स्वाइन फ्लू के मामले बढ़ रहे हैं. राजधानी दिल्ली में 3200 से अधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं. कई राज्यों में भी मामले सामने आने के बाद अलर्ट लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी गई है. स्वाइन फ्लू की तस्वीरों में सूअर नजर आता है. अब अब सवाल है कि इंसानों में होने वाली बीमारी का कनेक्शन सूअर से क्यों है. इसका कारण है इस बीमारी से जुड़ा H1N1 इन्फ्लुएंजा वायरस.

H1N1 इन्फ्लुएंजा वायरस मूल रूप से सूअरों में पाए जाने वाले इन्फ्लूएंजा वायरस से मिलताजुलता है. वैज्ञानिकों ने जब इस वायरस की संरचना का अध्ययन किया, तो पता चला कि इसके कई जीन सेगमेंट उन वायरस स्ट्रेन्स से मेल खाते हैं, जो आमतौर पर सूअरों में इन्फ्लूएंजा फैलाने के लिए जाने जाते हैं. यही वजह है कि इस बीमारी को “स्वाइन” यानी सूअर से जोड़ा गया.
नाम को लेकर उठा विवाद
शुरुआती दौर में स्वाइन फ्लू के नाम को लेकर काफी विवाद हुआ. जैसेजैसे वैज्ञानिकों ने इस वायरस पर और शोध किया, यह स्पष्ट हुआ कि 2009 की महामारी के दौरान यह वायरस मुख्य रूप से इंसान से इंसान में ही फैल रहा था, न कि सूअरों से इंसानों में. स्वाइन फ्लू संक्रमित इंसान के खांसने, छींकने या बात करने पर हवा में फैली बारीक बूंदों के जरिए एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलता है.
H1N1 इन्फ्लुएंजा वायरस मूल रूप से सूअरों में पाए जाने वाले इन्फ्लूएंजा वायरस से मिलताजुलता है. फोटो: Pexels
इसके बावजूद स्वाइन फ्लू नाम के चलते दुनियाभर में यह धारणा फैली कि यह सूअर का मांस खाने से फैलता है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। इस गलतफहमी का सीधा असर सूअर पालन उद्योग पर पड़ा. कई देशों ने सूअर के मांस के आयात पर अस्थायी रोक लगा दी, जबकि वैज्ञानिक रूप से यह साबित हो चुका था कि पका हुआ मांस खाने से यह वायरस नहीं फैलता.
स्वाइन फ्लू सूअर के मांस से होने वाली बीमारी नहीं है. फोटो: Pexels
WHO ने कैसे दूर किया भ्रम?
स्वाइन फ्लू के नाम पर फैले भ्रम को दूर करने का काम विश्व स्वास्थ्य संगठन और कई देशों की हेल्थ एजेंसियों ने किया. एजेंसियों ने इस बीमारी के लिए आधिकारिक तौर पर “स्वाइन फ्लू” के बजाय “H1N1 इन्फ्लूएंजा” या “नोवेल इन्फ्लूएंजा A ” नाम का इस्तेमाल शुरू किया. यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि आम जनता में यह गलतफहमी न फैले कि यह बीमारी सूअरों या उनके मांस से सीधे तौर पर जुड़ी है. धीरेधीरे अवेयरनेस का असर लोगों पर पड़ा और यह बात समझ आई कि यह सूअर के मांस से होने वाली बीमारी नहीं है.
वायरस का मिक्सिंग पॉइंट सूअर क्यों?
सूअरों को वायरोलॉजी की भाषा में अक्सर मिक्सिंग वेसल कहते हैं. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि सूअरों की कोशिकाओं में ऐसे रिसेप्टर्स मौजूद होते हैं, जो इंसानी फ्लू वायरस और पक्षियों के वायरस, दोनों से संक्रमित हो सकते हैं. जब एक ही समय पर कोई सूअर इंसानी फ्लू और बर्ड फ्लू वायरस, दोनों से संक्रमित होता है, तो ये वायरस आपस में जेनेटिक मैटेरियल का आदानप्रदान कर सकते हैं. इस प्रक्रिया से बिल्कुल नए तरह के वायरस स्ट्रेन जन्म ले सकते हैं.
2009 में फैला H1N1 वायरस भी ऐसी ही एक जटिल प्रक्रिया का नतीजा माना गया, जिसमें सूअर, पक्षी और इंसानी फ्लू वायरस के जीन्स का मिश्रण पाया गया था. यही वजह रही कि शुरुआती दौर में इस वायरस को सीधे तौर पर सूअरों से जोड़कर देखा गया.



