नए मतदाताओं को चुनावी परंपरा से जोड़ने वाले फॉर्म6 में बदलाव को लेकर सीजेआई सूर्यकांत के स्पष्ट रुख के बाद भारतीय चुनाव आयोग का अर्धसत्य सार्वजनिक हो गया है. आयोग के मुताबिक, फॉर्म6 में सिर्फ डिक्लेरेशन फॉर्म जोड़ा गया, कोई बदलाव नहीं किया गया. सवाल ये है कि क्या आयोग अपनी मर्जी से इस फॉर्म में कुछ जोड़ या घटा सकता है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। तो बता दें कि यह एक वैधानिक फॉर्म है, जिसमें किसी भी तरह के संशोधन या बदलाव का अधिकार केवल केंद्र सरकार के कानून मंत्रालय और संसद के पास है.

कानूनविदों की मानें, तो फॉर्म6 में अलग से एक पन्ना जोड़ना और उसे अनिवार्य किया जाना बदलाव है. यह मंजूरी सरकार, संसद से नहीं ली गई और अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कर दिया है कि उसने कोई मंजूरी नहीं दी है. ऐसे में चुनाव आयोग आधा सच ही बोल रहा है कि उसने फॉर्म6 में घोषणा पत्र जोड़ा, जबकि इससे होने वाले बदलाव को सिरे से नकार रहा है. अब देखना ये है कि इस अर्धसत्य पर सुप्रीम कोर्ट का आगे होने वाली सुनवाई में क्या रुख रहता है.

कानून में तय है फॉर्म6 का पूरा ढांचा

दरअसल, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम1950 और निर्वाचकों का पंजीकरण नियम1960 के तहत फॉर्म6 का कानूनी ढांचा तय होता है. ऐसे में उसमें कुछ जोड़ना और कम करना आयोग के दायरे से बाहर है. फॉर्म6 आजादी के 12 साल बाद नए मतदाताओं के पंजीकरण के रूप में अस्तित्व में आया. इसके बाद साल 2021 में चुनाव कानून में हुए संशोधन के बाद सरकार के कानून मंत्रालय के विधायी विभाग ने 17 जून 2022 को नियमों और फॉर्म 6 में आधिकारिक रूप से बड़े बदलाव अधिसूचित किए.

18 की उम्र पूरी करने वालों के लिए साल में चार मौके

इस संशोधन के बाद युवाओं को साल में 4 बार 18 साल की उम्र पूरी करने पर नाम जुड़वाने की सुविधा मिली. इसके बाद इसी साल बिहार SIR के दौरान चुनाव आयोग ने जून में ऑनलाइन फॉर्म6 में एक अतिरिक्त डिक्लेरेशन फॉर्म अनिवार्य कर दिया. इस डिक्लेरेशन फॉर्म को भरे बिना फॉर्म6 को सब्मिट तक नहीं किया जा सकता था. ऐसे में यह फॉर्म महज एक औपचारिकता रह गई, जबकि डिक्लेरेशन फॉर्म प्रमुख हो गया.

SC ने नहीं दी डिक्लेरेशन फॉर्म जोड़ने की मंजूरी

आयोग ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म6 में डिक्लेरेशन फॉर्म जोड़ने की इजाजत दी, जिस पर सीजेआई सूर्यकांत ने स्पष्टता ला दी कि ऐसा नहीं है. हालांकि, बिहार SIR के फैसले में डिक्लेरेशन फॉर्म का जिक्र किया गया है, लेकिन अनुमति या अस्वीकृति फैसले में नहीं की गई है. ऐसे में सीजेआई की टिप्पणी उनके और जस्टिस जॉयमाला बागची की दो सदस्यीय सुप्रीम कोर्ट की बेंच के फैसले में घोषणा पत्र को मंजूरी नहीं दिए जाने का इशारा करती है.

आयोग ने SIR के तीन चरणों के लिए बिहार से लेकर 32 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में फॉर्म6 में घोषणा पत्र जोड़ दिया. विपक्ष का आरोप है कि इसके चलते बड़े पैमाने पर लोग मतदाता सूची से बाहर हो गए और जहां SIR जारी है, वहां भी बाहर होंगे. खास बात ये है कि फॉर्म6 में बदलाव के निर्णय पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से दोनों चुनाव आयुक्त सहमत नहीं थे. हालांकि, आयोग ने सार्वजनिक बयान में यह कहा है सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए.

डिक्लेरेशन फॉर्म को जोड़ने और हटाने की समयरेखा इस प्रकार है

24 जून 2025: चुनाव आयोग ने बिहार में SIR का आदेश दिया और पहली बार फॉर्म 6 और 8 के साथ ‘एनेक्सर डी’ नाम से एक अलग घोषणापत्र जोड़ा. इसमें नए आवेदकों से उनके या उनके परिवार के सदस्यों के पुरानी मतदाता सूचियों में नाम होने की जानकारी मांगी गई थी.

27 अक्टूबर 2025: इस व्यवस्था को दूसरे चरण के तहत 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया गया.

14 मई 2026: तीसरे चरण में इसे 19 अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी विस्तारित किया गया.

जुलाई 2026: ऑनलाइन ECINET पोर्टल में तकनीकी बदलाव कर इस डिक्लेरेशन को फॉर्म 6 के भीतर ही अनिवार्य रूप से जोड़ दिया गया, जिसके बिना ऑनलाइन फॉर्म सब्मिट नहीं हो पा रहा था.

2930 सितंबर 2026: चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बाद, आयोग ने बड़ा फैसला लिया. 30 सितंबर 2026 की रात को उन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से इस अतिरिक्त डिक्लेरेशन फॉर्म को हटा दिया गया, जहां SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है. अब वहां के नए मतदाताओं को केवल सामान्य वैधानिक फॉर्म 6 ही भरना होगा.

ऐतिहासिक कानूनी संशोधन : इससे पहले, चुनाव नियमों में औपचारिक और वैधानिक बदलाव 17 जून 2022 को कानून मंत्रालय की अधिसूचना के जरिए किया गया था. 2021 के चुनाव कानून संशोधन के बाद जून 2022 में नियमों और फॉर्म 6 में कानूनी रूप से बदलाव लागू किए गए थे.

वर्तमान स्थिति : 5 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत ने किसी संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी है. कोर्ट अब चुनाव आयोग से रिकॉर्ड मांगकर जांच कर रहा है कि यह अतिरिक्त बदलाव किसकी अनुमति से और कैसे किया गया था.