इंसान का मस्तिष्क यानी दिमाग दुनिया की सबसे जटिल संरचनाओं में से एक है. शरीर के कई हिस्सों को हम उम्र के साथ बदलाव होते देखते है, लेकिन दिमाग के साथ ऐसा नहीं है. यह कैसे विकसित होता है, उम्र बढ़ने के साथ इसमें क्या बदलाव आते हैं और अलगअलग बीमारियां इसके किन हिस्सों को किस तरह प्रभावित करती हैं. क्या मस्तिष्क का एक विस्तृत नक्शा डॉक्टरों को बीमारियों को बेहतर ढंग से समझने, सर्जरी की योजना बनाने और भविष्य में ज़्यादा असरदार इलाज विकसित करने में मदद कर सकता है?, ऐसे तमाम सवाल हैं जिनके जवाब अब भी पूरी तरह नहीं मिल पाए हैं. इसी दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास एक बड़ी परियोजना पर काम कर रहा है.

IIT मद्रास का ‘सुधा गोपालकृष्णन ब्रेन सेंटर’ इन सवालों के जवाब खोजने के लिए 100 मानव मस्तिष्कों के विस्तृत थ्रीडायमेंशनल नक्शे तैयार कर रहा है. इनमें भ्रूण से लेकर 85 साल के व्यक्ति तक के मस्तिष्क शामिल हैं. इसका मकसद अल्जाइमर, ऑटिज्म, स्ट्रोक और अन्य तंत्रिका संबंधी विकारों को कोशिका स्तर पर समझना और वैश्विक शोधकर्ताओं के लिए डेटा उपलब्ध कराना है.
दिमाग में उम्र बढ़ने के साथ क्या बदलाव आते हैं
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया यह प्रोजेक्ट, पूरे जीवनकाल के दौरान मानव मस्तिष्क को कोशिकीय स्तर पर मैप करने की दिशा में दुनिया का अपनी तरह का पहला प्रयास माना जा रहा है. मानव मस्तिष्क का यह थ्रीडायमेंशनल रेफरेंस मैप, मस्तिष्क की संरचनाओं और कोशिकाओं को दिखाएगा. साथ ही, यह भी बताएगा कि ये किस तरह व्यवस्थित हैं और उम्र बढ़ने के साथसाथ इनमें क्या बदलाव आते हैं.
सुधा गोपालकृष्णन ब्रेन सेंटर के प्रमुख, प्रोफेसर मोहनशंकर शिवप्रकाशम ने बताया कि आज हमारे पास इस बात की विस्तृत जानकारी नहीं है कि जीवन भर मानव मस्तिष्क और उसकी संरचनाएं कैसी दिखती हैं. उन्होंने कहा कि अन्य अंगों के विपरीत, मस्तिष्क लगातार विकसित होता रहता है. हमें एक ऐसे मैप की जरूरत है जिससे पता चले कि अलगअलग उम्र में मस्तिष्क कैसा दिखता है. तभी हम इस जानकारी का इस्तेमाल चिकित्सा के क्षेत्र में कर पाएंगे.
मानव मस्तिष्क का मैप कैसे तैयार किया जाता है?
इस प्रक्रिया की शुरुआत दान किए गए मस्तिष्क को जमाकर होती है, ताकि उसे बहुत पतले हिस्सों में काटा जा सके. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। हर हिस्से की मोटाई 10 से 20 माइक्रोन के बीच होती है जो मानव बाल की मोटाई का लगभग दसवां हिस्सा है.
इसके बाद हर हिस्से की इमेज ली जाती है, और फिर इन जानकारियों को जोड़कर मस्तिष्क का एक विस्तृत 3D मॉडल तैयार किया जाता है.
प्रोफेसर शिवप्रकाशम के अनुसार, एक वयस्क के मस्तिष्क से 8,000 से 10,000 हिस्से मिल सकते हैं, जबकि भ्रूण के मस्तिष्क के लिए लगभग 3,000 और छोटे बच्चे के मस्तिष्क के लिए लगभग 5,000 हिस्सों की आवश्यकता हो सकती है. इस केंद्र ने बड़े पैमाने पर इस प्रक्रिया को अंजाम देने के लिए अपने खुद के उपकरण और सिस्टम विकसित किए हैं. उन्होंने बताया ‘हमें एक ऐसी तकनीक की जरूरत है जो मस्तिष्क को बहुत पतले टुकड़ों में काट सके, हर टुकड़े की इमेज ले सके और फिर उन्हें जोड़कर एक बड़ा 3D मैप तैयार कर सके’.
पारंपरिक ब्रेन इमेजिंग के विपरीत, जो जीवित मरीज के मस्तिष्क की तस्वीर दिखाती है, इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य सेलुलर स्तर पर मस्तिष्क की भौतिक संरचनाओं का विस्तृत मैप तैयार करना है. आमतौर पर, MRI स्कैन मिलीमीटर के स्तर पर जानकारी देता है. ये नए एटलस मस्तिष्क की सेलुलर संरचना की कहीं अधिक बारीक तस्वीर पेश करते हैं, जिससे ऐसी जानकारियां सामने आ सकती हैं जिन्हें पारंपरिक इमेजिंग के जरिए नहीं देखा जा सकता.
भ्रूण से लेकर बुढ़ापे तक मस्तिष्क का मैप
इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य यह समझना है कि मानव मस्तिष्क की संरचनाएं कैसे विकसित होती हैं, उनमें क्या बदलाव आते हैं और उम्र के साथ वे कैसे बदलती हैं. भ्रूण के मस्तिष्क, बच्चे के मस्तिष्क और बुजुर्ग के मस्तिष्क की बनावट और विकास में काफी अंतर होता है. इन अलगअलग चरणों के लिए ‘रेफरेंस मैप’ तैयार करने से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि अलगअलग उम्र में क्या सामान्य है, और साथ ही यह जानने में भी मदद मिलेगी कि असामान्यताएं कहां और कैसे पैदा होती हैं.
इस केंद्र ने 2025 में ‘धरणी’ नाम से मैप्स का अपना पहला सेट जारी किया. प्रोफेसर शिवप्रकाशम के अनुसार, तब से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रूण के मस्तिष्क एटलस का बड़े पैमाने पर संदर्भ के रूप में उपयोग किया जा रहा है. उन्होंने बताया कि केंद्र अपने सभी मैप्स को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने की योजना बना रहा है, ताकि दुनिया भर के शोधकर्ता और चिकित्सा संस्थान इनका उपयोग कर सकें.
इस काम में लगभग 200 वैज्ञानिक शामिल हैं, जो लाइफ साइंसेज, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों से जुड़े हैं. ये ऐसे विषय हैं जो पारंपरिक रूप से अक्सर एकदूसरे से अलग रहकर काम करते आए हैं.
उन्होंने कहा कि न्यूरोसाइंस के क्षेत्र में पूरी दुनिया अभी पीछे है. अब जरूरत इस बात की है कि न्यूरोसाइंस और इंजीनियरिंग के मिलन बिंदु पर शोध किया जाए. उन्होंने विज्ञान की सबसे जटिल चुनौतियों में से एक से निपटने के लिए अलगअलग विषयों को मिलाकर काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया.
इस काम के महत्व को समझने का एक तरीका यह है कि न्यूरोसाइंस की तुलना कार्डियोलॉजी से की जाए.
हृदय की संरचना और कार्यप्रणाली की विस्तृत समझ के कारण कार्डियोलॉजी और कार्डियक सर्जरी के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है. वहीं दूसरी ओर, मस्तिष्क के बारे में हमारी समझ अभी भी बहुत सीमित है.
क्या ये मैप्स दिमागी बीमारियों के इलाज में मदद कर सकते हैं?
इनके मेडिकल इस्तेमाल की काफी संभावनाएं हैं, हालांकि ये मैप्स खुद कोई इलाज नहीं हैं. दिमाग की संरचनाओं को और गहराई से समझने से, शोधकर्ताओं को विकास संबंधी विकारों और स्ट्रोक से लेकर न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों तक, कई तरह की स्थितियों की जांच करने में मदद मिल सकती है.
यह केंद्र RNA सीक्वेंसिंग के जरिए दिमाग के अलगअलग हिस्सों की आणविक विशेषताओं का भी अध्ययन कर रहा है. यह समझकर कि दिमाग के खास हिस्सों में कौन सी आणविक प्रक्रियाएं होती हैं, वैज्ञानिक विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए दवाएं बनाने हेतु संभावित ‘टारगेट’ की पहचान करना चाहते हैं.
ये एटलस न्यूरोसर्जन की भी मदद कर सकते हैं; ये उन्हें विस्तृत संरचनात्मक रेफरेंस मैप्स उपलब्ध कराते हैं, जिससे उन्हें उन हिस्सों को समझने में आसानी होती है, जहां वे सर्जरी करते हैं. शिवप्रकाशम ने कहा,’अब हम सेलुलर स्तर की बारीकियों के साथ दिमाग के रेफरेंस मैप्स तैयार कर सकते हैं’.
यह केंद्र CMC वेल्लोर, KMC और सविता सहित 10 से अधिक मेडिकल संस्थानों के साथ मिलकर काम कर रहा है, ताकि इस शोध और इसके संभावित क्लिनिकल इस्तेमाल को और मजबूत किया जा सके.
स्ट्रोक से प्रभावित मस्तिष्क की मैपिंग
प्रधानमंत्री द्वारा पेश की गई प्रमुख पहलों में से एक ‘CSTROKE’ है. इसे एक ऐसे अनोखे एटलस के रूप में बताया गया है, जो स्ट्रोक से प्रभावित पूरे मानव मस्तिष्क की मैपिंग करता है. CSTROKE की मदद से शोधकर्ता पूरे मस्तिष्क के संदर्भ में, अलगअलग स्तरों और कोणों से, प्रभावित हिस्से की जांच कर सकते हैं.
प्रोफेसर ने कहा ‘हमारे पास पूरे मानव मस्तिष्क का हर स्तर और कोण से पूरा दृश्य मौजूद है, जिसमें स्ट्रोक से प्रभावित हिस्सा भी शामिल है’. यह जानकारी वैज्ञानिकों को दवाओं के लिए बेहतर लक्ष्य खोजने में मदद कर सकती है. साथ ही, इससे यह समझने में भी मदद मिलेगी कि स्ट्रोक अलगअलग लोगों को अलगअलग तरह से क्यों प्रभावित करता है.
AI, डेटा और नोबेल पुरस्कार की महत्वाकांक्षा
प्रोफेसर के अनुसार, सेलुलर स्तर पर पूरे मस्तिष्क की मैपिंग करने से बहुत बड़ी मात्रा में जानकारी यानी पेटाबाइट्स डेटा तैयार होती है. इसे उपयोगी बनाने के लिए, केंद्र ने एक विज़ुअलाइज़ेशन प्लेटफ़ॉर्म बनाया है, जिसके ज़रिए शोधकर्ता इन मैप्स को देख और समझ सकते हैं. उम्मीद है कि डेटा को विज़ुअलाइज़ करने, पैटर्न खोजने, नई खोजों की पहचान करने और अलगअलग स्तरों पर संरचनाओं का विश्लेषण करने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक अहम भूमिका निभाएगा.
केंद्र ने एक AI रिसर्च असिस्टेंट भी विकसित किया है, जो यूज़र्स को सवाल पूछने की सुविधा देता है, जिससे उन्हें इतनी विशाल जानकारी को समझने और खंगालने में मदद मिलती है. शिवप्रकाशम ने बताया कि यहां आने वाले कई नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने कहा है कि इस प्लेटफ़ॉर्म में ऐसे काम में मदद करने की क्षमता है, जो आगे चलकर नोबेल पुरस्कार दिलाने वाला साबित हो सकता है.
हालांकि, प्रोफेसर ने इस महत्वाकांक्षा को पुरस्कारों के बजाय वैज्ञानिक प्रभाव के नज़रिए से देखा है. उन्होंने कहा कि हम विज्ञान को एक बड़े स्तर पर आगे ले जाना चाहते हैं. अगर हम ऐसा कर पाते हैं, तो बाकी चीज़ें अपने आप हो जाएंगी.



