क्या मां का दूध लैब में तैयार किया जा सकता है? इसका सीधा सा जवाब है कि यह अब तक संभव नहीं हो पाया है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में भी वैज्ञानिक इसे हूबहू बनाने में फेल साबित हुए हैं. दुनियाभर की बड़ीबड़ी फूड कंपनियां, यूनिवर्सिटीज और बायोटेक स्टार्टअप्स दशकों से इसे बनाने की कोशिश में लगे हैं. अरबों डॉलर की रिसर्च, अत्याधुनिक लैब्स, जीनएडिटेड पौधे और AIआधारित प्रोटीन एनालिसिस के बावजूद, आज तक कोई भी मां के दूध की हूबहू नकल नहीं कर पाया है. आज मां के दूध की बात इसलिए क्योंकि हर साल 1 से 7 अगस्त के बीच दुनियाभर में वर्ल्ड ब्रेस्टफीडिंग वीक मनाया जाता है.

मां का दूध बच्चे के लिए सिर्फ पोषक तत्वों का खजानाभर नहीं है. यह उन्हें संक्रमण से बचाकर दवा की तरह काम करता है. यही बच्चे का रोगों से लड़ने वाला इम्यून सिस्टम को प्रशिक्षित करता है. अब सवाल है कि अब तक वैज्ञानिक मां के दूध को कृत्रिम रूप से क्यों नहीं तैयार कर पाए हैं. आयरलैंड की यूनिवर्सिटी कॉलेज कॉर्क के नियोनेटोलॉजिस्ट टोनी रायन का मानना है कि फॉर्मूला कभी भी इसकी नकल नहीं कर पाएगा, हालांकि विज्ञान बेहतर प्रोडक्ट बनाने में मदद ज़रूर कर सकता है.

कॉपी करने में असली मुश्किल यहां है

मां के दूध में एक खास तरह के प्रीबायोटिक शुगर मॉलिक्यूल पाए जाते हैं, जिन्हें ह्यूमन मिल्क ओलिगोसैकेराइड्स कहा जाता है. रिसर्च के मुताबिक अब तक इंसानी दूध में 200 से ज्यादा अलगअलग तरह के ओलिगोसैकेराइड पाए गए हैं, जो नवजात बच्चे के आंत में बनने वाले माइक्रोबायोम को आकार देने में अहम भूमिका निभाते हैं.

मां के दूध में 200 से ज्यादा ओलिगोसैकेराइड, इन्हें लैब में बनाना नामुमकिन.

आसान भाषा में समझें तो ये शुगर मॉलिक्यूल बच्चे के शरीर में सीधे एनर्जी के लिए इस्तेमाल नहीं होते बल्कि ये सीधे आंत तक पहुंचकर वहां मौजूद फायदेमंद बैक्टीरिया, खासकर बिफिडोबैक्टीरियम, को पोषण देते हैं और नुकसानदायक बैक्टीरिया और वायरस को शरीर से चिपकने से रोकते हैं. सबसे बड़ी मुश्किल है कि इनमें से ज्यादातर मॉलिक्यूल इतने कॉम्प्लेक्स हैं कि आज भी इन्हें प्रयोगशाला में बड़े स्तर पर बनाना बेहद मुश्किल है.

फॉर्मूला मिल्क हमेशा एक जैसा होता है, लेकिन मां के दूध के साथ ऐसा नहीं. फोटो: Pexels

मां का दूध बनाने के लिए क्या कर रहे वैज्ञानिक?

कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले की एक रिसर्च कहती है, इनमें से अधिकांश शुगर मॉलिक्यूल को बनाना आज भी बेहद कठिन, यहां तक कि लगभग असंभव माना जाता है. इसी वजह से वैज्ञानिक अब जीनइंजीनियर्ड पौधों की मदद से इन शुगर्स को बनाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि फॉर्मूला और सस्ता प्लांटबेस्ड दूध ज्यादा पौष्टिक बनाया जा सके.

मां के दूध में मौजूद अधिकांश शुगर मॉलिक्यूल को बनाना आज भी बेहद मुश्किल है. फोटो: Pexels

जीवित कोशिकाओं को बोतल में बंद नहीं कर सकते

फॉर्मूला मिल्क और मां के दूध के बीच सबसे बड़ा फर्क यह है कि मां के दूध में जीवित कोशिकाएं, एक्टिव एंजाइम, हार्मोन और एंटीबॉडीज मौजूद होती हैं जबकि फॉर्मूला मिल्क को कमरे के तापमान पर तीन साल तक स्टोर होना पड़ता है, जिसके लिए इसे इस तरह प्रोसेस करना पड़ता है कि उसमें कोई जीवित तत्व बचे ही नहीं.

मां के दूध में जीवित कोशिकाएं, हार्मोन, सक्रिय एंजाइम, इम्यूनोग्लोबुलिन्स और ऐसे मॉलीक्यूल होते हैं जिन्हें फॉर्मूला मिल्क में नहीं शामिल किया जा सकता है क्योंकि फॉर्मूला मिल्क को लंबे समय तक टिकाऊ रहना जरूरी होता है और मां के दूध के साथ ऐसी बाध्यता नहीं है.

मां का दूध बदलता रहता है पर फॉर्मूला मिल्क एक

फॉर्मूला मिल्क हमेशा एक जैसा होता है, लेकिन मां का दूध हर महिला में, यहां तक कि एक ही महिला में दिनप्रतिदिन और फीडिंगदरफीडिंग बदलता रहता है. रिसर्च बताती है कि HMOs की मात्रा भी मां की जेनेटिक्स के हिसाब से अलग होती है. जिन मांओं में “सेक्रेटर जीन” सक्रिय होता है, उनके दूध में कुछ खास शुगर मॉलिक्यूल पाए जाते हैं, जबकि “नॉनसेक्रेटर” माताओं के दूध में ये अनुपस्थित या बेहद कम होते हैं, जिसका सीधा असर बच्चे के आंत माइक्रोबायोम पर पड़ता है.

एक अध्ययन में पाया गया कि सेक्रेटर माताओं के बच्चों में बिफिडोबैक्टीरियम बिफिडम नाम के फायदेमंद बैक्टीरिया की मात्रा तुलनात्मक रूप से कम पाई गई. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। यानी मां का दूध सिर्फ एक रेसिपी नहीं, बल्कि हर मांबच्चे की जोड़ी के लिए अलग से डिजाइन किया गया सिस्टम है और यही चीज इसे कॉपी करना लगभग असंभव बना देती है.