क्या आपका बच्चा मोबाइल हाथ में लेते ही लगातार रील्स स्क्रॉल करने लगता है. अगर ऐसा है तो यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि उसके दिमाग पर गहरा असर डालने वाली आदत भी हो सकती है. दुनिया भर के वैज्ञानिकों और मेडिकल संस्थानों की हालिया रिसर्च बताती है कि इंस्टाग्राम रील्स, टिकटॉक और दूसरे शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म बच्चों की सोचने, समझने और लंबे समय तक ध्यान लगाने की क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं. रिसर्च के मुताबिक, बारबार मिलने वाले छोटेछोटे वीडियो दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम को लगातार सक्रिय रखते हैं, जिससे बच्चे लंबे समय तक पढ़ाई, किताब या किसी एक काम पर फोकस नहीं कर पाते. माइक्रोसॉफ्ट, झेजियांग यूनिवर्सिटी, अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन, द वॉल स्ट्रीट जर्नल और फोर्ब्स जैसी संस्थाओं और प्रकाशनों ने भी इस विषय पर गंभीर चिंता जताई है. ऐसे में सवाल है कि आखिर रील्स बच्चों के दिमाग में क्या बदलाव ला रही हैं और इससे बचने का तरीका क्या है.

क्या है ‘शॉर्ट अटेंशन स्पैन’?
शॉर्ट अटेंशन स्पैन का मतलब है किसी एक काम, किताब, पढ़ाई या बातचीत पर लंबे समय तक ध्यान न टिक पाना. माइक्रोसॉफ्ट की इंसानी व्यवहार पर आधारित चर्चित रिसर्च के अनुसार साल 2000 में इंसानों का औसत अटेंशन स्पैन करीब 12 सेकंड था, जो स्मार्टफोन और शॉर्ट वीडियो के दौर में घटकर लगभग 8 सेकंड रह गया. रिसर्च में यह भी बताया गया कि यह समय गोल्डफिश के औसत 9 सेकंड के अटेंशन स्पैन से भी कम है. विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार 15 से 30 सेकंड के वीडियो देखने से दिमाग उसी तेज गति का आदी हो जाता है. ऐसे में स्कूल की क्लास, किताब या लंबी बातचीत बच्चों को उबाऊ लगने लगती है.
रील्स देखते ही दिमाग में क्या होता है?
चीन की झेजियांग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने न्यूरोइमेजिंग तकनीक की मदद से बच्चों के दिमाग पर शॉर्ट वीडियो का असर समझने की कोशिश की. रिसर्च के दौरान एमआरआई स्कैन में पाया गया कि रील्स और टिकटॉक वीडियो देखते समय दिमाग का वेंट्रल टेगमेंटल एरिया यानी रिवॉर्डो पाथवे तेजी से सक्रिय हो जाता है. यही हिस्सा खुशी और इनाम मिलने का अहसास कराता है. हर कुछ सेकंड में नया वीडियो मिलने से डोपामाइन तेजी से रिलीज होता है, जिससे बच्चा बारबार स्क्रीन स्क्रॉल करने लगता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यही प्रक्रिया धीरेधीरे आदत को लत में बदल सकती है और लंबे समय तक ध्यान लगाने की क्षमता कमजोर होने लगती है.
‘टिकटॉक ब्रेन’ क्या है?
द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने इस पूरे बदलाव को “टिकटॉक ब्रेन” नाम दिया है. इसे आप रील्स ब्रेन भी कह सकते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, जो निर्णय लेने, धैर्य रखने और किसी काम को पूरा करने में मदद करता है, लगभग 25 साल की उम्र तक विकसित होता है. अगर इसी दौरान बच्चा लगातार शॉर्ट वीडियो का आदी बन जाए तो उसके फोकस और आत्मनियंत्रण पर असर पड़ सकता है. वहीं फोर्ब्स की रिपोर्ट बताती है कि इंस्टाग्राम, टिकटॉक और यूट्यूब शॉर्ट्स के एल्गोरिदम यूजर की पसंद को तेजी से समझते हैं और उसी तरह का कंटेंट लगातार दिखाते हैं. इससे डोपामाइन का स्तर बारबार बढ़ता है और यूजर लंबे समय तक प्लेटफॉर्म से जुड़ा रहता है.
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन ने क्यों जारी की चेतावनी?
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन ने बच्चों और किशोरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर परामर्श जारी किया है. एसोसिएशन के अनुसार, जो बच्चे रोजाना दो घंटे या उससे अधिक समय शॉर्ट वीडियो देखते हैं, उनमें कई व्यवहारिक बदलाव दिखाई दे सकते हैं. इनमें छोटीछोटी बातों पर गुस्सा आना, पढ़ाई में मन न लगना, नींद की समस्या, बेचैनी और लगातार मोबाइल देखने की इच्छा शामिल है. एक्सपर्ट का कहना है कि जब वास्तविक जीवन में रील्स जैसी तुरंत खुशी नहीं मिलती तो कई बच्चों में तनाव और चिंता भी बढ़ सकती है. स्कूलों में शिक्षकों ने भी बच्चों की घटती एकाग्रता को लेकर चिंता जताई है.
बच्चों को इस डिजिटल लत से कैसे बचाएं?
बच्चों को इस डिजिटल लत से बचाने के लिए बाल रोग विशेषज्ञों और टेक एक्सपर्ट्स तीन तरीके बताएं हैं. सबसे पहला और जरूरी कदम है ‘स्क्रीनफ्री टाइम’ और ‘नो गैजेट जोन’ बनाना. घर में रात को खाना खाते समय और सोने से एक घंटे पहले मातापिता और बच्चे दोनों के लिए मोबाइल का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित होना चाहिए. दूसरा उपाय यह है कि बच्चों को रील्स के डिजिटल डोपामाइन से निकालकर असल जिंदगी के फिजिकल डोपामाइन की तरफ ले जाएं, जिसके लिए उन्हें मैदानी खेल, संगीत, चित्रकारी या किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित करें. तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण तरीका यह है कि मातापिता खुद बच्चों के सामने एक रोल मॉडल बनें, क्योंकि कई बार बच्चे मातापिता को ही दिनभर स्क्रीन स्क्रॉल करते देखकर यह आदत सीखते हैं.
डिजिटल डोपामाइन क्या है और यह क्यों बन जाता है आदत?
रिसर्च के अनुसार, जब कोई व्यक्ति लगातार नए और दिलचस्प शॉर्ट वीडियो देखता है, तो हर वीडियो के साथ दिमाग में डोपामाइन नाम का न्यूरोट्रांसमीटर रिलीज होता है. इसे आम भाषा में “फील गुड केमिकल” भी कहा जाता है. समस्या तब शुरू होती है जब दिमाग बारबार इसी तुरंत मिलने वाली खुशी का आदी बन जाता है. इसके बाद पढ़ाई, किताब, होमवर्क या सामान्य बातचीत जैसी गतिविधियां बच्चों को उतनी रोचक नहीं लगतीं क्योंकि उनमें तुरंत इनाम जैसा अनुभव नहीं मिलता. यही वजह है कि बच्चे बारबार मोबाइल उठाकर नया वीडियो देखने लगते हैं. विशेषज्ञ इसे डिजिटल डोपामाइन लूप कहते हैं, जो समय के साथ आदत को और मजबूत कर सकता है.
क्या करना चाहिए?
वैज्ञानिकों का कहना है कि तकनीक खुद समस्या नहीं है, बल्कि उसका जरूरत से ज्यादा और बिना नियंत्रण के इस्तेमाल चिंता की वजह बन सकता है. इसलिए बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम तय करना, उम्र के अनुसार कंटेंट चुनना और परिवार के साथ ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा देना जरूरी है. अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन का भी कहना है कि सोशल मीडिया का उपयोग बच्चों की उम्र, मानसिक स्थिति और पारिवारिक माहौल को ध्यान में रखकर होना चाहिए. जितना जरूरी डिजिटल दुनिया से जुड़ना है, उतना ही जरूरी वास्तविक दुनिया के अनुभव भी हैं. अगर समय रहते संतुलन नहीं बनाया गया, तो एकाग्रता, सीखने की क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है.



