शिमला। हिमाचल प्रदेश की पंचायतों में विकास कार्यों से जुड़े करीब 300 करोड़ रुपये के हिसाब का मामला अटक गया है। केंद्र सरकार ने पंचायतों से खर्च की गई राशि का रिकॉर्ड मांगा है। ऐसे में अब पंचायतों को खर्च का पूरा ब्योरा और जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराने होंगे। अगर समय पर हिसाब नहीं दिया गया, तो इसका असर केंद्र से मिलने वाली अगली किस्तों पर भी पड़ सकता है।

नए पंचायत प्रतिनिधियों के चुनाव से हुई देरी

पंचायतों में पिछले साल हुए विकास कार्यों का हिसाब अभी तक जमा नहीं हुआ है। इसकी एक वजह पंचायत चुनाव में लगा समय भी बताया जा रहा है। उपयोगिता प्रमाणपत्र एक ऐसा कागज होता है, जिससे पता चलता है कि सरकार से मिले पैसे कहां और कैसे खर्च किए गए। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इसमें किए गए काम और खर्च की पूरी जानकारी देनी होती है।

 

बिलों के साथ जमा करवाने होंगे दस्तावेज

पंचायतों को कहा गया है कि वे खर्च का हिसाब देने के साथ-साथ उससे जुड़े बिल भी जमा करवाएं। 15वें वित्त आयोग से मिले पैसों का ज्यादातर हिस्सा पीने के पानी, सफाई, बारिश के पानी को इकट्ठा करने और पानी को दोबारा इस्तेमाल करने जैसे कामों पर खर्च करना था। इसके अलावा बची हुई रकम पंचायतें अपने इलाके की जरूरत के हिसाब से दूसरे विकास कार्यों पर खर्च कर सकती थीं।

अगली किस्त मिलने में आ सकती है परेशानी

पुराने अनुदान का पूरा हिसाब और खर्च का रिकॉर्ड जमा नहीं होने से आगे की किस्त जारी होने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। पंचायतों को अगली किस्त भी अभी नहीं मिली है। हालांकि, उपयोगिता प्रमाणपत्र लंबित होने से हर मामले में पैसा अपने आप रुक जाए, यह जरूरी नहीं है। अगली किस्त जारी करने का फैसला संबंधित योजना की शर्तों और केंद्र सरकार की कार्रवाई पर निर्भर करेगा।

अधिकारियों ने दिए रिकॉर्ड जमा करवाने के निर्देश

ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग के सचिव सी पाल रासु ने बताया कि पिछले वित्तीय वर्ष में हुए करीब 300 करोड़ रुपये के विकास कार्यों के उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा करवाए जाने हैं। इस संबंध में जरूरी निर्देश जारी कर दिए गए हैं।