विशेष गहन पुनरीक्षण में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं. विपक्षी दलों के साथ ही
जस्टिस भुइयां और जस्टिस नरीमन ने भी इसको लेकर सवाल उठाए. वहीं अब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कुरियन जोसेफ ने इस पर सवाल उठाया. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के लिए संवैधानिक संशोधन की मांग की. इसके साथ ही उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए लागू सुरक्षा उपायों के बीच अंतर पर भी सवाल उठाया और कहा कि सभी चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया एक जैसी होनी चाहिए.

जस्टिस कुरियन जोसेफ ने सवाल उठाया कि अगर चुनाव कराने की जिम्मेदारी संभालने वालों की ईमानदारी पर भरोसा नहीं किया जा सकता तो क्या लोकतंत्र जहरीला हो गया है. उन्होंने भारत के चुनाव आयो की आजादी की रक्षा के लिए मजबूत संवैधानिक सुरक्षा उपायों की मांग की.

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर जताई चिंता

दरअसल इंडियन एसोसिएशन ऑफ लॉयर्स, केरलम द्वारा एक सेमिनार आयोजित किया गया था.जिसका विषय था ‘भारत के चुनाव आयोग की आजादी: क्या समझौता हुआ है?’. इस सेमिनार के उद्घाटन समारोह में जस्टिस जोसेफ ने अपने संबोधन में संविधान सभा की बहसों के दौरान चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर जताई गई चिंताओं का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि इस संस्था की आजादी और ईमानदारी को संविधान में ही शामिल सुरक्षा उपायों के ज़रिए पक्का किया जाना चाहिए.

‘तो वो लोकतंत्र को जहरीला कर देंगे…’

जस्टिस जोसेफ ने अपने संबोधन में संविधान सभा के सदस्य हृदय नाथ कुंजरू की उस चेतावनी पर जोर दिया कि अगर चुनावी मशीनरी या अधिकारी ऐसे हों जिनकी ईमानदारी पर भरोसा न किया जा सके, तो वो लोकतंत्र को उसकी जड़ से ही जहरीला कर देंगे. उन्होंने कहा ‘डॉ. हृदय नाथ कुंजरू ने उस पद पर बैठे व्यक्ति की ईमानदारी के बारे में बात की थी. अगर वह ईमानदारी बेदाग नहीं है तो लोकतंत्र अपनी जड़ से ही जहरीला हो जाएगा. क्या हम इन दिनों ऐसा ही नहीं देख रहे हैं? क्या उन लोगों के हाथों लोकतंत्र जहरीला नहीं हुआ है जो संविधान की सोच के मुताबिक काम नहीं कर रहे हैं?’.

‘लोकतंत्र की रक्षा के बारे में सोचना चाहिए ‘

उन्होंने कहा कि ये वो समय है, जब देश को हमारी लोकतंत्र की रक्षा के बारे में सोचना चाहिए और कदम उठाने चाहिए. उन्होंने कहा कि अगर भारत के चुनाव आयोग जैसी महान संस्थाओं को ऐसी संवैधानिक शक्तियां दी गई हैं तो उनकी ईमानदारी और आज़ादी भी पक्की की जानी चाहिए’.

‘चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा की शर्तें संविधान में तय हों’

जस्टिस जोसेफ ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा की शर्तें संविधान में तय होनी चाहिए, न कि इन मामलों को संसदीय कानून पर छोड़ दिया जाना चाहिए. इसके साथ ही उन्होंने ये मांग भी की कि सभी चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया वही होनी चाहिए, जो सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए है.

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 324 का जिक्र किया, जो चुनाव आयोग को वोटर लिस्ट तैयार करने और चुनाव कराने की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति देता है. उन्होंने कहा कि संवैधानिक प्रावधान में इन जिम्मेदारियों को संभालने वाली संस्था की आजादी की रक्षा के तरीके पर पर्याप्त रूप से बात नहीं की गई. संविधान सभा की बहसों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने डॉ. बी.आर. अंबेडकर की उन चिंताओं को याद किया, जो मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त के तौर पर किसी ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति के खिलाफ सुरक्षा उपायों की कमी को लेकर थीं, जो शायद सरकार के प्रभाव में हो सकता है.

‘ईमानदारी और निष्पक्षता से कोई समझौता न हो’

जस्टिस जोसेफ ने अपने संबोधन में संविधान सभा के सदस्य सिब्बन लाल सक्सेना के उस प्रस्ताव का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया था कि चुनाव आयोग में नियुक्तियों को संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में दोतिहाई बहुमत से मंज़ूरी मिलनी चाहिए. सक्सेना ने चिंता जताई थी कि सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी चुनावी फायदा उठाने के लिए पार्टी के किसी कट्टर वफादार व्यक्ति को मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त कर सकती है. जस्टिस जोसेफ ने कहा कि संविधान बनाते समय उठाई गई चिंताओं से यह बात साफ होती है कि इस पद पर बैठने वाले व्यक्ति की ईमानदारी और निष्पक्षता से कोई समझौता न हो, यह सुनिश्चित करना कितना जरूरी है.

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि संवैधानिक संस्थाओं की ईमानदारी और आज़ादी की रक्षा के लिए नियुक्ति के चरण से ही सुरक्षा उपायों की ज़रूरत है. उन्होंने कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा की शर्तों को संसदीय कानून पर छोड़ने के बजाय संविधान में ही उचित सुरक्षा उपाय शामिल किए जाने चाहिए.

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने पर क्या कहा

जस्टिस जोसेफ ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए लागू सुरक्षा उपायों के बीच अंतर पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि सभी चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया एक जैसी होनी चाहिए. जस्टिस जोसेफ ने कहा कि सभी चुनाव आयुक्तों को पद से हटाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के जजों जैसी ही सुरक्षा मिलनी चाहिए. इस सिद्धांत का ज़िक्र करते हुए कि मुख्य चुनाव आयुक्त ‘बराबर वालों में सबसे पहला’ होता है, उन्होंने कहा कि CEC को आयोग के अन्य सदस्यों की तुलना में कोई विशेष दर्जा नहीं मिलना चाहिए.

उन्होंने कहा ‘संविधान कहता है कि केवल CEC को ही महाभियोग के ज़रिए हटाया जा सकता है और अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर हटाया जा सकता है. असल में, यह बहुत खतरनाक शक्ति है और चुनाव आयुक्तों को हटाने के संबंध में 2023 के कानून में भी इसे दोहराया गया. अगर उन्हें बराबर माना जाना है तो मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को भी सुप्रीम कोर्ट के जज के दर्जे के बराबर माना जाना चाहिए. इसलिए न केवल मुख्य चुनाव आयुक्त, बल्कि अन्य सभी को भी सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह केवल महाभियोग की प्रक्रिया से ही हटाया जाना चाहिए’.

‘संवैधानिक शक्तियां संस्थाओं में निहित होती हैं’

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संवैधानिक शक्तियां संस्थाओं में निहित होती हैं, न कि ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के निजी विशेषाधिकार होते हैं.उन्होंने कहा ‘मुख्य चुनाव आयुक्त को अकेले कोई खास विशेषाधिकार नहीं मिलना चाहिए. यह एक संस्था होनी चाहिए, कोई व्यक्ति नहीं.दुर्भाग्य से, मेरे विचार से हमारे देश में ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को गलतफहमी या गलत धारणा होती है कि सारी ताकत उस व्यक्ति में निहित है. ताकत व्यक्ति में नहीं होती. भारत का संविधान व्यक्ति को ताकत नहीं देता. जहां भी ताकत दी जाती है, उसका मतलब उस ताकत का संस्थागत इस्तेमाल होता है. अगर यह ताकत का संस्थागत इस्तेमाल है, तो आपको दो बार सोचना होगा कि आप ताकत का इस्तेमाल कब, कैसे और कहां करते हैं’.