उत्तर प्रदेश के दिग्गज समाजवादी नेता रामगोविंद चौधरी आज नहीं रहे. लंबे समय से बीमार चल रहे रामगोविंद चौधरी का शुक्रवार को लखनऊ में निधन हो गया. यह खबर सुनते ही बलिया शहर ही नहीं, पूरे जिले में शोक की लहर दौड़ गई है. 8 बार के विधायक, उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री और नेता प्रतिपक्ष रहे रामगोविंद चौधरी जनजन के नेता थे. एक बार तो उनकी लोकप्रियता देखकर उनके राजनीतिक गुरु और बलिया के सांसद चंद्रशेखर भी हैरान रह गए थे. आइए पूरी कहानी बताते हैं.

इमरजेंसी का दौर था. देश में जेपी आंदोलन जोर पकड़ रहा था. जेपी से प्रभावित होकर रामगोविन्द चौधरी ने भी लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष का रास्ता चुना और बलिया में जेपी आंदोलन के जिला छात्र युवा वाहिनी के सहसंयोजक बन गए. उस समय वह बलिया के टीडी कॉलेज में छात्र संघ अध्यक्ष थे. फिर इमरजेंसी के बाद का दौर. धीरेधीरे सभी नेता जेल से रिहा होने लगे और लोक सभा चुनावों का ऐलान हो गया. संयोग से जिस दिन चंद्रशेखर को नामांकन भरना था, ठीक उसी दिन रामगोविंद चौधरी की रिहाई हुई.
जलवा ही देखते रह गए चंद्रशेखर
एक तरफ चंद्रशेखर अपने काफिले के साथ नामांकन भरने के लिए निकले. दूसरी तरफ 24 महीनों से जेल में बंद रामगोविंद चौधरी जेल से रिहाई के बाद पैदल ही टीडी कॉलेज की ओर निकले. उस समय रामगोविंद के साथ कोई घोषित जुलूस तो नहीं निकला, लेकिन उन्हें देखने के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा. बलिया जेल से टीडी कॉलेज तक जो जहां था, वहीं खड़ा हो गया, इससे पूरा शहर जाम हो गए. ठीक उसी समय चंद्रशेखर का काफिला वहां पहुंचा. उन्होंने यह जलवा देखा तो हैरान रह गए. काफिला रोक दिया, पूछा कि ये कौन नेता है, फिर अपने किसी आदमी को रामगोविंद के पास भेजा और मिलने को कहा.
रामगोविंद के जीवन का टर्निंग पॉइंट
यही मुलाकात रामगोविंद चौधरी के जीवन का टर्निंग पॉइंट था. एक संघर्षशील छात्र और एक बड़े समाजवादी चिंतक के इस मिलन ने रामगोविन्द चौधरी के राजनीतिक जीवन को नई दिशा दी. इसके बाद तो वह चंद्रशेखर के हमदम बन गए. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इसी मुलाकात के बाद उन्हें चंद्रशेखर का दाहिना हाथ कहा जाने लगा. वह वर्ष 1977 में पहली बार वह चिलकहर विधानसभा सीट से जनता पार्टी के टिकट पर विधायक बने. फिर इसी सीट से वह चार बार इस सीट से प्रतिनिधित्व किया. चंद्रशेखर की तरह उनका भी मानना था कि राजनीति में उनका उद्देश्य चुनाव जीतना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने और उसकी आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंचाना है.
ऐसा रहा उनका जीवन
रामगोविंद चौधरी का जन्म 9 जुलाई 1953 को बलिया के सिकंदरपुर के पास गोसाईपुर गांव में हुआ था. तीन भाइयों में सबसे बड़े रामगोविन्द चौधरी ने प्रारंभिक संस्कार गांव की मिट्टी और सामान्य परिवेश में प्राप्त किया. उनकी प्रारंभिक शिक्षा भी गांव के प्राथमिक विद्यालय में हुई. फिर स्कूली शिक्षा के लिए सिकन्दरपुर और उच्च शिक्षा के लिए सतीश चंद्र कॉलेज बलिया पहुंचे. यहां से बीएससी के दौरान ही वह छात्र आंदोलनों से जुड़ गए. इसकी वजह से उनका नाम कट गया. फिर वह टीडी कॉलेज में एडमिशन लेकर पढ़ाई के साथ छात्र राजनीति करने लगे.
ऐसे बनी बड़ी पहचान
एससी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही वह छात्रों के हितों की आवाज उठाने लगे. उनकी धारा प्रवाह भाषण शैली, सीधे मुद्दे की बात, आक्रामक प्रहार जैसे गुणों की वजह से वह छात्रों के दिलों में बसने लगे. देखते ही देखते पहले बलिया शहर में उनकी पहचान बनी. फिर वह लोगों की मदद करके पूरे जिले में लोकप्रिय हो गए. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। कहा जाता है कि जिले का कोई भी व्यक्ति उनके पास जाकर अपनी व्यथा बताता तो वह उसके साथ नंगे पैर ही चल पड़ते और जब तक समाधान नहीं हो जाता, हटते नहीं थे.
छात्र राजनीति से जनसंघर्ष तक
वर्ष 1972 में वह टीडी कॉलेज छात्रसंघ के महामंत्री बने. फिर 1974 में छात्रसंघ अध्यक्ष बने. इसी दौरान वह जेपी आंदोलन से जुड़े और जेल गए. 24 महीने वह जेल में रहे. फिर 1977 में चंद्रशेखर के कहने पर चिलकहर से विधायक बने. 1991 में चंद्रशेखर के ही कहने पर उन्होंने सपा जॉइन किया और मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बने. उन्हें खाद्य प्रसंस्करण एवं उद्यान विभाग की जिम्मेदारी मिली थी. 2000 में वे समाजवादी जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने. वर्ष 2002 में बांसडीह विधानसभा क्षेत्र से समाजवादी जनता पार्टी के प्रत्याशी के रूप में, समाजवादी पार्टी के समर्थन से चुनाव लड़ा और तत्कालीन कैबिनेट मंत्री बच्चा पाठक को लगभग 6,000 मतों से पराजित कर विधानसभा पहुंचे.
2004 में फिर मंत्री बने
मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में उन्हें साल 2004 में फिर कैबिनेट मंत्री बनाया गया और इस बार बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की प्रोफाइल मिली. उनके राजनीतिक जीवन में पराजय भी आई. वर्ष 2007 में वे बांसडीह विधानसभा सीट से लगभग 264 मतों के अंतर से चुनाव हार गए. हालांकि वर्ष 2012 में उन्होंने फिर विजय प्राप्त की और अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सरकार में बेसिक शिक्षा तथा बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग के कैबिनेट मंत्री बने. बाद में समाज कल्याण और पंचायती राज जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी भी संभाली. वर्ष 2017 में उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी श्रीमती केतकी सिंह को लगभग 1,655 मतों से पराजित किया. इस विजय के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता विरोधी दल की जिम्मेदारी मिली.



