Muzaffarnagar News: कांवड़ यात्रा में लाखों शिवभक्तों की आस्था के तरहतरह के रंग देखने को मिलते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जनपद में एक ऐसा शिवभक्त पहुंचा है जिसकी निष्ठा और भक्ति देखकर हर कोई हैरान है. मुजफ्फरनगर के बिटावदा गांव के रहने वाले बुजुर्ग सत्येंद्र बचपन से ही दृष्टिहीन हैं, लेकिन आंखों की रोशनी न होने के बावजूद भोलेनाथ के प्रति उनका समर्पण डगमगाया नहीं है.

दृष्टिहीन सत्येंद्र केवल एक लाठी के सहारे इस वर्ष अपनी 17वीं कावड़ यात्रा पूरी कर रहे हैं. दरअसल, मुजफ्फरनगर जिले के बिटावदा गांव के रहने वाले बुजुर्ग सत्येंद्र बचपन से ही दोनों आंखों की रोशनी न होने से दिव्यांग हैं. शारीरिक अक्षमता के बावजूद उनके मन में भगवान शिव के प्रति अटूट श्रद्धा है, जो उन्हें हर साल कावड़ उठाने की शक्ति देती है. सत्येंद्र का मानना है कि इस जन्म का अंधेरा उनके पूर्व जन्मों के कर्मों का फल हो सकता है, जिसे भगवान भोलेनाथ की भक्ति ही दूर कर सकती है.

3 दिन में हरिद्वार से मुजफ्फरनगर का सफर

सत्येंद्र ने 2 अगस्त को हरिद्वार की पवित्र हर की पौड़ी से गंगाजल उठाया था. बिना किसी व्यक्तिगत साथी के, केवल अपनी लाठी टेकते हुए वह 3 दिन में हरिद्वार से मुजफ्फरनगर पहुंच गए. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। पूरे रास्ते वह किसी रिश्तेदार के बिना अकेले ही बढ़ते रहे और राह में भोलेनाथ का नाम जपते रहे.

रास्ते में साथी बने अनजान शिवभक्त

सत्येंद्र बताते हैं कि रास्ते में मिलने वाले अन्य कावड़िए उनकी स्थिति देखकर आगे आते हैं और सड़क पार कराने में मदद करते हैं. सहयात्री कुछ दूरी तक उनका हाथ पकड़कर रास्ता दिखाते हैं और फिर वह अपनी लाठी के सहारे आगे बढ़ते रहते हैं. कावड़ मार्ग पर श्रद्धालुओं का सहयोग उन्हें कभी अकेलापन या डर महसूस नहीं होने देता.

‘भोलेनाथ दें सुखशांति, कट जाएं पिछले पाप’

सत्येंद्र ने बताया मैं बिटावद गांव का रहने वाला हूं. मुझे आंखों से नहीं दिखता, यह मेरी 17वीं कावड़ है. मैंने 2 अगस्त को कावड़ उठाई थी और 3 दिन में यहां मुजफ्फरनगर पहुंच गया हूं. मैं कावड़ इसलिए लाता हूं ताकि पिछले जन्मों के पाप धुल जाएं. बाकी तो इंसान को अपने कर्म ही भुगतने पड़ते हैं. भोलेनाथ से बस यही चाहता हूं कि जीवन में सुखशांति दे दें. मेरे साथ कोई नहीं था, रास्ते में भोले ही थोड़ाथोड़ा साथ लेकर आए हैं.