गांधी खुद को पराजित पा रहे थे. हिंदुस्तान टाइम्स के संवाददाता ने उनसे स्वतंत्रता दिवस के लिए संदेश मांगा. महात्मा गांधी ने कहा, “मैं अन्दर से बहुत खालीपन महसूस कर रहा हूं.” बीबीसी ने उनके सचिव प्यारे लाल से संदेश के लिए मदद मांगी. गांधी का जवाब था,” बेहतर होगा कि वे जवाहर लाल से बात करें.” जोर दिया कि संदेश पूरी दुनिया सुनेगी. उनका जबाब था,” कह दो कि गांधी को अंग्रेजी नही आती.”

आधी रात रेडियो पर पंडित नेहरु के स्वर गूंज रहे थे,”बहुत साल पहले हमने नियति से एक वादा किया था और अब उस वादे को पूरी तरह तो नही लेकिन काफी हद तक पूरा करने का वक्त आ गया है. आज जैसे ही घड़ी की सुइयां मध्य रात्रि की घोषणा करेंगी और जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और आजादी की करवट के साथ उठेगा.” उस रात आजादी की पटकथा के महानायक गांधी सत्ता के केंद्र दिल्ली से दूर कलकत्ता में नौ बजे ही सो चुके थे. हालांकि उस रात वे एक घंटे पहले दो बजे उठे. सुबह की उनकी सैर में लोगों का हुजूम उनके पीछे था.

दिल्ली में उत्सव, कलकत्ते में गांधी उसके अर्थ की तलाश में

दिल्ली में आधी रात आजादी का उत्सव था और कलकत्ता में गांधी उसके अर्थ की तलाश कर रहे थे. सत्ता हस्तांतरित हो चुकी थी. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। लेकिन गांधी के लिए आजादी केवल अंग्रेजों के चले जाने का नाम नहीं थी. उनके सामने असली सवाल था, क्या हिन्दू और मुसलमान भय से मुक्त होकर एकदूसरे के साथ रह सकेंगे? अगर इसका उत्तर नहीं है, तो सत्ता परिवर्तन को वे पूर्ण स्वतंत्रता कैसे मान लेते? गांधी खुद को पराजित पा रहे थे. उनकी पराजय उस भारत के टूटने की थी जिसको उन्होंने एक रखना चाहा था. उनकी पीड़ा यह थी कि जिस हिन्दुस्तान के लिए उन्होंने जीवन लगाया, वह उनकी आंखों के सामने विभाजित हो चुका था. अंग्रेज जा रहे थे. लेकिन जातेजाते देश को एक ऐसी रेखा से बांट गए थे जिसके दोनों ओर अपने ही लोग एकदूसरे के खून के प्यासे थे. महात्मा गांधी की कसौटी पर यह अधूरी आजादी थी.

महात्मा गांधी.

लोग भूख से मर रहे, फिर भी समारोह!

14 अगस्त की शाम बंगाल के मुख्यमंत्री प्रफुल्ल चंद घोष ने उनसे भेंट की. 15 अगस्त के आयोजनों के लिए सलाह मांगी. खिन्न गांधी ने कहा,” चारों ओर लोग भूख से मर रहे हैं. फिर भी आप चाहते हैं कि इस तरह के विनाश के बीच समारोह मनाया जाए?” दिल्ली में संविधान सभा में अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने वहां से पंद्रह सौ किलोमीटर दूर कलकत्ता में मौजूद महात्मा गांधी को संबोधित करते हुए भाषण शुरु किया. देर तक तालियां बजती रहीं. बाहर उनकी जय के नारे लग रहे थे. गांधी खुद को पराजित पा रहे थे.

हिंदुस्तान टाइम्स के संवाददाता ने उनसे स्वतंत्रता दिवस के लिए संदेश मांगा. गांधी ने कहा,” मैं अन्दर से बहुत खालीपन महसूस कर रहा हूं.” बीबीसी ने उनके सचिव प्यारे लाल से संदेश के लिए मदद मांगी. गांधी का जबाब था,” बेहतर होगा कि वे जवाहर लाल से बात करें.” जोर दिया कि संदेश पूरी दुनिया सुनेगी. उनका जबाब था,” कह दो कि गांधी को अंग्रेजी नही आती.” आधी रात रेडियो पर पंडित नेहरु के स्वर गूंज रहे थे,” बहुत साल पहले हमने नियति से एक वादा किया था और अब उस वादे को पूरी तरह तो नही लेकिन काफी हद तक पूरा करने का वक्त आ गया है. आज जैसे ही घड़ी की सुइयां मध्य रात्रि की घोषणा करेंगी और जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और आजादी की करवट के साथ उठेगा.” आजादी की पटकथा के महानायक गांधी उस रात नौ बजे ही सो चुके थे. हालांकि उस रात वे एक घंटे पहले दो बजे उठे. सुबह की उनकी सैर में लोगों का हुजूम उनके पीछे था.

कांटों का ताज, तड़कभड़क से दूर रहें

15 अगस्त को उन्होंने उपवास रखा. प्रार्थना की. चरखे पर सूत काता. अपनी मित्र अगाथा हैरिसन को लिखा,” तुम्हे यह पत्र लिखवाते समय मैं चरखे पर सूत कात रहा हूं. तुम जानती हो आज जैसे बड़े अवसरों को मेरा मनाने का तरीका. ईश्वर को धन्यवाद और उसकी प्रार्थना. प्रार्थना के साथ उपवास जरुरी है.”

दंगों में अपने पिता को गंवाने वाले रामेंद्र जी सिन्हा को उन्होंने लिखा,” आपने बताया है कि आपके पिता को अहिंसा ने बहादुरी दी थी. शरीर का नाश मायने नही रखता. ऐसे लोग कभी नही मरते. इसलिए आपकी मां या अन्य किसी का, आपके बहादुर पिता की मौत पर शोक मनाना ठीक नही. वह एक बड़ी विरासत आप लोगों के लिए सौंप गए हैं. मैं आपको यही सलाह दे सकता हूं कि जो आजादी मिली है, उसके लिए जो आपके लिए संभव हो, कीजिये. इसके लिए जरुरी है कि अपने बहादुर पिता जैसा बनिये.” आशीर्वाद लेने पहुंचे बंगाल के नए मंत्रियों को उन्होंने याद दिलाया कि आज से आप सबने कांटे का ताज पहना है. दिखावेतड़कभड़क और भ्रष्टाचार से बचने की नसीहत देते हुए कहा आपको सत्ता गांवों में बसने वाले गरीबों की सेवा के लिए मिली है.

पंडित नेहरू ने 14 अगस्त 1947 की रात अपना ऐतिहासिक भाषण दिया था.

अब मेरी कोई नहीं सुनता !

उन दिनों गांधी अपने को अकेला पा रहे थे. अक्सर खुद से ही बात करते,” मेरी कोई नही सुनता. अब मेरी किसी को जरुरत नही!” लेकिन हमेशा की तरह एक बार फिर गांधी अपने भीतर की आवाज़ सुन रहे थे. 9 अगस्त 1947 को वे कलकत्ता के लिए रवाना हुए. साल भर पहले जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन नारे ने वहां जो दंगों की आग लगाई, वह पूरी तरह थमी नही थी. गुजरे कई महीनों से पंजाब की हालत खराब चल रही थी. वहां की खबरें बंगाल को दहका रही थीं. गांधी दूसरी बार नोआखाली पहुंचे.

1946 के अक्टूबरनवम्बर के सात हफ़्ते उन्होंने वहां गुजारे थे. तब वे वहां एक सौ सोलह मील पैदल चले थे. सौ से अधिक गांवों में सभाएं की थीं. वहां की पन्द्रह फीसद हिन्दू आबादी ने अकथनीय जुल्म सहे थे. बड़े पैमाने पर उनकी हत्याएं की गईं थीं. उनके घर लूटेफूंके गए. स्त्रियों की इज्ज़त तारतार की गई. दरिंदे यहीं नही थमें. पत्नियों के सामने उनके पतियों को मारा गया और उनकी चिताएं जलने से पहले, इन स्त्रियों को बलात धर्म परिवर्तन करके, निकाह के लिए मजबूर किया गया.

आप हमारे भी !

लेकिन इस बार कलकत्ता पहुंचने पर दूसरी ही तस्वीर थी. गांधी के स्वागत में भीड़ का बड़ा हिस्सा मुसलमानों का था. मुसलमानों की गुजारिश थी कि उन सबकी हिफाजत के लिए गांधी कलकत्ता में रुकें. वे कह रहे थे ‘आप पर जितना हक़ हिंदुओं का है, उतना ही मुसलमानों का भी.’ मुस्लिमों की इस भीड़ की अगुवाई मुस्लिम लीग के नेता हुसैन शहीद सुहरावर्दी कर रहे थे. कल तक वे गांधी के कटु आलोचक थे. जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन की पुकार के वक्त सुहरावर्दी बंगाल के मुख्यमंत्री थे.

मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के संस्थापक कहलाए.

16 अगस्त 1946 को उन्होंने कलकत्ता में पुलिस के लिए विशेष छुट्टी घोषित कर दंगाइयों को सब कुछ करने की छूट दी थी. उस दिन और इसके बाद के हफ़्तों में वहां हिंदुओं का व्यापक नरसंहार हुआ था . जान गंवाने वालों की संख्या कई हजार थी. उनकी अपार सम्पत्ति लूटी और जलाई गई. सिर्फ हिन्दू ही नही, बंगाल के गवर्नर सर फ्रेडरिक बरोज और ईस्ट कमांड के चीफ़ लेफ्टिनेंट जनरल सर फ्रैंसिस टुकर सहित हर अंग्रेज अधिकारी ने सुहरावर्दी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था.

डायरेक्ट एक्शन के विलेन ने की हर शर्त कुबूल

महात्मा गांधी के कलकत्ता पहुंचने तक सुहरावर्दी की मुख्यमंत्री की कुर्सी छिन चुकी थी. कांग्रेस के प्रफ्फुल्ल चंद घोष बंगाल के मुख्यमंत्री थे. सुहरावर्दी उन दिनों मुस्लिम लीग में भी निचले पायदान पर थे. उन्होंने हिंदुओं के साथ अलग देश बंगाल की उम्मीद पाली थी. ये उम्मीद परवान नही चढ़ी लेकिन इसके चलते सुहरावर्दी ने जिन्ना को खुद से दूर कर लिया. सुहरावर्दी पर बंगाल के अकाल के वक्त और बाद में भी गलत जरियों से अकूत दौलत इकट्ठा कर लेने का भी आरोप था. उन्हें मुसलमानों के साथ अपनी उस दौलत की हिफाज़त की भी फिक्र थी.

अपनी सोचरहनसहन और करतूतों के चलते वे गांधी के ठीक उलट थे. फ़िर भी कालचक्र ने उन्हें और महात्मा़ गांधी को हफ़्ते भर एक छत के नीचे कर दिया. गांधी ने सुहरावर्दी के सामने दो शर्तें रखीं. वह नोआखाली में हिंदुओं की हिफाजत की जिम्मेदारी लें. गांधी की दूसरी शर्त ऐश की जिंदगी गुजारने वाले सुहरावर्दी के लिए भारी थी. “जहां मैं रहूं, वहीं साथ रहिये. बिना किसी हथियार और सुरक्षा के.” डायरेक्ट एक्शन के विलेन ने उसे भी कुबूल कर लिया था.

बूढ़ा लाजवाबहारना नहीं जानता

गांधी ने बेलियाघाटा की मुस्लिम बस्ती की एक वीरान इमारत हैदरी मंजिल को चुना. 13 अगस्त से वहां रहना शुरु किया. पटेल को लिखा,” यहां आकर मैं फंस गया हूं और अब बहुत बड़ा जोख़िम उठाने जा रहा हूं. परिणाम भविष्य बताएगा.” पटेल को भी महात्मा गांधी का यह फैसला समझ नहीं आया. 13 अगस्त को खिन्न लहजे में उन्होंने उत्तर दिया,” तो आप कलकत्ते में सही में एक बुरी हालत वाले क्वार्टर में और वह भी दंगाइयों के गिरोहों के ठिकाने पर रोक लिए गए हैं! वहां बहुत परेशान करने वाली गन्दगी होगी. अपनी कुशलता की खबर देते रहिये.”

गांधी के इस कदम ने कलकत्ता के हिंदुओं को भी बेहद नाराज किया. उसी रात हैदरी मंजिल पर जुटे हिंदुओं ने उनकी वापसी की मांग करते हुए जमकर नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन किए. गांधी के मित्र पेसिफिस्ट होरेस एलेक्जेंडर हैदरी मंजिल में उनके साथ थे. उन्होंने गांधी को सुनते हुए लिखा,” मैं यहां मुसलमानों और हिंदुओं दोनों की सेवा करने आया हूं.” उत्तर से असंतुष्ट भीड़ उनकी वापसी पर अड़ी थी. लेकिन गांधी जो सही मानते थे, उससे डिगते नही थे.

नाराजगी से बेपरवाह गांधी ने कहा,” आप मेरा काम रोक सकते हैं. मेरी हत्या भी कर सकते हैं. मैं पुलिस की मदद नहीं मांगूगा. आप इस घर से मेरा निकलना रोक सकते हैं. लेकिन मुझे हिंदुओं के शत्रु के रूप में पेश करने की आपकी बात मुझे मंजूर नही है.” उन्होंने सवाल किया कि 1946 में जो गलत हुआ,उसके बदले से अब क्या हासिल होगा?

14 अगस्त की सुबह एक बार फिर वे नाराज भीड़ के उग्र सवालों के जबाब में सद्भावसमझदारी और विनयशीलता के संदेश दे रहे थे. भीड़ के बीच से एक नौजवान रोते हुए चीखा,” यह बूढ़ा लाजबाब है. विरोध कितना भी बड़ा हो. यह हारना नहीं जानता.” शाम को वह नौजवान हैदरी मंजिल की हिफाज़त में लगे समूह का हिस्सा था.

कर दिया कमाल

अगली सुबह कलकत्ता की फिजा बदली नजर आ रही थी. हिन्दूमुसलमान 15 अगस्त खुशियां साथ मनाते नज़र आ रहे थे. तनाव के बादलों के बीच समझदारी की किरणें झांक रही थीं. गांधी को इसका श्रेय मिल रहा था. उनके साथी और बंगाल के नए गवर्नर सी राजगोपालाचारी ने उनसे कहा,” आपने बहुत कमाल किये. पर ये कमाल तो बिल्कुल ही अलग है.” गांधी का जबाब था कि हिंदूमुसलमान का यह साथ क्षणिक नहीं होना चाहिए. यह टिकाऊ होना चाहिए.

कलकत्ते को नजीर बनना चाहिए. जब तक लोग घर नहीं वापस होते और हिन्दूमुसलमान फिर से पहले जैसे साथ नही रहते, वे संतुष्ट नही होंगे. छात्रों,कम्युनिस्ट नेताओं से अलग मुलाकातों और प्रार्थना सभा सब जगह उन्होंने हिन्दूमुसलमानों के बीच प्रेमसमझदारी और शांति कायम करने का संदेश दिया. उन्होंने कहा था, “लोगों के दिल नही बदले तो अभी दिख रहा उत्साह निरर्थक होगा. तब आने वाले दिनों में हालात और खराब होंगे.”

एक बार फिर उपवास

उनकी आशंका सही थी. उनके कलकत्ता रहते ही स्थिति फिर खराब होने लगी. फिर से उन्होंने अनशन का सहारा लिया. अब तक विदेशी सत्ता से लड़ने के लिए वे इस अहिंसक अस्त्र का इस्तेमाल करते रहे थे. अब अपनी सरकार थी. अपनों की सद्बुद्धि के लिए वे अनशन पर बैठे. उसी हैदरी मंजिल में जो फ़िलहाल उनका ठिकाना था. 2 सितम्बर से उनका अनशन शुरु हुआ. एक बार फिर से वे लोगों के गुस्से के निशाने पर थे. पर वे निर्भय. अविचल. लोगों को शांति और समझ की सीख देते रहे. दूसरे दिन से लोग पसीजने शुरु हुए. फिर तीसरे दिन. मरनेमारने पर आमादा दोनों ओर के लोगों की कतारें उनके सामने थीं. उनके चरणों में अपना सिर झुकाते और पिस्तौलें, फरसे, तलवारे, बरछे, बघनखे सौंपते. कांग्रेस, मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा सहित तमाम संगठनों के नेता उनसे मिले. उन्हें वहां शांति का भरोसा दिलाया. तीसरे दिन उन्होंने अनशन तोड़ दिया.

फिर दिल्ली की ओर

गांधी ने वहां चार हफ़्ते गुजारे. कलकत्ता में वे शांति स्थापित करने में सफल रहे. साल भर पहले जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन के दौर में खून से लाल हुआ बंगाल आजादी के साल में पंजाब की तुलना में काफी कम हिंसा का शिकार हुआ. लार्ड माउन्टबेटन ने लिखा कि पंजाब में 55 हजार जवानों की फोर्स जो न कर सकी, उसे बंगाल में अकेले निहत्थे गांधी ने कर दिखाया.

कलकत्ते में रहते गांधी को पंजाब के हालात बेचैन किये हुए थे. सात सितंबर को वे वह कलकत्ता से रवाना हुए. दिल्ली की हालत भी खराब थी. तनाव चरम पर था. अपनों को खोकर,सब कुछ गंवा कर आये, रोतेबिलखते शरणार्थियों की बाढ़ थी. गांधी को उनके बीच रुकना पड़ा. उनकी थोड़ी सी बची जिंदगी इन शरणार्थियों के घावों पर मरहम लगाने. आंसू पोंछने, दुःख कम करने और खोयी हिम्मतभरोसा वापस लाने की कोशिशों के लिए शेष थी.