झारखंड में प्रतियोगी परीक्षा दे रहे युवा आंदोलित हैं. उनका आरोप है कि झारखंड लोक सेवा आयोग ने 14 वीं कम्बाइन्ड सिविल सेवा परीक्षा में OMR शीट से छेड़छाड़ की है. आयोग ने 103 सीटों के लिए वैकेंसी निकाली थी. प्रारम्भिक परीक्षा के बाद 2204 युवा मुख्य परीक्षा के लिए शॉर्ट लिस्ट किए गए. जब यह नतीजे आए, तभी भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी की शिकायतें आने लगीं. अब छात्र आंदोलित हैं. पूरा आयोग कठघरे में है. ये अभ्यर्थी पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं. इस मामले में आयोग, राज्य सरकार, केंद्र सरकार क्या फैसला लेंगे यह समय बताएगा. आइए, इसी बहाने जानते हैं कि किसी भी प्रदेश के लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को हटाने के लिए राज्य सरकार या केंद्र सरकार क्या कर सकती है? क्या है पूरा प्रॉसेस? किन हालातों में अध्यक्ष को हटाया जा सकता है?

राज्य लोक सेवा आयोग एक संवैधानिक संस्था है. इसका मुख्य काम राज्य सरकार की सेवाओं में भर्ती के लिए परीक्षाएं आयोजित करना और सरकार को सलाह देना है. आयोग की निष्पक्षता बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है. सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्विनी कुमार दुबे कहते हैं कि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को राज्य सरकार अपनी इच्छा से नहीं हटा सकती. हटाने का अधिकार मुख्य रूप से भारत के राष्ट्रपति के पास है. यह व्यवस्था भारत के संविधान में स्पष्ट तौर पर दी गई है.
राज्य लोक सेवा आयोग का गठन
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 315 में संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोगों की व्यवस्था है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। प्रत्येक राज्य के लिए एक लोक सेवा आयोग होता है. दो या अधिक राज्य मिलकर संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग भी बना सकते हैं. राज्य लोक सेवा आयोग का उद्देश्य सरकारी भर्तियों में योग्यता, पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना है. आयोग सरकार को नियुक्ति, पदोन्नति, अनुशासनात्मक मामलों और सेवा संबंधी विषयों पर सलाह दे सकता है.
राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं.
अध्यक्ष की नियुक्ति कौन करता है?
राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं. यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 316 में है. व्यवहार में राज्यपाल संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार कार्य करते हैं. नियुक्ति की प्रक्रिया में राज्य सरकार की भूमिका हो सकती है, लेकिन नियुक्ति का औपचारिक संवैधानिक आदेश राज्यपाल के नाम से होता है. संविधान में अध्यक्ष या सदस्य बनने के लिए बहुत विस्तृत शैक्षणिक योग्यता नहीं लिखी गई है, लेकिन एक महत्वपूर्ण शर्त है. आयोग के लगभग आधे सदस्य ऐसे होने चाहिए जिन्होंने भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन कम से कम दस वर्ष तक पद धारण किया हो.
रांची में छात्रों का प्रदर्शन. फोटो: पीटीआई
अध्यक्ष का कार्यकाल कितना होता है?
अनुच्छेद 316 के अनुसार राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष का होता है, लेकिन वह व्यक्ति 62 वर्ष की आयु पूरी होने पर पद पर नहीं रह सकता. इसका अर्थ यह है कि कार्यकाल निम्न में से जो पहले पूरा हो, वहीं समाप्त हो जाएगा. छह वर्ष का कार्यकाल पूरा होना या 62 वर्ष की आयु पूरी होना. अध्यक्ष स्वयं भी अपना इस्तीफा दे सकता है. राज्य लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष अपना त्यागपत्र राज्यपाल को देता है.
क्या राज्य सरकार अध्यक्ष को हटा सकती है?
राज्य सरकार या मुख्यमंत्री अध्यक्ष को अपने आदेश से पद से नहीं हटा सकते. राज्यपाल भी सामान्य परिस्थितियों में उन्हें अकेले हटाने का अंतिम आदेश नहीं दे सकते. अध्यक्ष को हटाने की अंतिम संवैधानिक शक्ति राष्ट्रपति के पास है. यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि आयोग सरकार के दबाव में काम न करे. यदि राज्य सरकार को अध्यक्ष हटाने का सीधा अधिकार होता, तो निष्पक्ष भर्ती प्रक्रिया प्रभावित होने का खतरा रहता.
पूरा आयोग कठघरे में है और अभ्यर्थी पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं.
क्या हो सकता है अध्यक्ष को हटाने का मुख्य आधार
संविधान के अनुच्छेद 317 में हटाने की प्रक्रिया दी गई है. यदि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पर कदाचार का आरोप हो, तो राष्ट्रपति उसे हटाने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं. कदाचार के मायने भर्ती परीक्षा में भ्रष्टाचार, पद का दुरुपयोग, रिश्वत लेना, चयन प्रक्रिया को प्रभावित करना, निजी हित के लिए सरकारी पद का उपयोग करना तथा आयोग की निष्पक्षता को नुकसान पहुंचाने वाला व्यवहार करना. एक सच यह भी है कि केवल आरोप लग जाने से अध्यक्ष को हटाया नहीं जा सकता. आरोप की जांच के लिए एक विशेष संवैधानिक प्रक्रिया अपनानी पड़ती है.
यह विशेष संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?
कदाचार के मामले में राष्ट्रपति भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पास मामला भेज सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट आरोपों की जांच करता है. जांच के दौरान संबंधित अध्यक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलता है. वह आरोपों का जवाब दे सकता है, दस्तावेज प्रस्तुत कर सकता है और कानूनी सहायता ले सकता है. यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का हिस्सा है. सुप्रीम कोर्ट जांच पूरी करने के बाद राष्ट्रपति को रिपोर्ट देता है. यदि सुप्रीम कोर्ट यह मानता है कि कदाचार सिद्ध हुआ है और अध्यक्ष को हटाया जाना चाहिए, तभी राष्ट्रपति उसे पद से हटा सकते हैं.
जांच के दौरान निलंबन की व्यवस्था भी
यदि अध्यक्ष के विरुद्ध कदाचार का मामला सुप्रीम कोर्ट को भेज दिया गया है, तो जांच के दौरान उसे निलंबित किया जा सकता है. राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के मामले में राज्यपाल उसे निलंबित कर सकते हैं, लेकिन यह निलंबन अंतिम हटाना नहीं होता. यह केवल जांच पूरी होने तक की अस्थायी व्यवस्था है. निलंबन का उद्देश्य यह होता है कि जांच के दौरान अध्यक्ष अपने पद का गलत उपयोग न कर सके और जांच निष्पक्ष बनी रहे.
किन स्थितियों में राष्ट्रपति सीधे हटा सकते हैं?
अनुच्छेद 317 में कुछ ऐसी स्थितियां भी दी गई हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट की जांच आवश्यक नहीं होती. इन स्थितियों में राष्ट्रपति अध्यक्ष को सीधे हटा सकते हैं.
- दिवालिया घोषित होना: यदि अध्यक्ष को न्यायालय द्वारा दिवालिया घोषित कर दिया जाए.
- पद के बाहर वेतन वाला काम करना: यदि अध्यक्ष अपने पद की जिम्मेदारियों के बाहर कोई ऐसा काम स्वीकार कर लेता है, जिससे उसे वेतन या आर्थिक लाभ मिलता हो.
- मानसिक या शारीरिक अक्षमता: यदि राष्ट्रपति की राय में अध्यक्ष मानसिक या शारीरिक दुर्बलता के कारण पद पर बने रहने योग्य नहीं है.
अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद क्या कर सकता है?
संविधान का अनुच्छेद 319 पद छोड़ने के बाद की नियुक्तियों पर भी रोक लगाता है. इसका उद्देश्य पद के दुरुपयोग की संभावना को कम करना है. राज्य लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद संघ लोक सेवा आयोग का सदस्य या अध्यक्ष बन सकता है. वह किसी अन्य राज्य लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष भी बन सकता है. लेकिन, वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य नौकरी के लिए पात्र नहीं होता. यह प्रतिबंध आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए लगाया गया है.
राज्य सरकार की वास्तविक भूमिका क्या है?
राज्य सरकार किसी शिकायत, भ्रष्टाचार के आरोप या प्रशासनिक अनियमितता की जानकारी राष्ट्रपति या संबंधित संवैधानिक प्राधिकारियों तक पहुंचा सकती है. राज्य सरकार तथ्य जुटा सकती है और जांच की मांग कर सकती है. लेकिन राज्य सरकार स्वयं अध्यक्ष को बर्खास्त नहीं कर सकती. वह केवल प्रक्रिया शुरू कराने या आरोपों की सूचना देने में भूमिका निभा सकती है. राज्यपाल जांच लंबित रहने पर निलंबन कर सकते हैं, पर अंतिम हटाने का आदेश राष्ट्रपति ही जारी करते हैं.



