International Tiger Day: हर साल 29 जुलाई को इंटरनेशनल टाइगर डे मनाया जाता है। भारत में पाए जाने वाले बाघ रॉयल बंगाल टाइगर प्रजाति के हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा जंगली बाघ भारत में पाए जाते हैं। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। भारत के जंगलों, घास के मैदानों और मैंग्रोव इलाकों में रहने वाले ये बाघ अपनी ताकत, अनुकूलन क्षमता और अलगअलग जगहों पर जीवित रहने की ताकत के लिए जाने जाते हैं। भारत को दुनिया की टाइगर कैपिटल कहा जाता है। भारत के टाइगर अपनी खासियत की वजह से दूसरे देशों के बाघों से अलग हैं।

आकार और ताकत में दमदार

भारत के बाघ आमतौर पर दुनिया के सबसे बड़े बाघों में गिने जाते हैं। एक वयस्क नर का वजन 180 से 260 किलोग्राम तक हो सकता है। वहीं कुछ बाघों का वजन इससे ज्यादा भी दर्ज किया गया है। बाघों की मजबूत मांसपेशियां, लंबी छलांग लगाने की क्षमता और शक्तिशाली जबड़े इन्हें बेहद खतरनाक शिकारी बनाते हैं।

जंगल के हिसाब से खुद को बदल लेते हैं टाइगर

भारत के टाइगर्स की सबसे बड़ी खासियत उनकी अनुकूलन क्षमता है। मध्य भारत के घने जंगलों से लेकर सुंदरवन के खारे मैंग्रोव, असम के घास के मैदान और हिमालय की तराई तक, ये अलगअलग परिस्थितियों में आसानी से रहते हैं। वहीं रूस के साइबेरियन बाघ मुख्य रूप से बर्फीले जंगलों में और इंडोनेशिया के सुमात्रा बाघ केवल वर्षा वनों में ही पाए जाते हैं।

भारत के बाघों पर धारियों का पैटर्न अलग

भारतीय बाघों के शरीर पर बनी काली धारियों का पैटर्न अलग होता है। ये ठीक वैसे ही है जैसे इंसानों के फिंगर प्रिंट अलगअलग होते हैं। वन विभाग और वैज्ञानिक इन्हीं धारियों की मदद से कैमरा ट्रैप तस्वीरों में हर बाघ की पहचान करते हैं।

दूसरे देशों के बाघों से सबसे बड़ा अंतर

साइबेरियन बाघ भारतीय बाघों से आकार में कुछ बड़े हो सकते हैं, लेकिन उनके शरीर पर फर ज्यादा घना होता है ताकि वे बर्फीले मौसम में जीवित रह सकें। वहीं सुमात्रा के बाघ आकार में छोटे और घने जंगलों के अनुरूप ज्यादा फुर्तीले होते हैं। भारत के बाघ इन दोनों के बीच संतुलित आकार, ताकत और अलगअलग आवासों में रहने की क्षमता के कारण सबसे अलग पहचान रखते हैं।

भारत की शान हैं रॉयल बंगाल टाइगर

भारतीय बाघ केवल एक वन्य जीव नहीं, बल्कि देश की जैव विविधता, प्राकृतिक विरासत और संरक्षण प्रयासों के प्रतीक हैं। उनकी बढ़ती संख्या इस बात का प्रमाण है कि यदि मजबूत नीति, वैज्ञानिक प्रबंधन और जनभागीदारी साथ हों तो संकटग्रस्त प्रजातियों को भी सुरक्षित भविष्य मिल सकता है।

भारत में 1973 में शुरू हुआ था प्रोजेक्ट टाइगर

भारत ने 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू किया था। इसके बाद टाइगर रिजर्व की संख्या लगातार बढ़ाई गई। बाघों के शिकार पर सख्ती से रोक लगाई गई। यही वजह है कि भारत में बाघों की संख्या में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। आज दुनिया के ज्यादातर जंगली बाघ भारत में ही पाए जाते हैं, जो संरक्षण के क्षेत्र में भारत की बड़ी सफलता है।