क्रूड ऑयल की सप्लाई चेन में बाधा आने की वजह से बायोफ्यूल की चर्चा तेज हो चली है. भारत में ई20 पेट्रोल अनिवार्य कर दिया गया है. दुनिया लंबे समय से क्रूड ऑयल पर निर्भर रही है. पेट्रोल, डीजल, गैस और विमान ईंधन के लिए कच्चे तेल का इस्तेमाल होता है. लेकिन अब ऊर्जा का यह मॉडल तेजी से बदल रहा है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। महंगा तेल, बढ़ता प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन बड़ी चुनौतियां बन चुके हैं. ऐसे समय में बायोफ्यूल एक मजबूत विकल्प बनकर सामने आया है. बायोफ्यूल पौधों, अनाज, गन्ने, मक्का, वनस्पति तेल, जैविक कचरे और पशु अवशेषों से बनाया जाता है. वर्ल्ड बायोफ्यूल डे के मौके पर जानिए, बायोफ्यूल का बादशाह देश कौन है? इससे कैसे दे रहा अर्थव्यवस्था को रफ्तार? क्यों दुनिया बायोफ्यूल की तरफ क्यों बढ़ रही?

बायोफ्यूल का बादशाह कौन सा देश है? इसका उत्तर एक शब्द या एक लाइन में देना आसान नहीं है. यूं कुल बायोफ्यूल उत्पादन में अमेरिका नंबर एक है. वहीं, गन्ने से एथनॉल बनाने और उसे रोजमर्रा की परिवहन व्यवस्था का सफल हिस्सा बनाने में ब्राजील को दुनिया का सबसे प्रभावशाली मॉडल माना जाता है. इंडोनेशिया, चीन भी इस मामले में आगे आए हैं. भारत भी ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से इस ओर कदम बढ़ा चुका है. इसलिए इस एक सवाल को बड़े कैनवस पर देखना होगा.

प्रोडक्शन के मामले अमेरिका नंबर एक

साल 2024 के उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा बायोफ्यूल उत्पादक देश है. उसका कुल उत्पादन करीब 856 हजार बैरल तेल समतुल्य प्रतिदिन रहा. तेल समतुल्य बैरल का मतलब है कि अलगअलग ईंधनों की ऊर्जा क्षमता को एक सामान्य पैमाने पर मापा गया है.

अमेरिका में बायोफ्यूल उत्पादन का सबसे बड़ा आधार मक्का है. फोटो: Pexels

अमेरिका में बायोफ्यूल उत्पादन का सबसे बड़ा आधार मक्का है. मक्का से एथनॉल तैयार किया जाता है. यह एथनॉल पेट्रोल में मिलाया जाता है. इससे पेट्रोल की खपत कम होती है. अमेरिका में एथनॉल के साथ बायोडीजल और रिन्यूएबल डीजल का भी उत्पादन होता है. रिन्यूएबल डीजल को सामान्य डीजल के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. यही कारण है कि अमेरिका केवल एथनॉल में नहीं, बल्कि कुल तरल बायोफ्यूल उत्पादन में भी आगे है.

ब्राजील क्यों कहलाता है एथेनॉल का किंग?

ब्राजील कुल उत्पादन में अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है. उसका कुल बायोफ्यूल उत्पादन करीब 510 हजार बैरल तेलसमतुल्य प्रतिदिन रहा. इसके बावजूद ब्राजील को बायोफ्यूल की दुनिया का सबसे सफल उदाहरण कहा जाता है. इसकी सबसे बड़ी वजह गन्ना एथनॉल है. ब्राजील ने 1970 के दशक में तेल संकट के दौरान एथेनॉल को गंभीरता से अपनाना शुरू किया था. तब से देश ने गन्ने से बनने वाले ईंधन को अपनी परिवहन व्यवस्था का अहम हिस्सा बना लिया. ब्राजील में बड़ी संख्या में फ्लेक्सफ्यूल वाहन चलते हैं.

ये वाहन पेट्रोल, एथनॉल या दोनों के मिश्रण से चलते हैं. इससे वाहन मालिक को ईंधन चुनने की सुविधा मिलती है. ब्राजील में गन्ने से केवल चीनी नहीं बनती. गन्ने के रस और शीरे से एथनॉल तैयार होता है. चीनी निकालने के बाद बचने वाले रेशेदार अवशेष को बगास कहा जाता है. इस बगास से बिजली भी बनाई जाती है. यानी एक ही फसल से चीनी, ईंधन और बिजली मिलती है. यही ब्राजील के मॉडल की बड़ी ताकत है. इसलिए सही निष्कर्ष यह है कि अमेरिका कुल उत्पादन का नंबर एक देश है, जबकि ब्राजील गन्ना एथनॉल और फ्लेक्सफ्यूल मॉडल का वैश्विक नेता है.

इंडोनेशिया: बायोडीजल की बड़ी शक्ति

बायोफ्यूल उत्पादन में इंडोनेशिया तीसरे स्थान पर है. 2024 में उसका कुल उत्पादन करीब 205 हजार बैरल तेल समतुल्य प्रतिदिन रहा. इंडोनेशिया की ताकत पाम ऑयल से बनने वाला बायोडीजल है. देश में डीजल में बायोडीजल मिलाने की नीति लागू है. इसे बी35 नीति के नाम से जाना जाता है. इसका मतलब है कि डीजल में 35 प्रतिशत तक बायोडीजल शामिल किया जा सकता है. इंडोनेशिया पाम ऑयल का बड़ा उत्पादक है.

इसलिए उसके पास बायोडीजल के लिए जरूरी कच्चा माल बड़ी मात्रा में उपलब्ध है. इससे उसे डीजल आयात कम करने और घरेलू उद्योग बढ़ाने में मदद मिलती है. हालांकि, पाम ऑयल आधारित बायोडीजल के साथ पर्यावरण की चिंता भी जुड़ी है. यदि जंगलों को काटकर पाम की खेती बढ़ाई जाए, तो पर्यावरण को नुकसान हो सकता है. इसलिए टिकाऊ खेती और जंगलों की सुरक्षा जरूरी है.

चीन: तेजी से बढ़ती बायोफ्यूल क्षमता

चीन इस सूची में चौथे स्थान पर है. उसका कुल बायोफ्यूल उत्पादन करीब 106 हजार बैरल तेल समतुल्य प्रतिदिन रहा. चीन एथनॉल, बायोडीजल और कचरे से बनने वाले जैव ईंधन के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है. चीन के सामने ऊर्जा सुरक्षा और वायु प्रदूषण बड़ी चुनौतियां हैं. विशाल वाहन बाजार भी उसकी ईंधन जरूरत बढ़ाता है. ऐसे में बायोफ्यूल उसके लिए एक उपयोगी विकल्प है. चीन कृषि और शहरी जैविक कचरे के बेहतर इस्तेमाल पर भी काम कर रहा है. भविष्य में वहां कचरे और गैरखाद्य स्रोतों से बनने वाले बायोफ्यूल का महत्व बढ़ सकता है.

चीन एथनॉल, बायोडीजल और कचरे से बनने वाले जैव ईंधन के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है. फोटो: Pexels

भारत: उभरती हुई बायोफ्यूल शक्ति

भारत दुनिया के टॉप पांच बायोफ्यूल उत्पादक देशों में शामिल है. 2024 में उसका कुल उत्पादन करीब 70 हजार बैरल तेल समतुल्य प्रतिदिन रहा. भारत का जोर मुख्य रूप से एथनॉल मिश्रण पर है. भारत पेट्रोल में एथनॉल मिलाकर पेट्रोलियम आयात घटाने की दिशा में काम कर रहा है. एथनॉल के लिए गन्ने के अलावा मक्का, टूटे चावल और अन्य अनुमत कृषि स्रोतों का इस्तेमाल किया जा रहा है.

भारत के लिए बायोफ्यूल का महत्व केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है. यह किसानों की आय से भी जुड़ा है. एथनॉल उत्पादन के लिए फसलों की मांग बढ़ने से कृषि क्षेत्र को नया बाजार मिल सकता है. इस्तेमाल किए गए खाना पकाने के तेल से बायोडीजल बनाने की संभावना भी बढ़ रही है. कृषि अवशेषों, गोबर और जैविक कचरे से बायोगैस तथा कंप्रेस्ड बायोगैस भी तैयार की जा सकती है. इससे पराली जलाने जैसी समस्याओं से निपटने में मदद मिल सकती है.

बायोफ्यूल से अर्थव्यवस्था को कैसे मिलती है रफ्तार?

बायोफ्यूल उद्योग का पहला लाभ किसानों को होता है. गन्ना, मक्का, तिलहन और अन्य कृषि उत्पादों की मांग बढ़ती है. इससे किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार बनता है. दूसरा लाभ रोजगार के रूप में मिलता है. बायोफ्यूल संयंत्रों में उत्पादन, परिवहन, भंडारण, मशीनरी और तकनीकी सेवाओं से रोजगार पैदा होते हैं. ग्रामीण इलाकों में इसका प्रभाव अधिक दिखता है. तीसरा लाभ तेल आयात बिल में कमी का है. जो देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात से पूरा करते हैं, वे घरेलू बायोफ्यूल उत्पादन बढ़ाकर विदेशी मुद्रा बचा सकते हैं. चौथा लाभ ऊर्जा सुरक्षा है. यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत अचानक बढ़ जाए, तो बायोफ्यूल घरेलू विकल्प के रूप में कुछ राहत दे सकता है.

दुनिया बायोफ्यूल की तरफ क्यों बढ़ रही है?

दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है. पेट्रोल और डीजल जलने से कार्बन डाइऑक्साइड समेत कई प्रदूषक निकलते हैं. बायोफ्यूल को जीवाश्म ईंधन की तुलना में कम कार्बन वाला विकल्प माना जाता है. यह लाभ हर स्थिति में समान नहीं होता. उत्पादन की पूरी प्रक्रिया महत्वपूर्ण है. फसल उगाने में कितना पानी लगा, कितनी खाद और ऊर्जा लगी, परिवहन कितना हुआ और क्या जंगलों को नुकसान पहुंचा, इन सभी बातों का असर पड़ता है. फिर भी, सही तरीके से तैयार किया गया बायोफ्यूल प्रदूषण घटाने में मदद कर सकता है. खासकर विमानन, भारी ट्रक और समुद्री परिवहन जैसे क्षेत्रों में इसका महत्व बढ़ रहा है, जहां केवल बैटरी से काम चलाना अभी कठिन है.

क्या है बायोफ्यूल का भविष्य?

भविष्य में बायोफ्यूल का ध्यान केवल गन्ने और मक्का तक सीमित नहीं रहेगा. कृषि कचरा, पराली, लकड़ी के अवशेष, शैवाल, नगरों का जैविक कचरा और इस्तेमाल किया गया खाद्य तेल महत्वपूर्ण स्रोत बन सकते हैं. इसे दूसरी और तीसरी पीढ़ी का बायोफ्यूल कहा जाता है. इसका लाभ यह है कि इससे खाद्य फसलों पर दबाव कम हो सकता है. बायोफ्यूल, इलेक्ट्रिक वाहन और ग्रीन हाइड्रोजन एकदूसरे के विरोधी नहीं हैं. आने वाले समय में ये सभी ऊर्जा विकल्प अलगअलग जरूरतों के लिए साथ काम करेंगे.