उत्तर प्रदेश की सियासत में कुछ विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां बड़े से बड़े राजनीतिक दल भी चुनावों में फेल साबित हुए. बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट ऐसी ही सीट है.2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में जब पूरे उत्तर प्रदेश में बीजेपी की प्रचंड लहर थी तब इस सीट पर भाजपा प्रत्याशी अपनी जमानत तक बचाने में नाकामयाब साबित हुए. यहां से बसपा के उमाशंकर सिंह ने लगातार तीसरी बार जीत दर्ज कर इतिहास बनाया.

अब उमाशंकर सिंह के निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत उनके बेटे प्रिंस उर्फ यूकेश सिंह के हाथों में जाने की चर्चा है.मायावती की हालिया बैठक में प्रिंस की मौजूदगी ने संकेत और मजबूत कर दिए हैं कि 2027 में बसपा उन्हें रसड़ा से मैदान में उतार सकती है.
2022 में भाजपा की जमानत कैसे जब्त हुई?
- 2022 में भाजपा पूरे प्रदेश में 255 विधानसभा सीटें जीतकर सत्ता में लौटी थी.
- लेकिन रसड़ा में उसका प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा.
- यहां बसपा के उमाशंकर सिंह को 87,887 वोट यानी 43.82 फीसदी वोट मिले.
- सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के महेंद्र को 81,304 वोट मिले और वे दूसरे स्थान पर रहे.
- भाजपा के बब्बन राजभर महज 24,235 वोट यानी 12.08 फीसदी पर सिमट गए.
- उम्मीदवार को अपनी जमानत बचाने के लिए कुल वैध मतों का 16.66 फीसदी वोट हासिल करना होता है.
- भाजपा प्रत्याशी को सिर्फ 12.08 फीसदी वोट मिले थे. इसकी उसकी जमानत जब्त हो गई थी.
2017 के विधानसभा चुनाव में भी रसड़ा सीट से बसपा के उमाशंकर सिंह ने 92,272 वोट हासिल कर शानदार जीत दर्ज की थी. उनके मुकाबले भाजपा के राम इकबाल सिंह को 58,385 वोट मिले और वह दूसरे स्थान पर रहे थे. वहीं, सपा के सनातन पांडेय 37,006 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे.
रसड़ा में उमाशंकर सिंह का इतना मजबूत प्रभाव क्यों था?
2022 में रसड़ा ही उत्तर प्रदेश की एकमात्र सीट थी जहां बसपा जीत दर्ज कर पाई थी. बसपा के कमजोर प्रदर्शन के बावजूद उमाशंकर सिंह अपनी व्यक्तिगत पकड़ के दम पर पार्टी का किला बचाने में सफल रहे.रसड़ा में उमाशंकर सिंह की राजनीति सिर्फ बसपा के पारंपरिक दलित वोट बैंक तक सीमित नहीं थी.वह 2012, 2017 और 2022 में लगातार तीन चुनाव जीत चुके थे.इससे साफ है कि उन्होंने अलगअलग सामाजिक समूहों के बीच उनकी पहुंच है.
रसड़ा विधानसभा क्षेत्र में कुल मतदाताओं की संख्या करीब 3.56 लाख है. यहां क्षत्रिय और दलित मतदाताओं की संख्या करीब 8080 हजार बताई जाती है, जबकि राजभर मतदाता 50 हजार से अधिक, ब्राह्मण करीब 40 हजार, मुस्लिम करीब 30 हजार और यादव मतदाता करीब 20 हजार हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ऐसे में रसड़ा का जातीय समीकरण काफी अलग है. यहां किसी एक जाति के समर्थन के दम पर चुनाव जीतना आसान नहीं है, उम्मीदवार को जीत के लिए अलगअलग सामाजिक समूहों के बीच संतुलन बनाते हुए व्यापक समर्थन जुटाना पड़ता है.
उमाशंकर सिंह इस काम में लंबे समय तक सफल रहे. उन्हें पाले में बसपा का दलित वोटबैंक तो पहले से ही रहा है. इसके अलावा राजपुत समुदाय से आने के चलते उधर के वोट भी मिलते रहे हैं. इसके अलावा ब्राह्मण और अन्य समुदायों में भी उनकी पैठ रही है.बसपा का प्रभाव 1990 के दशक से रहा है.1993 में घूरा राम ने बसपा के टिकट पर जीत दर्ज की.2002 और 2007 में भी बसपा के घूरा राम विधायक बने.2012 के बाद उमाशंकर सिंह ने इस राजनीतिक आधार को आगे बढ़ाया.भाजपा यहां सिर्फ 1996 में जीत दर्ज कर सकी थी.
भाजपा रसड़ा की चुनौती से कैसे पार पा सकती है?
- रसड़ा में भाजपा के सामने चुनौती सिर्फ बसपा नहीं है.2022 में यहां मुकाबला बसपा और सुभासपा के बीच रहा था.
- सुभासपा उस समय समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में थी और उसके उम्मीदवार महेंद्र को 40.54 फीसदी वोट मिले थे.
- बसपा को 43.82 फीसदी वोट मिले.दोनों के बीच अंतर सिर्फ 6,583 वोट का था.
- इस बार सुभासपा इस समय बीजेपी के साथ है. ऐसे में अगर 2027 में विपक्षी वोटों का बंटवारा कम होता है तो बीजेपी के लिए एक चांस जरूर होगा.
- भाजपा सामाजिक समीकरणों को अपने पक्ष में करने में सफल रहती है, तो मुकाबला पूरी तरह बदल सकता है.
- राजभर वोट भी यहां महत्वपूर्ण हैं.ओम प्रकाश राजभर का राजनीतिक प्रभाव रसड़ा में माना जाता रहा है.
- 2022 में सुभासपा प्रत्याशी का 40 फीसदी से अधिक वोट हासिल करना बताता है कि राजभर वोट इस सीट के नतीजे को कितना प्रभावित कर सकता है.
प्रिंस सिंह के सामने क्या है चुनौती?
रसड़ा की राजनीति केवल जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं है.यहां कताई मिल और चीनी मिल का बंद होना, इलाके को जिला बनाने की मांग और मुंसिफ न्यायालय की मांग लंबे समय से प्रमुख मुद्दों में रहे. अगर बसपा रसड़ा से प्रिंस उर्फ यूकेश सिंह को टिकट देती है को उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने अपने पिता के व्यक्तिगत प्रभाव को वोट में बदल पाने की होगी. प्रिंस अब तक सक्रिय राजनीति में बहुत ज्यादा नजर नहीं आए हैं.वह अपने पिता की कंपनी में CEO की जिम्मेदारी संभालते रहे हैं.



