राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में स्थित मानगढ़ धाम फिर चर्चा में है. सांसद हनुमान बेनीवाल के सवाल के जवाब में लोकसभा में केन्द्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया कि मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने का कोई प्रस्ताव सरकार के समक्ष विचाराधीन नहीं है. सरकार का तर्क है कि यहां व्यापक आधुनिक निर्माण हो चुका है. इससे इसकी पुरातात्विक विशेषताएं, प्रामाणिकता और अखंडता प्रभावित हुई हैं.

आइए, इसी बहाने समझते हैं कि देश में किसी स्थान को राष्ट्रीय स्मारक कैसे घोषित किया जाता है? इसका निर्णय कौन करता है? क्या सिर्फ ऐतिहासिक महत्व काफी है या पुरातात्विक स्थिति भी जरूरी होती है? यह भी जानेंगे कि क्या है मानगढ़ धाम का इतिहास और महत्व?

राष्ट्रीय स्मारक क्या होता है?

राष्ट्रीय स्मारक वह स्थल, इमारत, अवशेष, शिलालेख, गुफा, किला या पुरातात्विक क्षेत्र होता है, जिसे देश के लिए विशेष महत्व का माना जाता है. इसका महत्व इतिहास, कला, वास्तुकला, पुरातत्व या राष्ट्रीय स्मृति से जुड़ा हो सकता है. ऐसे स्मारकों का संरक्षण केंद्र सरकार के कानून के तहत होता है. इन्हें सामान्य तौर पर राष्ट्रीय महत्व का स्मारक कहा जाता है. राष्ट्रीय स्मारक बनने के बाद उस स्थान की देखरेख, संरक्षण और निर्माण गतिविधियों पर विशेष नियम लागू हो सकते हैं. इसका उद्देश्य मूल स्वरूप और ऐतिहासिक पहचान को बचाना होता है.

कौन सा कानून लागू होता है?

भारत में राष्ट्रीय महत्व के प्राचीन स्मारकों के लिए बाकायदा नियमकानून उपलब्ध हैं. प्राचीन स्मारक तथा पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत ऐसे स्मारकों को परखा जाता है. फिर घोषित करने की परंपरा है. इस कानून के अनुसार, कोई प्राचीन स्मारक या पुरातात्विक स्थल राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया जा सकता है. इस एक्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय स्मारक के रूप में विचार करने के लिए उस स्थल का कम से कम सौ वर्ष पुराना होना जरूरी है. उस स्थल में ऐतिहासिक, पुरातात्विक या कलात्मक महत्व भी होना चाहिए. कानून का मूल उद्देश्य संरक्षण है, केवल सम्मान देना नहीं.

राष्ट्रीय स्मारक का फैसला कौन करता है?

राष्ट्रीय स्मारक का अंतिम निर्णय केंद्र सरकार करती है. यह निर्णय आमतौर पर संस्कृति मंत्रालय के स्तर पर आगे बढ़ता है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, यानी एएसआई, इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. एएसआई स्थल का निरीक्षण करता है. वह उसके इतिहास, पुरातात्विक साक्ष्य, संरचना, मौलिकता और संरक्षण की जरूरत का अध्ययन करता है. राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण भी कुछ मामलों में अपनी राय या सिफारिश दे सकता है, लेकिन अंतिम कानूनी घोषणा केंद्र सरकार की अधिसूचना से ही होती है. राज्य सरकार, स्थानीय प्रशासन, सांसद, विधायक, सामाजिक संगठन या नागरिक मांग उठा सकते हैं. वे ज्ञापन दे सकते हैं. वे प्रस्ताव भेज सकते हैं. पर, वे अपने स्तर पर किसी स्थल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित नहीं कर सकते.

यदि किसी स्थल पर बहुत अधिक नए निर्माण हो चुके हों, तो उसका पुरातात्विक मूल्यांकन कठिन हो सकता है. आधुनिक निर्माण, सड़कें, भवन, मंच, दुकानें या अन्य विकास कार्य मूल परतों को बदल सकते हैं. यही अड़चन मानगढ़ के मामले में सरकार ने बताई है.

मानगढ़ धाम. फोटो: Rajasthan Tourism

राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की प्रक्रिया कैसे शुरू होती है?

यह प्रक्रिया किसी मांग, आवेदन, सरकारी पहल या विशेषज्ञों की रिपोर्ट से शुरू हो सकती है. उदाहरण के लिए किसी सांसद का सवाल, जनप्रतिनिधियों की मांग, राज्य सरकार का प्रस्ताव या स्थानीय समुदाय का अभियान इस विषय को आगे ला सकता है. इसके बाद संबंधित विभाग स्थल की प्रारंभिक जानकारी जुटाता है. जमीन का रिकॉर्ड देखा जाता है. स्वामित्व की स्थिति समझी जाती है. यह भी देखा जाता है कि स्थल पर कोई विवाद तो नहीं है. फिर इतिहास और पुरातत्व के विशेषज्ञों से राय ली जा सकती है. एएसआई या अन्य सक्षम एजेंसियां स्थल का निरीक्षण करती हैं. वे यह देखती हैं कि वहां पुरानी संरचनाएं, अवशेष, शिलालेख, स्थापत्य, सांस्कृतिक परतें या अन्य प्रमाण मौजूद हैं या नहीं.

नोटिफिकेशन क्यों जारी होता है?

यदि केंद्र सरकार को कोई स्थल राष्ट्रीय महत्व का लगता है, तो वह राजपत्र में अपनी मंशा की अधिसूचना जारी करती है. कानून के तहत इस अधिसूचना के बाद लोगों को आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिलता है. इसके लिए दो महीने का समय दिया जाता है. स्थानीय निवासी, जमीन मालिक, ट्रस्ट, धार्मिक संस्था या अन्य संबंधित व्यक्ति अपनी आपत्ति या सुझाव दे सकते हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। केंद्र सरकार इन आपत्तियों पर विचार करती है. इसके बाद अंतिम अधिसूचना जारी की जा सकती है. यही अधिसूचना स्थल को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक या पुरातात्विक स्थल बनाती है.

बांसवाड़ा सांसद राजकुमार रोज ने जारी किया बयान

केंद्र सरकार ने मानगढ़ धाम को पुरातात्विक प्रामाणिकता और अखंडता न रखने का हवाला देकर अंग्रेजीसामंती व्यवस्था के विरुद्ध शहीद हुए 1,500 से अधिक भील आदिवासियों के बलिदान का अपमान किया है।

इससे राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के आदिवासी समाज की भावनाओं को भी गहरी ठेस pic.twitter.com/Y5BwyG0HH6

— Rajkumar Roat August 4, 2026

राष्ट्रीय स्मारक बनने के बाद क्या बदलता है?

राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मिलने के बाद संरक्षण की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. केंद्र सरकार या उसकी एजेंसियां रखरखाव, मरम्मत, सुरक्षा और संरक्षण के लिए कदम उठा सकती हैं. स्थल के आसपास निर्माण और बदलाव पर नियम लागू हो सकते हैं. इसका असर स्थानीय लोगों, भूमि मालिकों, दुकानदारों और धार्मिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है. हालांकि, कानून में यह भी व्यवस्था है कि किसी संरक्षित स्मारक में प्रचलित धार्मिक परंपराओं के उपयोग को पूरी तरह समाप्त नहीं माना जाता. फिर भी संरक्षण नियम और स्थानीय आस्था के बीच संतुलन बनाना जरूरी होता है.

क्या है मानगढ़ धाम का ऐतिहासिक महत्व?

मानगढ़ धाम राजस्थान और गुजरात की सीमा के पास स्थित है. यह आदिवासी समाज के संघर्ष, सामाजिक जागरण और बलिदान की स्मृति से जुड़ा स्थल है. मानगढ़ पहाड़ी का संबंध समाज सुधारक और जननायक गोविंद गुरु से है. उन्होंने भील आदिवासी समाज के बीच जागरूकता, शिक्षा, सामाजिक सुधार और संगठित प्रतिरोध की अलख जगाई. 17 नवंबर 1913 को मानगढ़ पहाड़ी पर बड़ी संख्या में आदिवासी एकत्र थे. ब्रिटिश शासन की सेना ने वहां गोलीबारी की. इस घटना में बड़ी संख्या में भील आदिवासी मारे गए. अलगअलग स्रोतों में मृतकों की संख्या को लेकर अलग दावे मिलते हैं. कुछ रिपोर्ट्स में यह संख्या डेढ़ हजार तक बताई गई है. इस घटना को आदिवासियों का जलियांवाला बाग कहा जाता है. मानगढ़ धाम राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के अनेक आदिवासी समुदायों के लिए आस्था और शहादत का केंद्र है.