Thursday, April 2, 2026
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यूं ही नहीं बदले ट्रंप के सुर, बिना मिसाइल दागे ही अमेरिका को पस्त कर सकता है ईरान!..

यूं ही नहीं बदले ट्रंप के सुर, बिना मिसाइल दागे ही अमेरिका को पस्त कर सकता है ईरान!..
यूं ही नहीं बदले ट्रंप के सुर, बिना मिसाइल दागे ही अमेरिका को पस्त कर सकता है ईरान!..

Middle East war: ईरान-अमेरिका का युद्ध दूसरे महीने में इंट्री कर चुका है. ईरान एक ओर डटकर खड़ा है तो वहीं अमेरिका की ओर से रोज नए शगूफे छोड़े जा रहे हैं.अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कभी करते हैं कि उन्हें ईरानी तेल चाहिए, खार्ग आईलैंड पर कब्जा चाहिए, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुला चाहिए तो कभी सारी बातों से पीछे हटने की बात करते हैं. ट्रंप की बातें इशारा कर रही हैं कि अमेरिका अब इस युद्ध से बाहर निकलना चाहता है. लेकिन सोचने वाली बात है आखिर ऐसा हुआ कैसे ? अमेरिका को किस बात का डर सता रहा है कि वो बिना किसी डील, बिना किसी निर्णय के ईरान युद्ध को छोड़ने की तैयारी में है ? दरअसल ये डर मिसाइलों और गोले-बारूद का नहीं, बल्कि डॉलर को लेकर है. अमेरिका को डॉलर की ताकत, उसकी बादशाहत छीनने का डर सता रहा है. ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर जो फैसला किया, उससे अमेरिका घबरा गया है.

समंदर में ईरान के टोल प्लाजा से अमेरिका को किस बात का डर सता रहा है ?
ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर टोल टैक्स लगाने का फैसला किया है. इस महत्वपूर्ण रास्ते से गुजरने वाले जहाजों को अब टोल टैक्स भरना होगा. ईरान की संसद की सुरक्षा समिति ने इसे मंजूरी दे दी है. इजरायल और अमेरिका के जहाजों को छोड़कर बाकी देशों के जहाज यहां टोल टैक्स भरकर होर्मुज को पार कर सकेंगे. टोल टैक्स के लिए भी ईरान ने एक शर्त रखी है. शर्त यह कि टोल का पेमेंट रियाद या चीनी करेंसी युआन में होगी.

अमेरिका की बादशाहत को खतरा
ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपने फैसले से वैश्विक तेल व्यापार में डॉलर के प्रभुत्व को हिलाकर रख दिया है. ईरान के शर्त के मुताबिक चीनी युआन या ईरानी रियाल सिर्फ दो करेंसी में भुगतान कर होर्मुज को पार किया जा सकेगा. इस फैसले से जहां चीन गदगद है, तो वहीं अमेरिका की हालत खराब है. ईरान के इस फैसले से डॉलर को सीधी चुनौती मिलेगी. ईरान की शर्त से 50 साल पुराने पेट्रो डॉलर सिस्टम को चुनौती मिलने वाली है. डॉलर ने बीते पांच दशकों ने कच्चे तेल के बाजार में अपनी बादशाहत को कायम की है. अमेरिकी करेंसी में तेल की खरीद-फरोख्त ने उसे ग्लोबल करेंसी बना दिया. डॉलर की बढ़ती मांग ने अमेरिका की इकोनॉमी को ताकत दी, लेकिन अब ईरान के फैसले से उसे बड़ा झटका लग सकता है.

अमेरिका को झटका, पेट्रोडॉलर प्रणाली खतरे में है
अमेरिका और खाड़ी के तेल उत्पादक देशों के बीच तेल की कीमत डॉलर में तय करने, उसकी खरीद-बेच डॉलर में करने का एक सिस्टम दशकों से काम कर रहा है. यही पेट्रोडॉलर प्रणाली का आधार भी रहा है. 1944 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रेटन वुड्स समझौते ने अमेरिकी डॉलर को सोने से जोड़ गया, जिसने उसकी ताकत को और बढ़ा दिया. साल 1971 में ब्रेटन वुड्स प्रणाली के खत्म होने के बाद भी डॉलर की मांग लगातार बनी रही.बाद में अमेरिका ने मिडिल ईस्ट देशों के साथ गुप्त समझौता किया, जिसमें उन्हें सैन्य सुरक्षा, हथियार बिक्री और आर्थिक सहायता देने के बदले ये शर्त रखी गई कि वो देश सिर्फ डॉलर में ही अपने तेल बेचेंगे. इसने पेट्रोडॉलर की ताकत को और बढ़ा दिया, लेकिन अब उसकी बादशाहत खतरे में है.

ईरान ने दी अमेरिका के पेट्रोडॉलर को कड़ी चुनौती
समय के साथ अमेरिका की चालाकी खुलकर सामने आने लगी. चीन, रूस, ईरान जैसे देशों ने डॉलर के बजाए लोकल करेंसी जैसे युआन, रुपये आदि में तेल खरीद-बेचने लगे. ब्रिक्स देशों ने भी ताकत दिखाई और डॉलर से दूर होने का फैसला किया. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। अब ईरान ने इसी कड़ी टक्कर दी है. ग्लोबल ऑयल और गैस एक्सपोर्ट-इंपोर्ट में होर्मुज की हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी की है. ऐसे में अगर ईरान की शर्तें बाकी देशों ने मान ली और रियाल और युआन में टोल का भुगतान करना शुरू कर दिया तो पेट्रो डॉलर के अस्थित्व पर खतरा मंडराने लगेगा. अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने भी इस ओर इशारा करते हुए कहा कि ये स्थिति भयावह है.

me.sumitji@gmail.com

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