कम होती है और विदेशों से फंड जुटाना ज़्यादा अट्रैक्टिव हो जाता है.
रुपए को कैसे मजबूती देता है NRI का यह पैसा?
जब भी विदेशी बाजारों में डॉलर की मांग बढ़ती है या विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालते हैं, तो भारत में डॉलर की कमी होने लगती है और रुपया कमजोर होने लगता है. ऐसे समय में FCNR डिपॉजिट्स भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ‘सुरक्षा कवच’ का काम करते हैं…
1. देश में डॉलर की लिक्विडिटी बढ़ाना : जब NRIs FCNR अकाउंट्स में बड़ी रकम जमा करते हैं, तो भारतीय बैंकिंग सिस्टम में सीधे फॉरेन करेंसी का प्रवेश होता है. बाजार में डॉलर की उपलब्धता बढ़ने से रुपए की मांग और सप्लाई का संतुलन बनता है.
2. फॉरेक्स रिजर्व को बूस्ट : बैंक FCNR अकाउंट्स में आए डॉलर को रिजर्व बैंक में जमा करा सकते हैं या अंतरराष्ट्रीय व्यापार वित्तपोषण के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं. इससे भारत का फॉरेक्स रिजर्व मजबूत होता है, जो देश की रेटिंग और आर्थिक साख के लिए बेहद जरूरी है.
3. RBI की ‘स्वैप विंडो’ का जादू : जब रिजर्व बैंक को लगता है कि बाजार में डॉलर की किल्लत है, तो वह बैंकों के लिए एक विदेशी मुद्रा स्वैप विंडो खोलता है. बैंक NRIs से जुटाए गए FCNR डॉलर को निश्चित अवधि के लिए RBI को सौंप देते हैं. बदले में RBI बैंकों को रुपये दे देता है ताकि वे घरेलू बाजार में कर्ज दे सकें. अवधि पूरी होने पर RBI बैंकों को वापस डॉलर लौटा देता है. जिससे RBI को बाजार से महंगे डॉलर खरीदे बिना ही फॉरेक्स रिजर्व में तुरंत अरबों डॉलर मिल जाते हैं.
4. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। रुपए की गिरावट पर लगाम : जब विदेशी बाजारों में रुपए पर दबाव होता है, तो FCNR डिपॉजिट्स के जरिए आया डॉलर का इनफ्लो बाजार में एक बफर की तरह काम करता है, जिससे रुपया अचानक धड़ाम से गिरने से बच जाता है. FCNR डिपॉजिट्स भारत सरकार और रिजर्व बैंक के पास एक ऐसा असरदार आर्थिक हथियार हैं, जो एक तरफ NRIs को उनके विदेशी फंड पर सुरक्षित और टैक्सफ्री रिटर्न देता है, तो दूसरी तरफ भारतीय अर्थव्यवस्था को संकट के समय डॉलर का बैकअप देकर रुपये की साख को बनाए रखता है.



