Bihar Teacher Fraud: बिहार में सरकारी नौकरी के नाम पर फर्जीवाड़े का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने शिक्षा विभाग की नियुक्ति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. यहां एक व्यक्ति को एक ही समय में दरोगा और शिक्षक, दोनों पदों पर नौकरी मिलने का अवसर मिला. उसने शिक्षक की नौकरी छोड़कर दरोगा की वर्दी पहन ली, लेकिन उसके पीछे शिक्षक का खाली रह गया पद किसी दूसरे व्यक्ति के लिए सरकारी नौकरी का रास्ता बन गया.

हैरानी की बात यह है कि दूसरे व्यक्ति ने कथित तौर पर उसी मूल अभ्यर्थी के नाम और दस्तावेजों का इस्तेमाल कर शिक्षक की नौकरी हासिल कर ली और करीब 30 वर्षों तक सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाता रहा. अब तीन दशक बाद शिक्षा विभाग ने इस फर्जीवाड़े का पर्दाफाश करते हुए आरोपी शिक्षक मनोज कुमार को सेवा से बर्खास्त कर दिया है.
बांका जिले का है मामला
मामला बांका जिले के बाराहाट प्रखंड स्थित प्रोन्नत मध्य विद्यालय नगरी जानुकित्ता का है. जिला शिक्षा विभाग ने सहायक शिक्षक मनोज कुमार को बिहार सरकारी सेवक नियमावली 2005 के तहत तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त किया है. विभागीय जांच में सामने आया कि आरोपी ने वर्ष 1994 में बिहार लोक सेवा आयोग की शिक्षक भर्ती परीक्षा में सफल हुए एक दूसरे अभ्यर्थी की पहचान और शैक्षणिक दस्तावेजों का कथित तौर पर इस्तेमाल कर नौकरी हासिल की थी.
असली मनोज कुमार ने चुनी दरोगा की वर्दी
जांच में सामने आई कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है. वर्ष 1994 में बीपीएससी की शिक्षक भर्ती परीक्षा में मनोज कुमार नाम के एक अभ्यर्थी सफल हुए थे. इसी दौरान उनका चयन दरोगा पद पर भी हो गया. उन्होंने शिक्षक पद पर योगदान देने के बजाय वर्ष 1994 में ही पुलिस विभाग में दरोगा के रूप में नौकरी ज्वाइन कर ली. वर्तमान में वह रांची में पुलिस निरीक्षक के पद पर पदस्थापित हैं.
दूसरे ने हथिया ली शिक्षक की कुर्सी
उनके शिक्षक पद पर योगदान नहीं देने से रिक्त रह गई सीट का कथित तौर पर दूसरे व्यक्ति ने फायदा उठाया. आरोप है कि उसने असली अभ्यर्थी के नाम, पिता के नाम, पते, पैन कार्ड और शैक्षणिक प्रमाण पत्रों का इस्तेमाल कर शिक्षक पद पर नियुक्ति हासिल कर ली. इसके बाद वह पंजवारा और बाराहाट क्षेत्र के विद्यालयों में करीब तीन दशक तक सहायक शिक्षक के रूप में नौकरी करता रहा.
देवघर पुलिस की जांच से खुला 30 साल पुराना राज
इस पूरे फर्जीवाड़े का खुलासा झारखंड के देवघर जिले के मोहनपुर थाना कांड संख्या 216/23 की जांच के दौरान हुआ. जांच की कड़ी बांका जिला शिक्षा विभाग तक पहुंची. इसके बाद देवघर पुलिस और बांका जिला शिक्षा पदाधिकारी कार्यालय ने संयुक्त रूप से मामले की पड़ताल शुरू की.
जांच के दौरान आरोपी शिक्षक से वर्ष 1994 की बीपीएससी परीक्षा, मैट्रिक और इंटरमीडिएट के मूल प्रमाण पत्र मांगे गए. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। लेकिन वह मूल दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका. उसने केवल डुप्लीकेट प्रमाण पत्र दिखाए. दूसरी तरफ, रांची में पुलिस निरीक्षक के पद पर तैनात मूल सफल अभ्यर्थी मनोज कुमार के दस्तावेजों का सत्यापन कराया गया तो उनके सभी मूल दस्तावेज सही पाए गए.
नोटिस का जवाब देने से बचता रहा आरोपी शिक्षक
विभागीय कार्रवाई के दौरान आरोपी शिक्षक से स्पष्टीकरण भी मांगा गया. लेकिन वह कभी कोलकाता में इलाज कराने तो कभी अन्य कारणों का हवाला देकर जवाब देने से बचता रहा. विभाग की ओर से भेजे गए निबंधित पत्र भी अपूर्ण पते के कारण वापस लौटते रहे. अंततः जिला कार्यक्रम पदाधिकारी स्थापना एवं संचालन पदाधिकारी की जांच रिपोर्ट में आरोप प्रमाणित पाए गए.
इसके बाद जिला शिक्षा विभाग ने आरोपी शिक्षक मनोज कुमार को तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त करने का आदेश जारी कर दिया. साथ ही मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए हैं. करीब 30 वर्षों तक सरकारी व्यवस्था की नजरों से बचा रहा यह फर्जीवाड़ा अब सामने आया है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस व्यक्ति ने दूसरे अभ्यर्थी की पहचान और दस्तावेजों के सहारे तीन दशक तक सरकारी नौकरी की, उसका इतने लंबे समय तक सत्यापन क्यों नहीं हो सका?



