लाख टके का सवाल- आखिर लेबनान पर बमबारी क्यों नहीं रोक रहे नेतन्याहू? अमेरिका भी है सपोर्ट में!..

इजरायल से सटे लेबनान के चलते अमेरिका और ईरान का सीजफायर टूट सकता है. ईरान युद्ध तो थम गया है, लेकिन इजरायल ने लेबनान पर बम बरसाना नहीं रोका. 24 घंटे में ही 100 से ज्यादा मिसाइलों ने लेबनान में काफी खून बहाया है. ईरान ने चेतावनी दी है कि लेबनान (हिजबुल्ला) पर हमले रोकने होंगे. उधर, अमेरिका दावा कर रहा है कि दो हफ्ते के युद्धविराम समझौते में लेबनान शामिल ही नहीं था. नेताओं की दादागिरी में पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ पोपट बन गए. उन्होंने पहले ‘ड्राफ्ट’ सहित पोस्ट शेयर कर अपना मजाक बनाया. बाद में सुधारा, तो उसमें लेबनान पर भी हमले रोकने की बात लिख दी. अब अमेरिका और इजरायल मान ही नहीं रहे हैं.

9 अप्रैल की सुबह खबर आई कि ईरान ने फिर से होर्मुज रूट बंद कर दिया है. वह हॉर्मुज से गुजरने वाले तेल टैंकरों से एक डॉलर प्रति बैरल चुंगी वसूलने का मन बना चुका है. पेमेंट बिटक्वाइन में करना होगा. सवाल है कि नेतन्याहू अपने सबसे अच्छे दोस्त के किए सीजफायर को खतरे में क्यों डाल रहे हैं? अब लेबनान का क्या होगा?

शहबाज शरीफ के ‘धोखे’ से 250 लोग मर गए
हां, अमेरिका और ईरान के सीजफायर की घोषणा कर शहबाज शरीफ अपनी तारीफ करवा रहे थे. असल में, चीन के कहने पर ईरान राजी हुआ था, लेकिन हर तरफ पाक पीएम की चर्चा थी. उनके ट्वीट को सच मानकर बैठे लेबनान के लोगों की लाशें बिछ गईं. मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे पाकिस्तान के पीएम ने बाकायदे 8 अप्रैल के ट्वीट में कहा था कि ईरान और अमेरिका अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर लेबनान और बाकी सभी जगहों पर तत्काल सीजफायर के लिए सहमत हो गए हैं. शरीफ ने कहा था कि यह तत्काल प्रभाव से लागू होगा, लेकिन हुआ इसका उलटा.

घोषणा के कुछ घंटे बाद ही इजरायल ने लेबनान पर अब तक का सबसे बड़ा हमला कर दिया. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। 10 मिनट के अंदर 100 से ज्यादा ठिकानों को उड़ा दिया गया. करीब 250 लोगों के मारे जाने की खबर है. इजरायल के रुख से साफ है कि भले ही नेतन्याहू अमेरिका के सीजफायर का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन वह पूरी तरह सहमत नहीं हैं.

कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि नेतन्याहू को लग रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी नेतृत्व के बीच नई कूटनीतिक व्यवस्था ने उन्हें हाशिए पर धकेल दिया है. इजरायल को लग रहा है कि जिन तीन उद्देश्यों के लिए ईरान युद्ध शुरू किया गया था, वह अभी अधूरा है. इसमें शामिल था- 1. ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना 2. बैलिस्टिक मिसाइलों का विकास रोकना और 3. ईरान में सत्ता परिवर्तन. लेबनान में युद्ध जारी रखना एक ऐसा तरीका है, जिससे नेतन्याहू उस दबाव को बनाए रख सकें, जिसकी कूटनीतिक समझौते में उन्हें अभी कमी दिख रही है.

लेबनान पर बमबारी की असली वजह
नेतन्याहू उत्तरी इजरायल की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं. लेबनान में सक्रिय हिजबुल्ला को ईरान से सपोर्ट मिलता है. ऐसे में, नेतन्याहू सरकार का मानना है कि जब तक हिजबुल्ला के रॉकेट हमलों का खतरा पूरी तरह से खत्म नहीं हो जाता और विस्थापित इजरायली अपने घरों को लौट नहीं जाते, तब तक हमले जारी रहेंगे.

नेतन्याहू के पीछे न हटने की एक और वजह है. 1982 और 2006 में भी लेबनान को लेकर जल्दबाजी में फैसले लिए गए थे, जिसका नुकसान हुआ था. अब नेतन्याहू पुरानी गलती को दोहराना नहीं चाहते.

नेतन्याहू का स्पष्ट मत है कि हम अपने देश के सुरक्षा हितों की अनदेखी नहीं करेंगे. यह संघर्ष असल में केवल हिजबुल्ला को कमजोर करने तक सीमित नहीं है. यह वॉशिंगटन और तेहरान दोनों के लिए मैसेज है कि इजरायल ऐसे किसी सीजफायर में बंधकर नहीं रहेगा, जो उसे दीर्घकालिक सुरक्षा गारंटी नहीं देता या ईरान के परमाणु खतरे का समाधान नहीं करता. इजरायली मिसाइलों के मुंह खुले रहेंगे.