औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि अगला बादशाह कौन बनेगा? शाही परिवार में उत्तराधिकार का कोई पक्का नियम नहीं था. उस जमाने में इसलिए सिंहासन के दावेदार अक्सर ताकत और सेना के दम पर फैसला करते थे. औरंगजेब के बेटों के बीच भी ऐसा ही संघर्ष हुआ. अंत में उनके बड़े जीवित बेटे मुअज्जम ने जीत हासिल की. वह बहादुर शाह प्रथम के नाम से मुगल बादशाह बना.आइए, बहादुर शाह प्रथम की जन्म जयंती के बहाने इतिहास के झरोखों के जरिए जानते हैं कि 63 की उम्र में गद्दी, सिर्फ 5 साल राज किया, कौन था सबसे बुजुर्ग बादशाह, क्यों नाम मिला शाहे बेखबर?

बहादुर शाह प्रथम के शासन का समय छोटा था. फिर भी उनका गद्दी तक पहुंचना मुगल इतिहास की अहम घटना है. उन्होंने करीब 63 वर्ष की उम्र में सत्ता संभाली. इस वजह से उन्हें गद्दी पर बैठने वाला सबसे उम्रदराज मुगल बादशाह माना जाता है. उनके शासनकाल में भाइयों का युद्ध, राजपूतों से समझौते और सिखों के साथ संघर्ष जैसे कई महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए.
आसान नहीं थी मुअज्जम से बहादुर शाह प्रथम बनने तक की यात्रा
बहादुर शाह प्रथम का जन्म 14 अक्टूबर 1643 को बुरहानपुर में हुआ था. उनका जन्म नाम मिर्जा मुहम्मद मुअज्जम था. वे औरंगजेब के बेटे थे. उन्हें शाह आलम प्रथम के नाम से भी जाना जाता है. सिंहासन पर बैठते समय उनकी उम्र लगभग 63 वर्ष थी. यह बात उन्हें मुगल बादशाहों में अलग पहचान देती है. मुअज्जम ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा शाही प्रशासन और सूबेदारी के कामों में बिताया. वे काबुल के सूबेदार भी रहे. उन्हें शासन का अनुभव था, लेकिन औरंगजेब की मृत्यु के बाद अनुभव से अधिक जरूरी था सेना, सहयोगी और तेज राजनीतिक फैसले. सिंहासन के लिए उनके दो भाई, आजम शाह और कामबख्श भी दावेदार थे.
बहादुर शाह प्रथम.
औरंगजेब के बाद अचानक महसूस होने लगा सत्ता का खालीपन
औरंगजेब की मृत्यु 1707 में हुई. उनके निधन के साथ ही साम्राज्य का केंद्रीय नेतृत्व कमजोर पड़ने की आशंका बढ़ गई. मुगल परंपरा में ज्येष्ठ पुत्र को अपने आप बादशाह मान लेने का नियम नहीं था. राजकुमारों को अपने दावे के लिए लड़ना पड़ सकता था. हर दावेदार अपने समर्थक अमीरों और सेनाओं को जुटाता था. मुअज्जम ने पंजाब से आगरा की ओर कूच किया. उन्होंने अपने पक्ष में कुछ राजपूत सरदारों और मुगल अमीरों का समर्थन हासिल किया. उनके छोटे भाई आजम शाह ने भी तख्त पर दावा किया.
दोनों भाइयों की सेनाएं 1707 में आपस में भिड़ीं. इस युद्ध में आजम शाह और उसके बेटे मारे गए. जीत के बाद मुअज्जम ने बहादुर शाह का खिताब लिया. लेकिन सिंहासन पर बैठना संघर्ष का अंत नहीं था. दक्षिण में उनके भाई कामबख्श ने अपनी सत्ता कायम करने की कोशिश की. बहादुर शाह ने उसके खिलाफ अभियान चलाया. जनवरी 1709 में हैदराबाद के पास हुए युद्ध में कामबख्श हार गया और उसकी मृत्यु हो गई. इस तरह बहादुर शाह ने अपने दोनों प्रतिद्वंद्वी भाइयों को परास्त कर सत्ता पर पकड़ बनाई. उत्तराधिकार का यह संघर्ष बताता है कि मुगल सत्ता में परिवार का रिश्ता भी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से ऊपर नहीं था.
मुगल बादशाह औरंगजेब.
बहादुर शाह प्रथम को क्यों कहा गया शाहे बेखबर?
बहादुर शाह प्रथम को इतिहास में शाहे बेखबर के नाम से भी याद किया जाता है. इस उपाधि का अर्थ मोटे तौर पर ऐसा बादशाह है जो शासन की खबरों या राजकीय कामकाज से बेखबर हो. यह नाम उनके शासन के बारे में बाद के इतिहासकारों की आलोचनात्मक धारणा से जुड़ा है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। कुछ ऐतिहासिक विवरणों में कहा गया है कि दरबार के लोग उन्हें राजकीय कामों में ढिलाई के कारण इस नाम से पुकारते थे. हालांकि, इस उपाधि को पूरी तरह निर्विवाद तथ्य की तरह नहीं देखना चाहिए. बहादुर शाह के शासन में कई राजनीतिक और सैन्य फैसले हुए. उन्होंने राजपूतों से समझौते की राह अपनाई और सिखों के विरुद्ध अभियान भी चलाया. इसलिए शाहे बेखबर का नाम उनके पूरे शासन का निष्पक्ष सार नहीं, बल्कि उनकी प्रशासनिक सक्रियता पर की गई आलोचना के रूप में समझा जाता रहा है.
कैसे थे राजपूतों और सिखों से संबंध?
राजपूताना में बहादुर शाह ने संघर्ष के साथ समझौते का रास्ता भी अपनाया. मारवाड़ के राजा अजीत सिंह और अन्य राजपूत सरदारों के साथ संबंध तनावपूर्ण रहे. लेकिन लंबे संघर्ष से साम्राज्य को होने वाले नुकसान को देखते हुए बहादुर शाह ने कुछ राजपूत शासकों को मान्यता देकर समझौते किए. इससे तत्काल टकराव कम करने की कोशिश हुई. सिखों के साथ संबंध अधिक जटिल रहे. गुरु गोबिंद सिंह और बहादुर शाह के बीच संपर्क और राजनीतिक निकटता के संकेत ऐतिहासिक विवरणों में मिलते हैं. गुरु गोबिंद सिंह की मृत्यु के बाद बंदा सिंह बहादुर के नेतृत्व में मुगल सत्ता के विरुद्ध सिख आंदोलन तेज हुआ. बहादुर शाह ने इस चुनौती का सामना करने के लिए पंजाब में सैन्य अभियान चलाया. इससे उनके शासन के अंतिम वर्षों में साम्राज्य पर दबाव बना रहा.
पांच साल का शासन और उसका महत्व
बहादुर शाह प्रथम का शासन 1707 से 1712 तक चला. इस अवधि को आम तौर पर करीब पांच वर्ष कहा जाता है. कुछ स्रोतों में तारीखों की गणना के आधार पर अवधि को पांच वर्ष से थोड़ा कम बताया गया है. उनकी मृत्यु 27 फरवरी 1712 को लाहौर में हुई. उनके शासनकाल को मुगल साम्राज्य के पतन का अकेला कारण नहीं माना जा सकता. साम्राज्य पहले से ही बड़े भूभाग, राजस्व और सैन्य नियंत्रण से जुड़ी कठिनाइयों का सामना कर रहा था. फिर भी, बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु के बाद उनके बेटों के बीच फिर उत्तराधिकार का संघर्ष हुआ. इससे यह साफ हुआ कि सिंहासन के लिए परिवार के भीतर लड़ाई अब भी मुगल राजनीति की बड़ी कमजोरी थी.
बहादुर शाह प्रथम की ऐतिहासिक पहचान दो पहलुओं से बनती है. वे अधिक उम्र में गद्दी पर बैठने वाले मुगल शासक थे. साथ ही वे ऐसे समय के बादशाह थे जब केंद्रीय सत्ता को बनाए रखना पहले से कठिन हो चुका था. उनके नाम से जुड़ा शाहे बेखबर का संबोधन उनकी छवि का एक हिस्सा है, पर उनके शासन को समझने के लिए उत्तराधिकार के युद्ध, अमीरों की राजनीति और साम्राज्य की चुनौतियों को साथ देखना जरूरी है.



