पश्चिम एशिया में अमेरिकाईरान सैन्य संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेट में सप्लाई में नए व्यवधानों के कारण अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में फिर से भूचाल आ गया है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत का बेंचमार्क क्रूड ऑयल बास्केट 2 सितंबर को 99.35 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया, जबकि सितंबर का औसत बढ़कर 97.32 डॉलर प्रति बैरल हो गया है. खास बात तो ये है कि जुलाई के महीने में ये आंकड़ा 82 डॉलर था. इसका मतलब है कि तब से अब तक इसमें करीब 19 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिल चुकी है.

वहीं दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल कंज्यूमर भारत के लिए यह क्रूड बास्केट ब्रेंट क्रूड की तुलना में 3 डॉलर प्रति बैरल से भी अधिक महंगा पड़ रहा है. भारतीय रिफाइनरीज के इंपोर्ट मिक्स में बदलाव और मिडिल ईस्ट के तनाव के कारण देश के आयात बिल, चालू खाता घाटे और घरेलू महंगाई पर गंभीर मैक्रोइकोनॉमिक दबाव बनने का खतरा गहरा गया है. साथ ही देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा होने की उम्मीद भी बढ़ गई है. आइए आपको भी बताते हैं ​कि आखिर आंकड़े किस तरह की कहानी बयां कर रहे हैं…

इंडियन बास्केट में इजाफा

वेस्ट एशिया में फिर से तनाव बढ़ने के कारण भारत का बेंचमार्क क्रूड बास्केट 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है. इससे देश के तेल आयात बिल पर दबाव बढ़ गया है, जबकि ग्लोबल ब्रेंट की कीमतें भारतीय रेफरेंस प्राइस से कम बनी हुई हैं. पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के डेटा के अनुसार, 2 सितंबर को भारतीय क्रूड बास्केट 99.35 डॉलर प्रति बैरल था, जबकि सितंबर का औसत बढ़कर 97.32 डॉलर प्रति बैरल हो गया है. यह अगस्त के 90.19 डॉलर से 7.9 फीसदी और जुलाई के 82.04 डॉलर से 18.6 फीसदी ज्यादा है. अप्रैल में बास्केट का औसत 114.48 डॉलर था, जो मई में घटकर 106.23 डॉलर और जून में 83.22 डॉलर हो गया था.

ब्रेंट क्रूड में भी बढ़ोतरी

यह बढ़ोतरी तब हुई है जब ईरान के दक्षिणी तट पर अमेरिकी सेना के नए हमलों और ईरान की जवाबी कार्रवाई के बाद क्रूड मार्केट में फिर से अस्थिरता आ गई है, जिससे वेस्ट एशिया से तेल की सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. दोपहर करीब 1 बजकर 30 मिनट पर ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 59 सेंट या 0.62 फीसदी बढ़कर 96.22 डॉलर प्रति बैरल पर था, जबकि अमेरिकी क्रूड WTI 78 सेंट या 0.86 फीसदी बढ़कर 91.79 डॉलर पर पहुंच गया. दोनों बेंचमार्क लगातार चौथे सेशन में बढ़त की ओर बढ़ रहे थे.

इंपोर्ट बिल में हुआ इजाफा

भारतीय बास्केट की लेटेस्ट रीडिंग ब्रेंट से 3 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा है, जो यह बताता है कि मुख्य ब्रेंट कीमतें भारतीय रिफाइनरीज के लिए क्रूड की कॉस्ट की स्थिति को पूरी तरह से नहीं दिखाती हैं. भारतीय बास्केट एक डिराइव्ड बेंचमार्क है जिसमें ‘डेटेड ब्रेंट’ द्वारा दिखाया गया स्वीट क्रूड और ‘ओमानदुबई औसत’ द्वारा दिखाया गया सॉर क्रूड शामिल है. इसका कंपोजिशन भारतीय रिफाइनरीज द्वारा इंपोर्ट किए जाने वाले क्रूड मिक्स के साथ बदलता रहता है. स्वीटटूसॉर रेश्यो अप्रैल में 61.02:38.98 से बदलकर मई में 70:30, जून में 71.02:28.98 और जुलाई में 79.40:20.60 हो गया.

अगस्त में यह घटकर 74.94:25.06 हो गया और फिर सितंबर के लिए 77.81:22.19 हो गया, जिससे बास्केट पर ब्रेंटलिंक्ड स्वीट क्रूड का असर बढ़ गया. यह तनाव भारत के लिए इसलिए अहम है क्योंकि देश अपनी तेल की जरूरत का लगभग 90 फीसदी हिस्सा इंपोर्ट करता है. वित्त वर्ष 2026 में देश का कच्चा तेल आयात बिल लगभग 123 बिलियन डॉलर था. अकेले वित्त वर्ष 2027 के पहले चार महीनों में, भारत ने 63.4 बिलियन डॉलर का कच्चा तेल आयात किया, जो पिछले पूरे साल के बिल का आधे से ज्यादा है और सालदरसाल 56.5 फीसदी की बढ़ोतरी है.

एक डॉलर बढ़ाता है 18 हजार करोड़ का बिल

यह मामला काफी संवेदनशील है. अगर एक साल तक कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 1 डॉलर की बढ़ोतरी बनी रहती है, तो भारत के सालाना कच्चे तेल इंपोर्ट बिल में लगभग 18,000 करोड़ रुपए का इजाफा हो सकता है. आमतौर पर भारत के कच्चे तेल इंपोर्ट का लगभग 6065 फीसदी हिस्सा पश्चिम एशिया से आता था, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट के आसपास रुकावटों के कारण इसमें भारी कमी आई है. रिफाइनर अब रूस, अमेरिका, वेनेज़ुएला और अन्य स्रोतों की ओर रुख कर रहे हैं, हालांकि शिपिंग के लंबे रास्ते और वैकल्पिक कच्चे तेल की किस्मों की वजह से कॉस्ट बढ़ सकती है.

बढ़ रही है पेट्रोल और डीजल की डिमांड

घरेलू खपत बढ़ने से भी दबाव बढ़ रहा है. PPAC के आंकड़ों से पता चलता है कि अगस्त में पेट्रोल की मांग सालदरसाल 7.88 फीसदी बढ़कर 3.82 मिलियन टन हो गई, जबकि डीजल की खपत 6.46 फीसदी बढ़कर 7 मिलियन टन हो गई. अप्रैलअगस्त के दौरान, पेट्रोल और डीजल की मांग में क्रमशः 6.48 फीसदी और 4.29 फीसदी की वृद्धि हुई. अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो इंपोर्ट बिल बढ़ने से महंगाई का दबाव बढ़ सकता है, चालू खाता घाटा बढ़ सकता है और ग्रोथ रेट पर असर पड़ सकता है. चूंकि ‘इंडियन बास्केट’ फिर से 100 डॉलर के स्तर के करीब पहुंच रही है, इसलिए पश्चिम एशिया में जारी रुकावट भारत की एनर्जी कॉस्ट और मैक्रो इकोनॉमिक आउटलुक के लिए एक बड़ा रिस्क बनता जा रहा है.

क्या बढ़ सकते हैं पेट्रोल और डीजल के दाम?

इस मामले में कमोडिटी के जानकार अनुज गुप्ता का कहना है कि अगर अक्टूबर महीने में इंडियन बास्केट 110 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच सकता है तो नवंबर या दिसंबर में पेट्रोल और डीजल की कीमत में 3 से 5 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हो सकती है. उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में सभी का ध्यान अमेरिका और ईरान के बीच वॉर पर है. जिसकी वजह से एक ​बार फिर से कच्चे तेल की कीमतों तेजी देखने को मिली है. वैसे इंटरनेशनल मार्केट में ब्रेंट की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार नहीं गई है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। जिसकी वजह से सभी वेट एंड वॉच की स्थिति में फंस गए हैं.