हमारी बहुतसी बड़ी परेशानियां उस दिन शुरू होती हैं, जब हम उन कहानियों, भावनाओं और धारणाओं को जांचना बंद कर देते हैं, जिनके सहारे हम दुनिया को समझते हैं. हमें कोई पसंद आता है तो धीरेधीरे उसकी हर बात सही लगने लगती है. कोई पसंद नहीं आता तो उसकी अच्छी बात भी दिखाई देना बंद हो जाती है. कोई हमारे लिए हीरो बन जाता है या जीरो. प्यार पूरी प्रशंसा बन जाता है. गुस्सा पूरी नफरत और हमारी एक राय धीरेधीरे सच का रूप ले लेती है. एक दिन हम भूल जाते हैं कि वह कभी सिर्फ हमारी राय थी.

जब हमारी सोच जानकारी और तथ्यों से नहीं गुजरती, तो हमारा नजरिया जम जाता है. हम दुनिया को उसी जगह से देखने लगते हैं, जहां हम खड़े हैं. थोड़ासा स्थान बदलें तो वही चीज दूसरी दिखाई दे सकती है. चीज नहीं बदली. हमारी जगह बदल गई. राय हमारे भीतर रहती है. तथ्य हमारे बाहर होता है. जगह बदलने के बाद भी तथ्य वही रहना चाहिए.

दक्षिण अफ्रीका की एक पुरानी कहानी

शायद इसी कारण दक्षिण अफ्रीका की एक पुरानी कहानी आज भी हर इंसान के भीतर कुछ कहती है. रंगभेद के खिलाफ संघर्ष के दौरान एक राजनीतिक नेता ने कई साल जेल में बिताए थे. एक बातचीत में उन्होंने उन दिनों की कुछ बातें बताईं. नेल्सन मंडेला खुद 27 साल जेल में रहे. जब वे जेल से बाहर आए, तब दक्षिण अफ्रीका एक बिल्कुल नए भविष्य की ओर बढ़ रहा था.

उस कहानी का सबसे दर्दनाक हिस्सा तब सामने आता है, जब हम सुनते हैं कि कुछ कैदियों के साथ क्या किया जाता था. एक घटना के बारे में बताया गया कि कैदियों को करीब छह फुट गहरे गड्ढे में खड़ा किया जाता था. वहां पहरेदार उन्हें अपमानित करते थे.

कोई इंसान अपना अपमान कैसे जीता होगा?

कई बार उनके ऊपर पेशाब तक किया जाता था. सोचिए, कोई इंसान ऐसा अपमान वर्षों तक अपने भीतर लेकर कैसे जीता होगा. उस चेहरे को कैसे भूलता होगा. उस वर्दी को कैसे भूलता होगा. उस आवाज को कैसे भूलता होगा, जिसने उसे इंसान से कम समझा था. और फिर एक दिन सब कुछ बदल गया. कैदी जेल से बाहर आ गया. जेलर का अधिकार खत्म हो गया.

जो आदमी कभी सलाखों के पीछे खड़ा था, वही अब देश के सबसे बड़े पद की ओर बढ़ रहा था. 1994 में मंडेला के शपथ ग्रहण के समय दुनिया के अनेक बड़े नेता वहां आए थे. करीब 46 देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख, राजघरानों के सदस्य और अनेक देशों के प्रतिनिधि उस ऐतिहासिक अवसर के गवाह बने.

क्या मेरा जेलर यहां है?

एक कहानी उस क्षण से जुड़ी है. कहा जाता है कि मंडेला ने शीशे के पीछे से बाहर देखा और पूछा कि कौनकौन आया है. उन्हें बड़े नेताओं, राष्ट्राध्यक्षों और राजघरानों के लोगों के बारे में बताया गया. फिर उन्होंने एक अलग सवाल पूछा, क्या मेरा जेलर यहां है? जवाब था, नहीं. कहानी के अनुसार मंडेला ने कहा कि अगर वह यहां नहीं है, तो वे शपथ नहीं लेंगे. बाद में उनके पुराने जेलरों में से कुछ लोगों को समारोह में बुलाया गया. ऐतिहासिक रिकॉर्ड भी बताता है कि मंडेला ने अपने कुछ पुराने जेल अधिकारियों को उस अवसर पर बुलाया था और उनके साथ उस खुशी को साझा किया था.

जरा ठहरकर सोचिए. जिस आदमी ने 27 साल जेल में बिताए थे, उसने जेल को अपने दिल का आकार तय नहीं करने दिया. यहीं से यह कहानी हमारे भीतर उतरती है. हममें से अधिकतर लोग कभी जेल में नहीं रहे. लेकिन लगभग हर किसी की जिंदगी में कोई न कोई जेलर रहा है. कभी कोई इंसान. कभी कोई अपमान. कभी कोई पुराना धोखा. कभी कोई ऐसी घटना जो 20 साल पहले हुई थी, लेकिन आज भी हमें यह बताती है कि हमें किससे नाराज होना है और किससे डरना है.

‘तुमने मुझे दुख दिया, अब मैं कठोर बनूंगा’

हमारे भीतर दो आवाजें होती हैं. एक कहती है, तुमने मुझे दुख दिया, इसलिए अब मैं कठोर बनूंगा. दूसरी बहुत धीरे से पूछती है, अगर मैं भी उसी इंसान जैसा बन गया, जिसने मुझे दुख दिया, तो मैं उससे बाहर निकला ही कहां? जीवन का अजीब सच यही है. हम किसी व्यक्ति से जीत सकते हैं, लेकिन फिर भी उसके कैदी बने रह सकते हैं. हम उस जगह से बहुत दूर आ सकते हैं, जहां हमें चोट लगी थी, लेकिन वह जगह हमारे भीतर रह सकती है. हम कुर्सी पर बैठे आदमी को बदल सकते हैं, लेकिन उस सोच को नहीं बदल सकते, जिसने उस कुर्सी को खतरनाक बनाया था.

इसलिए असली आजादी शायद उस समय शुरू नहीं होती, जब जेल का दरवाजा खुलता है. वह तब शुरू होती है जब हम कल के जेलर को अपने आज का व्यवहार तय करने देना बंद कर देते हैं. पुरानी समझ हमें बारबार यही बताती रही है कि गुस्सा उस आदमी को लंबे समय तक नहीं जलाता, जिसने हमें चोट पहुंचाई थी. वह पहले उस इंसान को जलाता है जो उसे अपने भीतर लेकर चलता है. शायद सबसे बड़ी जीत यह नहीं है कि सामने वाला भी वही दर्द महसूस करे जो हमने महसूस किया.

कभी सलाखों के पीछे खड़े थे मंडेला

सबसे बड़ी जीत शायद यह है कि एक दिन हमें उसके दर्द का बदला लेने की जरूरत ही महसूस न हो. मंडेला कभी सलाखों के पीछे खड़े थे. फिर वे दुनिया के सामने राष्ट्रपति बनकर खड़े हुए. लेकिन इन दोनों पलों के बीच एक और बदलाव जरूरी था. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। कैदी को यह तय करना था कि आजाद होकर वह कैसा इंसान बनेगा. और शायद यही सवाल चुपचाप हमारे भीतर भी बैठा है: जब हमारे जीवन का दरवाजा आखिरकार खुल जाएगा, तब क्या हम सचमुच बाहर निकलेंगे, या अपने जेलर को अपने साथ लेकर चलेंगे?