Himachal Se: भोपाल के बरकतुल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलकर वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय किए जाने के प्रस्ताव से उठे विवाद के बीच तमाम लोग उन बरकतुल्ला भोपाली के विषय में जानने के लिए इतिहास के पन्ने पलट रहे हैं, जिनके नाम से फिलहाल यह विश्वविद्यालय जाना जा रहा है. 1970 में स्थापित भोपाल विश्वविद्यालय में 1988 में बरकतुल्ला का नाम जुड़ा. विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसमें विश्वविद्यालय को बरकतउल्ला के स्थान पर वाग्देवी भोजपाल का नाम दिया जाना है. प्रस्ताव अंतिम स्वीकृति के लिए राज्यपाल के पास भेजा गया है.

जाहिर है कि नाम परिवर्तन की बहस ने समर्थन और विरोध की आवाजों को मुखर किया है. नाम बदले जाने का विरोध कराने वाले ऐसी कोशिश को महान स्वतंत्रता सेनानी बरकतउल्ला भोपाली की स्मृति का अपमान और कृतघ्नता बता रहे हैं. कौन थे बरकतउल्ला भोपाली? पढ़िए उनकी कहानी.
विदेशी धरती पर भी लड़ी गई भारत की आजादी की लड़ाई
ब्रिटिश गुलामी के विरुद्ध आजादी की लड़ाई स्वदेश के साथ ही विदेशी धरती पर लड़ी गई. पढ़ाई या दूसरी वजहों से विदेश पहुंचे भारतीयों में भी गुलामी का दर्द स्वदेशवासियों से कम नहीं था. बरकतुल्ला भोपाली भी उन्हीं में एक थे. 1862 में भोपाल में जन्म लेने के बाद शुरुआती तालीम उन्होंने वहीं हासिल की. 1857 की क्रांति की विफलता के घाव ताजा थे. लेकिन अंग्रेजों के प्रति लोगों में गुस्सा बरकरार था. जो पीढ़ी बड़ी हो रही थी, उसमें तमाम ऐसे किशोर नौजवान थे जो आगे लड़ने के लिए पढ़ना और खासतौर पर अंग्रेजी जानना सीखना जरूरी मानते थे.
बरकतउल्ला भोपाली.
बरकतुल्ला इसी मकसद के साथ पहले विल्सन कॉलेज बम्बई में दाखिल हुए. जल्दी ही देश प्रेम से जुड़ी गतिविधियों के कारण वे वहां चर्चित हो गए. उसी दौरान वहां के मशहूर आलिम ए दीन मौलाना रियाजुद्दीन देहलवी लंदन जा रहे थे. बरकतुल्ला में उन्हें आगे बढ़ने की संभावनाएं दिखीं. वे उन्हें साथ ले गए. बरकतुल्ला ने वहां पढ़ाई के साथ ब्रिटेन द्वारा भारत के आर्थिक शोषण और इसके चलते जनता की बदहाली पर लिखना बोलना और अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ़ अपने आक्रोश को व्यक्त करने का सिलसिला जारी रखा.
लंदन से किए गए बाहर
ब्रिटिश विरोधी लेखों और जोशीली तकरीरों के कारण बरकतउल्ला जल्दी ही पुलिस और खुफिया एजेंसियों की निगाहों में चढ़ गए. थमने की चेतावनी उन पर बेअसर रही. फिर उन्हें ब्रिटेन छोड़ने का हुक्म हुआ. बरकतुल्ला ने भारत वापसी की जगह अमेरिका का रुख किया. एलेक्जेंडर रसल वेब के संपर्क में आए. वहां भी उन्होंने आजादी की मुहिम छेड़ी. एक अमेरिकन पत्रिका ” द फ्रेंड ” में उन्होंने लगातार ब्रिटिश हुकूमत की भारत में लूट और जनता पर जुल्म ज्यादती पर लेख लिखे.
मौलाना महमूद हसन की सलाह पर वे जापान गए. टोक्यो विश्वविद्यालय में उर्दू के प्रोफेसर नियुक्त हुए. लेकिन असली मकसद भारत की आजादी को वे वहां भी नहीं भूले. यहां उन्होंने भारत का पक्ष रखने के लिए ” इस्लामिक फ्रेटरनिटी ” जापानी और अंग्रेजी भाषाओं में अखबार निकाला. उनके इस अखबार और अन्य अखबारों पत्रिकाओं में उनके लेखों ने जापान, चीन , इंडोनेशिया , मलाया में भारत की आजादी के पक्ष में तमाम लोगों को सक्रिय और जागरूक किया.
भोपाल का बरकतुल्ला विश्वविद्यालय.
ग़दर पार्टी के संस्थापकों में शामिल
उर्दू, अरबी, फारसी और अंग्रेजी सहित कई भाषाओं पर अपनी गहरी पकड़ के कारण उनके ब्रिटिश विरोधी लेखों का दूर तक प्रसार और प्रभाव हुआ. सिर्फ उनका लिखा ही नहीं बल्कि एक प्रखर वक्ता के रूप में उनके भाषणों ने भारत, इंग्लैंड, जापान, अमेरिका, जर्मनी ,तुर्की और अफगानिस्तान सहित उस हर देश में अपनी गहरी छाप छोड़ी , जहां वे पहुंच सके. उनकी यह कोशिशें अकेले नहीं थीं. पहले विश्वयुद्ध के पूर्व कैलिफ़ोर्निया में लाला हरदयाल और कृष्णजी वर्मा के साथ बरकतउल्ला भी इंडियन एसोसिएशन ऑफ पैसेफिक कोस्ट के संस्थापकों में शामिल थे. बाद में यही संस्था ग़दर पार्टी के नाम से मशहूर हुई, जिसका मकसद भारत में ब्रिटिश हुकूमत का तख्ता पलटना था.
इस पार्टी के विस्तार के लिए बरकतउल्ला भोपाली ने परमानंद और लाला हरदयाल के साथ अमेरिका और कनाडा के व्यापक भ्रमण किया और वहां रह रहे हजारों भारतवासियों को जागरूक करते हुए देश की आजादी के लिए आगे आने की अपील की. अमेरिका में पार्टी पर पाबंदी और लाला हरदयाल की गिरफ्तारी के बाद मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए बरकतउल्ला तुर्की होते हुए जर्मनी पहुंचे. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। यहां उनकी क्रांतिकारी राजा महेंद्र प्रताप से पहली भेंट हुई. चम्पक रमन पिल्लई, वीरेंद्र नाथ चट्टोपाध्याय, डॉक्टर प्रभाकर, डॉक्टर हफीज, त्रिमूल आचार्य , डॉक्टर ए. मसूरी,खरी नाम्स पारसी, डॉक्टर तारक नाथ दास, चंद्रा कुमार चक्रवर्ती और हरेन्द्र नाथ गुप्त आदि आजादी के मतवाले यहां एकजुट होकर संघर्ष की दिशा तय करने में लगे हुए थे.
काबुल में बनी निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री
1 दिसंबर 1915 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में स्थापित की गई. भारत की निर्वासित सरकार का आजादी के संघर्ष में महत्वपूर्ण स्थान है. राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में बनी इस सरकार के प्रधानमंत्री बरकतउल्ला भोपाली थे. सरकार का उद्देश्य ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाकर भारत की स्वतंत्रता प्राप्त करना था.
1914 में प्रथम विश्वयुद्ध प्रारंभ हुआ था. ब्रिटेन के शत्रु राष्ट्र विशेषकर जर्मनी और तुर्की—भारत में ब्रिटिश शासन को कमजोर करना चाहते थे. इसी अवसर का लाभ उठाने के लिए विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों ने एक व्यापक योजना बनाई. जर्मनी में कार्यरत बर्लिन कमेटी तथा अन्य क्रांतिकारी संगठनों ने अफगानिस्तान को आधार बनाकर भारत में विद्रोह भड़काने का प्रयास किया. इस सरकार ने स्वयं को स्वतंत्र भारत की वैध सरकार और ब्रिटिश शासन को अवैध ऐलान किया था.
#WATCH | Bhopal, Madhya Pradesh: Executive Council of Barkatullah University in Bhopal officially approves a proposal to rename the institution to ‘Vagdevi Bhojpal University’.
Speaking about this, the University Registrar Samar Bahadur Singh says, “An Executive Council meeting pic.twitter.com/jlthMfqvN8
— ANI June 4, 2026
विदेशी धरती पर पहली बार भारत का संप्रभुता का दावा
निर्वासित सरकार ने ब्रिटेन के विरोध में अंतर्राष्ट्रीय समर्थन जुटाने की भरपूर कूटनीतिक कोशिशें की थीं. सरकार का उद्देश्य अफगान अमीर को ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध के लिए तैयार करना और जर्मनी, तुर्की, रूस, चीन और जापान से समर्थन प्राप्त करना था. भारत में सशस्त्र क्रांति छेड़ना भी सरकार के उद्देश्यों में शामिल था. इस सरकार को
अफगान दरबार के कुछ प्रभावशाली लोगों का समर्थन मिला. लेकिन अफगानिस्तान के अमीर हबीबुल्लाह खान ने ब्रिटेन से सीधे टकराव का जोखिम नहीं उठाया.
परिणामस्वरूप इस सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं मिल सकी. ब्रिटिश दबाव बढ़ने पर 1919 में राजा महेंद्र प्रताप और बरकतउल्ला भोपाली आदि को काबुल छोड़ना पड़ा. बेशक यह सरकार व्यावहारिक रूप से भारत को स्वतंत्र नहीं करा सकी, फिर भी इसका महत्व असाधारण है.यह भारत की प्रथम निर्वासित राष्ट्रीय सरकार थी.इसने पहली बार विदेशी धरती पर भारत की संप्रभुता का दावा प्रस्तुत किया. यही सरकार सुभाष चंद्र बोस द्वारा 1943 में स्थापित आजाद हिंद सरकार के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनी. इस सरकार ने अंतरराष्ट्रीय जगत में इंग्लैंड की साख को गहरा धक्का पहुंचाया.
बीमार हालत में भी जूझते रहे
निर्वासित सरकार की गतिविधियां 1920 तक जारी रहीं. अफगानिस्तान से निराश होने के बाद बरकतउल्ला रूस भी गए. लेनिन से उनकी अच्छी मुलाकात हुई. मदद का आश्वासन भी मिला. लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी. अगला पड़ाव बर्लिन था. बरकतउल्ला इस बीच लगातार ब्रिटेन के विरोध और भारत की आजादी के पक्ष में अखबारों में लिखते और सभा सम्मेलनों में भाषण देते रहे. स्विट्जरलैंड की एक कांफ्रेंस में उनकी पंडित जवाहर लाल नेहरू, हकीम अजमल खान और डॉक्टर मुख्तार अहमद अंसारी से भेंट हुई. उन सबके बीच संघर्ष को तीव्र करने के उपायों पर लंबी चर्चा हुई.
पंडित नेहरू ने बरकतउल्ला को भारत वापसी की सलाह दी. लेकिन उनका कहना था कि ब्रिटिश दासता की बेड़ियों से मुक्ति बाद ही स्वदेश की धरती पर कदम रखूंगा. पर उनकी जिंदगी में ऐसा मुमकिन नहीं हुआ. बीमारियों ने उन्हें घेर लिया था. गदर पार्टी के साथी उनके इलाज के लिए पैसा जुटाते रहे. इन हालात में भी वे रुकने और आराम करने को तैयार नहीं थे. आजादी के सपने के सच होने के लिए लड़ते हुए 27 सितंबर 1927 को वे इस दुनिया से विदा हो गए.



