ओपेक टूट गया। यूएई ने ओपेक से बाहर निकलने का फैसला लिया। इसको आप यूएस ईरान युद्ध की पहली कैजुअल्टी मान सकते हैं। जी हां, यह ताकत थी जो पूरी दुनिया में दरअसल तेल के बाजार को कंट्रोल करती थी और यह ताकत, यह परिवार बिखरने लगा है। क्या कुछ इसके मायने हैं? क्या कुछ इसकी वजह हैं? 1 मई से आधिकारिक रूप से यूएई ओपेक संगठन का हिस्सा नहीं रहेगा। करीब 10% उत्पादन पर तेल के यूएई का कब्जा था। यूएई का कुल आपूर्ति में योगदान था। लेकिन उससे बड़ी यूएई की पोजीशनिंग, पोशंगिंग इस पूरे ग्रुप में थी।
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ओपेक प्लस (OPEC+) गठबंधन क्या है?
साल 2016 में तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक (OPEC) ने 10 ऐसे अन्य देशों के साथ साझेदारी की जो तेल का उत्पादन तो करते हैं, लेकिन ओपेक के सदस्य नहीं थे (इनमें रूस सबसे प्रमुख है)। इन सभी देशों के मिलकर बने इस नए और बड़े समूह को ही ‘ओपेक प्लस’ (OPEC+) कहा जाता है। पूरी दुनिया में जितना भी तेल निकाला जाता है, उसका लगभग 40 से 45 प्रतिशत हिस्सा इसी गठबंधन के नियंत्रण में है। इतनी बड़ी मात्रा में तेल पर नियंत्रण होने के कारण, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल (ऊर्जा) की कीमतें तय करने या उन पर असर डालने में इस समूह की ताकत बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।
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कौन-कौन से देश शामिल हैं
वर्तमान में इस संगठन के सदस्यों की संख्या में कुछ बदलाव हुए हैं। वैसे तो इस समूह में पहले 13 या उससे ज्यादा सदस्य होते थे, लेकिन हाल की घटनाओं के कारण इसकी संरचना बदल गई है। सक्रिय सदस्य (12 देश): अल्जीरिया, कांगो, इक्वेटोरियल गिनी, गैबॉन, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, सऊदी अरब (जो इस समूह का मुख्य नेता माना जाता है), संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और वेनेजुएला। हाल ही में बाहर होने वाले देश: अंगोला 1 जनवरी 2024 से इस समूह से बाहर हो गया है।
ओपेक (OPEC) दुनिया भर में तेल की कीमतों को कैसे नियंत्रित करता है?
ओपेक मुख्य रूप से कच्चे तेल के उत्पादन का एक ‘कोटा’ (लिमिट) तय करता है। इसी के जरिए वह पूरी दुनिया में तेल की सप्लाई को मैनेज करता है और कीमतों को कंट्रोल करता है। कीमतें बढ़ाना या स्थिर रखना: जब ओपेक चाहता है कि तेल की कीमतें बढ़ें या बाजार में स्थिर रहें, तो सभी सदस्य देश आपसी सहमति से तेल का उत्पादन (निकालना) कम कर देते हैं। (सप्लाई कम होने से कीमतें बढ़ जाती हैं)। जब उन्हें कीमतें कम करनी होती हैं, तो वे तेल का उत्पादन बढ़ा देते हैं।
ओपेक एक ‘कार्टेल’ (व्यापारियों या देशों का ऐसा गुट जो बाजार पर अपना दबदबा बनाए रखता है) की तरह काम करता है। दुनिया में अब तक जितना भी तेल का भंडार खोजा गया है, उसका लगभग 80% हिस्सा ओपेक देशों के ही पास है। इतने बड़े हिस्से पर कब्ज़ा होने के कारण यह समूह आसानी से अंतरराष्ट्रीय बाजार के “संतुलन” को अपने हिसाब से प्रभावित कर लेता है।
अब क्या हुआ
संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने मंगलवार को घोषणा की है कि वह एक मई से पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन (ओपेक) से अलग हो जाएगा। यूएई ने अपनी सरकारी समाचार एजेंसी ‘डब्ल्यूएएम’ के माध्यम से यह घोषणा की। यूएई ने कहा कि यह निर्णय संयुक्त अरब अमीरात के दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण तथा बदलते ऊर्जा समीकरणों को दर्शाता है। साथ ही वैश्विक ऊर्जा बाजारों में एक जिम्मेदार, विश्वसनीय और दूरदर्शी भूमिका निभाने की उसकी प्रतिबद्धता को मजबूत करता है। यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब यूएई का सऊदी अरब के साथ तनाव बढ़ता जा रहा है, खासकर आर्थिक मुद्दों और ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ यमन में जारी युद्ध को लेकर दोनों देशों के बीच टकराव की स्थित है।
यूएई ने ओपेक क्यों छोड़ा?
यूएई ने अपनी तेल उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश किया है, लेकिन उसे लंबे समय से यह शिकायत थी कि ओपेक के सख्त नियमों और कोटे की वजह से वह अपनी क्षमता के मुताबिक तेल का निर्यात नहीं कर पा रहा है (यानी तेल नहीं बेच पा रहा है)। ओपेक छोड़ने का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब हाल ही में ईरान के हमलों के दौरान बाकी अरब देशों ने यूएई को सैन्य और राजनीतिक समर्थन नहीं दिया था, जिसकी यूएई ने कड़ी आलोचना भी की थी। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों का कहना है कि समूह से बाहर निकलने का यह फैसला उनकी “लंबी अवधि की रणनीतिक और आर्थिक सोच” का हिस्सा है। इससे उन्हें बाजार के बदलते हालात के हिसाब से तुरंत और स्वतंत्र रूप से फैसले लेने में ज्यादा आज़ादी मिलेगी।
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भारत के लिए कैसे खुलेगा फायदे का रास्ता?
भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में यूएई का ओपेक से बाहर आना भारत के लिए किसी लॉटरी से कम नहीं है। अब यूएई पर ओपेक के उत्पादन कोटे की कोई रोक-टोक नहीं है। उसने तेल उत्पादन बढ़ाने में जो भारी निवेश किया है, अब उसका इस्तेमाल करते हुए वह अपनी पूरी क्षमता से तेल बाजार में उतारेगा। सीधा सा गणित है कि जब बाजार में तेल की सप्लाई ज्यादा होगी, तो उसकी कीमतें गिरेंगी। अगर कच्चे तेल के दाम में 5 से 10 डॉलर प्रति बैरल की भी कमी आती है, तो भारत के अरबों रुपये बचेंगे। अब तक तेल खरीदने के मामले में भारत को काफी हद तक ओपेक के कड़े नियमों और सऊदी अरब की नीतियों के हिसाब से चलना पड़ता था। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। लेकिन यूएई का यह कदम भारत के लिए एक शानदार रणनीतिक मौका लेकर आया है। अब भारत बिना किसी संगठन की बंदिश के, सीधे तौर पर यूएई से बात करके लंबे समय के लिए और रियायती दरों पर (सस्ते) तेल के सौदे पक्के कर सकता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि भारत को तेल के लिए सिर्फ रूस या अन्य देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। हमारे पास अपने पुराने और भरोसेमंद दोस्त यूएई से ज्यादा से ज्यादा तेल खरीदने का मजबूत विकल्प होगा। यूएई पहले से ही भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। तेल को लेकर यूएई की इस नई आज़ादी से दोनों देशों की दोस्ती और व्यापारिक रिश्ते एक नई ऊंचाई पर पहुंचेंगे।