Saturday, April 4, 2026
Politics

राघव चड्ढा के सामने क्यों बेबस है AAP? पार्टी से क्यों नहीं निकाल पा रहे केजरीवाल!..

राघव चड्ढा के सामने क्यों बेबस है AAP? पार्टी से क्यों नहीं निकाल पा रहे केजरीवाल!..
राघव चड्ढा के सामने क्यों बेबस है AAP? पार्टी से क्यों नहीं निकाल पा रहे केजरीवाल!..

Why AAP helpless in front of Raghav Chadha? आम आदमी पार्टी अपने वरिष्ठ नेता राघव चड्ढा (Raghav Chadha) को राज्यसभा में उपनेता पद से हटा चुकी है. साथ ही उसने राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर उन्हें बोलने देने के लिए समय न देने का आग्रह भी किया है. पार्टी नेताओं का आरोप है कि चड्ढा, बीजेपी के साथ अंदरखाने समझौता कर चुके हैं. इसीलिए वे मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलना छोड़ चुके हैं. यह सब कुछ करने के बावजूद पार्टी उन्हें बाहर का रास्ता नहीं दिखा पा रही है और न ही राज्यसभा से उनकी सदस्यता खत्म करवा पा रही है. आखिर संसद के वे कौन से नियम हैं, जिन्होंने केजरीवाल के ‘हाथ’ ने बांध रखे हैं!

राज्यसभा सदस्य हैं राघव चड्ढा
संवैधानिक जानकारों के मुताबिक, राघव चड्ढा राज्यसभा के सदस्य हैं. इस नाते पार्टी उनकी सदस्यता अपने किसी फैसले के जरिए एकाएक खत्म नहीं कर सकती. देश के संविधान और संसद के नियमों में किसी सांसद को पद से हटाने या अयोग्य घोषित करने की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से बताई गई है. इस प्रक्रिया को दरकिनार कर कोई भी पार्टी अपनी मर्जी से लागू नहीं कर सकती.

ऐसा ही संसद का एक नियम है दल-बदल विरोधी कानून. यह कानून संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल है. इस कानून के तहत, कोई सांसद तभी अयोग्य ठहराया जा सकता है, जब वह अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ दे या व्हिप के खिलाफ वोट करे. यानी, जब तक राघव चड्ढा खुद पार्टी नहीं छोड़ते या पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर मतदान नहीं करते, तब तक AAP चाहकर भी उनकी संसद सदस्यता खत्म नहीं करवा सकती.

क्या सांसदी खत्म करवा सकती है AAP?
दूसरी बात ये है कि राज्यसभा की सदस्यता खत्म करने का अधिकार भी सीधे पार्टी के पास नहीं होता. यह अधिकार सभापति के हाथ में होता है. अगर उनके खिलाफ कोई मामला बनता है, तो उसे जांच के लिए विशेषाधिकार समिति को भेजा जाता है. वहां पर जांच में पुष्टि होने के बाद उक्त सदस्य को बर्खास्त करने के लिए प्रस्ताव सदन में पेश किया जाता है. वहां से बहुमत के आधार पर प्रस्ताव पास होने पर उसकी सदस्यता खत्म हो जाती है.

इस मामले में राघव चड्ढा के साथ AAP की स्थिति ‘लव एंड हेट’ की स्थिति साफ नजर आती है. एक ओर तो राघव चड्ढा पार्टी के प्रमुख और लोकप्रिय चेहरों में शामिल हैं, जो संसद में जनता से जुड़े मुद्दों को लगातार उठा रहे हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। वहीं, मोदी सरकार के खिलाफ उनकी रणनीतिक चुप्पी ने पार्टी को असहज स्थिति में डाल रखा है. AAP न तो उन्हें पूरी तरह समर्थन देने की स्थिति में दिखती है और न ही सख्त कार्रवाई कर पाने में सक्षम है.

चड्ढा का कद बढ़ने से पार्टी में असहजता
पार्टी के सामने दिक्कत ये है कि अगर राघव चड्ढा को इसी तरह छूट दी जाती रही तो उनका कद दल से ऊपर हो सकता है. साथ ही संसद के अंदर मोदी सरकार के खिलाफ उसकी आवाज भी मंद पड़ सकती है. वहीं अगर कार्रवाई करके उन्हें पार्टी से बर्खास्त किया तो राघव चड्ढा आजाद हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में उनकी राज्यसभा सदस्यता पर तो कोई असर नहीं पड़ेगा. इसके उलट स्वाति मालिवाल की तरह वे खुलकर पार्टी पर हमलावर हो सकते हैं. जो पार्टी की चुनावी संभावनाओं को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है.

इसके बावजूद AAP ने राघव चड्ढा को उपनेता पद से हटाकर एक राजनीतिक संदेश जरूर दे दिया है. वह संदेश ये है कि पार्टी का जो भी नेता संगठन की लाइन से अलग चलेगा, उसका भविष्य पार्टी में अच्छा नहीं होगा. उसे संगठन में साइडलाइन किया जा सकता है और चुनावों में टिकट से महरुम किया जा सकता है. फिर भी, राघव चड्ढा अब आम आदमी पार्टी के लिए ऐसी हड्डी बन गए हैं, जिसे वह न निगल पा रही है और न ही उगल.

पार्टी की ‘बेबसी’ की सबसे बड़ी वजह
अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी है कि पार्टी आगे इस मामले में क्या कदम उठाती है और राघव चड्ढा की ओर से इस मामले में क्या रिएक्शन आता है. फिर भी. यह साफ है कि संसदीय नियमों और संविधान की व्यवस्था के चलते AAP के पास सीमित विकल्प ही मौजूद हैं और यही उनकी ‘बेबस’ स्थिति की सबसे बड़ी वजह है.

me.sumitji@gmail.com

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