Friday, December 5, 2025
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महिलाओं की खतना पर पाबंदी: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को क्यों भेजा नोटिस, क्या है याचिका में मांग?!..

महिलाओं की खतना पर पाबंदी: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को क्यों भेजा नोटिस, क्या है याचिका में मांग?!..
महिलाओं की खतना पर पाबंदी: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को क्यों भेजा नोटिस, क्या है याचिका में मांग?!..

Supreme Court On Female Genital Cutting: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय में प्रचलित महिला जननांग काटने (FGM) या महिला खतना की प्रथा पर रोक लगाने के लिए दायर याचिका की सुनवाई करने का फैसला लिया है. खास रूप से यह प्रथा दाउदी बोहरा समुदाय में देखने को मिलती है. कोर्ट ने न्यायमूर्ति बी.वी. नगरथना और र. महादेवन की बेंच ने केंद्र और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है. यह याचिका एनजीओ चेतना वेलफेयर सोसाइटी ने दायर की है. याचिका में कहा गया है कि यह प्रथा इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है और यह बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन करती है.

अपराध के तहत आती है ये प्रथा
याचिका में यह भी कहा गया है कि इस प्रथा पर कोई स्वतंत्र कानून मौजूद नहीं है. हालांकि, यह भारतीय दंड संहिता की धारा 113, 118(1), 118(2) और 118(3) अपराधों के तहत आता है. इसके अलावा, POCSO एक्ट के तहत भी किसी नाबालिग की जननांग को बिना चिकित्सा कारण छूना अपराध है.

स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदायक
याचिका में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के हवाले से कहा गया है कि FGM लड़कियों और महिलाओं के मानव अधिकारों का उल्लंघन है. यह प्रथा स्वास्थ्य के लिए भी बहुत खतरनाक है. इसके कारण संक्रमण, बच्चे को जन्म देने में समस्या और अन्य गंभीर शारीरिक परेशानियां हो सकती हैं. याचिका में यह भी बताया गया है कि यह प्रथा यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन करती है. याचिका में आग्रह किया गया है कि इसे पूरी तरह से बंद किया जाए ताकि बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके.

सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले में केंद्र और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है. इस पर फैसला आने के बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि भारत में महिला जननांग काटने की प्रथा पर किस प्रकार की कानूनी रोक लगाई जा सकती है.

यह मामला समाज में बालिका सुरक्षा, महिला अधिकार और धर्म की प्रथाओं के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए जरूरी माना जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का निर्णय आने के बाद पूरे देश में इस प्रथा के खिलाफ कानून और जागरूकता को बढ़ावा मिलेगा.

me.sumitji@gmail.com

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