Lucknow Building Fire: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज थाना क्षेत्र अंतर्गत पुरनिया इलाके में हुआ भीषण अग्निकांड सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि प्रशासनिक भ्रष्टाचार, लापरवाही और मानकों की अनदेखी का एक जीवंत और दहला देने वाला उदाहरण है. इस बहुमंजिला अवैध कमर्शियल बिल्डिंग ‘हेड हॉपर 3D आर्ट स्टूडियो’ में भड़की आग ने कुछ ही मिनटों में विकराल रूप धारण कर लिया. इस अग्निकांड ने 15 मासूम और होनहार युवाओं को जिंदा जलाकर मार डाला, जबकि 9 अन्य लोग जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं. इस भयावह घटना के बाद जब परतें खुलीं, तो इस इमारत का 46 साल पुराना एक ऐसा स्याह इतिहास सामने आया, जो यह साबित करता है कि अगर जिम्मेदार महकमे ने 10 साल पहले अपनी जिम्मेदारी निभाई होती, तो आज ये 15 जिंदगियां इस तरह न खत्म होतीं.

इस पूरी इमारत की कहानी सन 1980 से शुरू होती है. अलीगंज योजना सेक्टरD के अंतर्गत आने वाले इस भवन संख्या MS/102/D को 11 जुलाई 1980 को लॉटरी प्रणाली के माध्यम से विजय कुमार को आवंटित किया गया था. इसके बाद 4 नवंबर 1980 को अनुबंध की प्रक्रिया पूरी कर कब्जा मूल आवंटी को सौंप दिया गया. अगले 25 सालों तक यह एक सामान्य आवासीय भूखंड रहा और 2005 में यह रिकॉर्ड में विजय कुमार और ऊषा के नाम दर्ज हुआ.
आवासीय उपयोग के लिए नक्शा स्वीकृत किया गया था
इमारत के इतिहास में असली मोड़ 19 जनवरी 2013 को आया, जब इस प्रॉपर्टी को रामेश्वरम ग्रुप के मालिकों वीरेन्द्र प्रताप शुक्ला और सुरेन्द्र प्रताप शुक्ला को बेच दिया गया. 7 अगस्त 2014 को लखनऊ विकास प्राधिकरण ने इन दोनों भाइयों के पक्ष में नामांतरण की प्रक्रिया पूरी की. करीब 1992 वर्गफीट क्षेत्रफल वाली इस जमीन का 20 अगस्त 2014 को केवल आवासीय उपयोग के लिए नक्शा स्वीकृत किया गया था. लेकिन रसूख और भ्रष्टाचार के बल पर इस आवासीय नक्शे की धंज्जियां उड़ाते हुए इसे तुरंत कमर्शियल रूप दे दिया गया.
भवन में बड़े पैमाने पर अनधिकृत और अवैध निर्माण पाए जाने पर एलडीए ने संज्ञान लेते हुए मुकदमा संख्या 08/2016 दर्ज किया था. गहन जांच के बाद एलडीए के सक्षम अधिकारी ने 10 मई 2016 को इस अवैध निर्माण के खिलाफ ध्वस्तीकरण का ठोस आदेश पारित कर दिया था. अगर उस समय बुलडोजर चल गया होता, तो आज यह घटना कभी नहीं होती. लेकिन भ्रष्टाचार का खेल देखिए कि महज दो महीने के भीतर, 5 जुलाई 2016 को उस ध्वस्तीकरण आदेश को रहस्यमय तरीके से निरस्त कर दिया गया. साल 2016 से लेकर 2026 तक, पूरे एक दशक तक इस अवैध व्यावसायिक गतिविधि पर कोई कार्रवाई नहीं की गई.
थंब एम्प्रेशन ऑटोमैटिक लॉक गेट बना काल
यह तीन मंजिला इमारत पूरी तरह से मौत का जाल बनी हुई थी. प्रत्यक्षदर्शियों और आसपास के लोगों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस बिल्डिंग के पहले फ्लोर पर एक पेट शॉप थी, दूसरे फ्लोर पर ‘हेड हॉपर 3D आर्ट स्टूडियो’ नामक ग्राफिक एनिमेशन सेंटर संचालित हो रहा था, जहां समर कैंप के जरिए बच्चों को ट्रेनिंग दी जा रही थी. इसके अलावा टॉप फ्लोर पर एक बड़ी लाइब्रेरी चल रही थी, जहां छात्रछात्राएं पढ़ाई करते थे.
इस आधुनिक कहे जाने वाले ऑफिस का मुख्य दरवाजा ‘थंब एम्प्रेशन’ से खुलता था. जैसे ही दूसरी मंजिल पर शॉर्ट सर्किट या अन्य कारणों से भीषण आग लगी, बिजली गुल होते ही वह बायोमेट्रिक सिस्टम पूरी तरह जाम हो गया और गेट ऑटोमैटिक लॉक हो गया. अंदर मौजूद बच्चों और युवाओं को बाहर निकलने का मौका ही नहीं मिला. पूरी बिल्डिंग में कोई भी आपातकालीन निकास द्वार नहीं बनाया गया था और न ही कोई चालू फायर फाइटिंग सिस्टम उपलब्ध था. छत से नीचे आने की इकलौती सीढ़ी आग और धुएं की चपेट में आ गई, जिससे बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता भी बंद हो गया. अंदर फंसे बच्चे जान बचाने के लिए बाथरूम और कमरों में छिप गए, जहां आग से ज्यादा जहरीले धुएं और दम घुटने के कारण अधिकांश मौतें हुईं.
दीवार तोड़कर किया गया रेस्क्यू
राहत और बचाव कार्य की स्थिति भी प्रशासनिक मुस्तैदी पर सवाल खड़े करती है. दमकल विभाग और रेस्क्यू टीम को अंदर फंसे बच्चों तक पहुंचने के लिए कंक्रीट की मजबूत दीवार तोड़नी पड़ी. शुरुआती दौर में राहतकर्मियों के पास दीवार तोड़ने के लिए आधुनिक मशीनें तक उपलब्ध नहीं थीं, जिसके कारण हथौड़ों से दीवार को तोड़ा गया. इसमें काफी कीमती समय बर्बाद हो गया. जब तक रास्ता बना, तब तक पूरी इमारत में कार्बन मोनोऑक्साइड का घना धुंआ भर चुका था. कई बच्चों ने जान बचाने के लिए खिड़कियों से लटकते हुए बिजली के कड़े केबलों के सहारे नीचे उतरने की कोशिश की, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए.
यह घटना इसलिए भी सरकार के मुंह पर तमाचा है क्योंकि कुछ ही दिनों पहले दिल्ली के मालवीय नगर में हुए हादसे के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे सूबे में कड़े फायर सेफ्टी ऑडिट के निर्देश दिए थे. सभी जिलों में बड़े पैमाने पर जांच अभियान भी चलाया गया था. लेकिन इस कागजी ऑडिट अभियान के ठीक एक महीने के भीतर लखनऊ के बीचोंबीच यह बड़ा हादसा हो गया, जिससे साफ है कि धरातल पर अफसरों ने सिर्फ लीपापोती की थी.
16 दोषी अधिकारियों पर गिरेगी गाज
इस भयावह और दर्दनाक घटना का खुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने गहरा संज्ञान लिया है. उन्होंने मृत आत्माओं के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए एक उच्चस्तरीय जांच टीम का गठन कर दिया है. जांच के केंद्र में सबसे बड़ा सवाल यही है कि एलडीए ने 2014 में आवासीय भूखंड पर धड़ल्ले से कमर्शियल उपयोग कैसे होने दिया और 2016 के ध्वस्तीकरण आदेश को किसके दबाव में वापस लिया गया? इसके साथ ही नगर निगम भी जांच के घेरे में है, जो 2022 से इस अवैध बिल्डिंग से धड़ल्ले से कमर्शियल टैक्स वसूल रहा था लेकिन कभी सुरक्षा मानकों की सुध नहीं ली.
इस मामले में रामेश्वरम इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के मालिक वीरेंद्र शुक्ला और उनके सगे भाइयों सुरेंद्र व धीरेंद्र शुक्ला समेत देखरेख करने वाले अखिल शुक्ला के खिलाफ गंभीर धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करने की प्रक्रिया जारी है. इसके अलावा, 2014 से लेकर अब तक तैनात रहे एलडीए के तत्कालीन इंजीनियरों और अफसरों समेत कुल 16 आरोपियों की सूची तैयार कर ली गई है, जिन पर जल्द ही कठोरतम दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी.
अग्निकांड में असमय काल के गाल में समाए 15 मृतक
सागर, 2. निलेश, 3. अनामिका, 4. सायम, 5. अनुष्का, 6. सुदक्ष्मी, 7. आदित्य श्रीवास्तव, 8. ज्योति, 9. भविष्य, 10. अब्दुल রহমান, 11. सूरज शाह, 12. माहेजान, 13. जयनिल चक्रवर्ती, 14. मोहम्मद अम्मार, 15. सुमैया.
अस्पताल में उपचाराधीन 9 गंभीर घायल
जयंत, 2. लवप्रीत, 3. मोहम्मद आरिफ, 4. भुवन श्रीवास्तव, 5. पंकज, 6. शैलेंद्र, 7. अभिषेक, 8. पंकज जोशी, 9. गौरव कुमार.



