भारत में बिजली खपत का सीजनल पैटर्न बदलता नजर आ रहा है. आमतौर पर देश में अप्रैल से जुलाई के बीच बिजली की मांग सबसे ज्यादा रहती है. इसकी बड़ी वजह तेज गर्मी और एयर कंडीशनर , कूलर जैसे कूलिंग उपकरणों का बढ़ता इस्तेमाल है. हालांकि, साल 2026 में सितंबर के दौरान बिजली की खपत ने नया ट्रेंड दिखाया है. इस महीने बिजली की मांग मई के स्तर के करीब पहुंच गई और जून को भी पीछे छोड़ दिया.

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2026 में देश में बिजली की खपत 162 अरब यूनिट रही. यह सितंबर 2025 के मुकाबले 11.3% ज्यादा है. वहीं, 10 सितंबर को देश की पीक बिजली डिमांड 269 गीगावाट तक पहुंच गई. यह इस साल मई में दर्ज 270 GW की सबसे ज्यादा पीक डिमांड से महज 1 GW कम थी. यानी जिस सितंबर में आमतौर पर बिजली की मांग घटने लगती है, इस बार उस महीने खपत गर्मियों के रिकॉर्ड के करीब पहुंच गई.
इस बढ़ती मांग के पीछे सिर्फ तापमान में बढ़ोतरी जिम्मेदार नहीं है. मौसम में बदलाव, ज्यादा उमस और खेती में सिंचाई की बढ़ती जरूरत ने भी बिजली की खपत बढ़ाई है. इसके अलावा कमजोर मानसून का असर बिजली उत्पादन पर भी पड़ा है. आइए समझते हैं कि सितंबर में बिजली की मांग बढ़ने के पीछे कौनसी दो बड़ी वजहें हैं.
1. उमस के कारण AC और कूलर का इस्तेमाल बढ़ा
सितंबर में बिजली की खपत बढ़ने की पहली बड़ी वजह उमस और हवा में नमी का ज्यादा होना है. आमतौर पर मानसून के दौरान बारिश होने से तापमान में गिरावट आती है. ऐसे में लोगों को उम्मीद रहती है कि गर्मी से राहत मिलेगी और ACकूलर का इस्तेमाल कम हो जाएगा. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ.
सितंबर 2026 में देश के ज्यादातर हिस्सों में तापमान अप्रैल से जून के मुकाबले कम रहा. भारत मौसम विज्ञान विभाग के सितंबर के क्लाइमेट समरी के मुताबिक, देश के बड़े हिस्से में अधिकतम तापमान 3839 डिग्री सेल्सियस से नीचे रहा. इसके बावजूद बिजली की मांग में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई.
इसकी वजह हवा में मौजूद नमी है. बारिश और मानसून के कारण वातावरण में नमी बढ़ जाती है. ज्यादा उमस होने पर शरीर को पसीने के जरिए गर्मी बाहर निकालने में परेशानी होती है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ऐसे में तापमान बहुत ज्यादा न होने के बावजूद लोगों को गर्मी महसूस होती है. इससे AC और कूलर जैसे उपकरणों का इस्तेमाल जारी रहता है.
यही वजह है कि सितंबर में बिजली की मांग सामान्य मानसूनी महीनों के मुकाबले ज्यादा रही. इससे साफ है कि अब बिजली की खपत को सिर्फ तापमान के आधार पर नहीं समझा जा सकता. हवा में नमी और उमस भी कूलिंग उपकरणों के इस्तेमाल को प्रभावित कर रही है.
2. कमजोर मानसून से खेती में सिंचाई की मांग बढ़ी
बिजली की खपत बढ़ने की दूसरी बड़ी वजह कमजोर मानसून और कम बारिश है. भारत में खेती का बड़ा हिस्सा अब भी मानसूनी बारिश पर निर्भर है. जब बारिश सामान्य से कम होती है, तो किसानों को फसलों की जरूरत पूरी करने के लिए ट्यूबवेल और इलेक्ट्रिक पंप से सिंचाई करनी पड़ती है. इससे कृषि क्षेत्र में बिजली की मांग बढ़ जाती है.
सितंबर में बारिश की कमी के चलते कई इलाकों में किसानों को सिंचाई के लिए ज्यादा बिजली का इस्तेमाल करना पड़ा. इसका असर देश की कुल बिजली खपत पर भी दिखाई दिया. आमतौर पर मानसून के दौरान बारिश से खेतों में पानी की जरूरत कम हो जाती है, लेकिन कमजोर बारिश इस पैटर्न को बदल देती है.
कम बारिश का असर सिर्फ बिजली की खपत तक सीमित नहीं रहा. इससे हाइड्रोपावर यानी जलविद्युत उत्पादन पर भी दबाव पड़ा. देश में हाइड्रोपावर प्लांट बिजली बनाने के लिए बांधों और जलाशयों के पानी का इस्तेमाल करते हैं. जब बारिश कम होती है, तो जलाशयों में पानी का लेवल प्रभावित हो सकता है. इससे बिजली उत्पादन की क्षमता पर भी असर पड़ता है.
इस तरह कमजोर मानसून ने एक तरफ सिंचाई के लिए बिजली की मांग बढ़ाई, वहीं दूसरी तरफ जलविद्युत उत्पादन के लिए चुनौती खड़ी की. यानी बिजली की खपत और उत्पादन, दोनों पर मौसम का असर देखने को मिला.
जुलाईसितंबर में पीक डिमांड 18% बढ़ी
बिजली की मांग में यह बढ़ोतरी सिर्फ सितंबर तक सीमित नहीं है. फिनलैंड स्थित गैरलाभकारी संस्था सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के 12 अक्टूबर 2026 के आकलन के मुताबिक, जुलाईसितंबर 2026 के दौरान देश की पीक बिजली डिमांड 18% बढ़कर 270 GW हो गई. एक साल पहले इसी अवधि में यह 230 GW थी. राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 2727 GW की पीक डिमांड दर्ज की गई. इसके बाद गुजरात में 23 GW, तमिलनाडु में 20 GW और कर्नाटक में 16 GW की मांग रही.
कुल मिलाकर, सितंबर 2026 में बिजली की खपत बढ़ना इस बात का संकेत है कि देश में बिजली की मांग अब सिर्फ गर्मियों की तेज गर्मी से तय नहीं हो रही. उमस, बारिश की कमी और खेती में सिंचाई की जरूरत जैसे फैक्टर भी बिजली की मांग को प्रभावित कर रहे हैं. आने वाले समय में बिजली की मांग का अनुमान लगाने के लिए इन मौसमी बदलावों को समझना भी जरूरी होगा.



