
Social Media Addiction: सोशल मीडिया का प्रयोग वर्तमान समय में तेजी से बढ़ा है. इसके साथ ही इसका प्रभाव भी बढ़ रहा है. सोशल मीडिया का सर्वाधिक उपयोग युवाओं द्वारा किया जा रहा है. सोशल मीडिया युवाओं के सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों के साथ उनकी जीवन शैली और विचारों को प्रभावित कर रहा है. युवा सोशल मीडिया पर अपनी निजी जिंदगी खोजने लगा है, जिसके कारण सोशल मीडिया का नकारात्मक पक्ष भी उभर रहा है.
डॉ. आर. एन. पाण्डेय, असिस्टेंट प्रोफेसर/मीडिया प्रभारी: आज का दौर सही मायने में देखा जाए तो युवा शक्ति का है. भारत में इस समय 65 फीसदी युवा है, जो किसी और देश में नहीं है. इन युवाओं को जोड़ने का काम सोशल मीडिया कर रहा है. युवाओं पर सोशल मीडिया का प्रभाव बहुत ही गहन है. यह वह वर्ग है जो सबसे ज्यादा सपनें देखता है और उसे पूरा करने की कोशिश भी करता है. युवाओं को सोशल मीडिया नेटवर्किंग साइट्स का नशा हो रहा है, दिन भर में कई बार स्टेटस अपडेट करना, लाइक करना, कमेंट करना, शेयर करना इसकी अहम जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा हो गया है.
अफीम के नशे जैसा रील्स का नशा
भारतीय सामाजिक संदर्भ में अगर देखा जाए तो युवाओं को रील्स की दुनिया में रुचि काफी पनप रही है, जो उन्हें चिंताजनक स्थिति की तरफ ले जा रही है. जिस प्रकार चीन का 19वीं सदी में अफीम के कारण पतन हुआ था. ब्रिटिश औपनिवेशिक ताकतों ने अफीम के नशे का फायदा उठाकर चीन की अर्थव्यवस्था को न केवल तबाह किया बल्कि अपनी हर शर्त मानने के लिए उसे विवश भी कर दिया. चीनी नागरिकों के लिए अफीम एक नशे के साथ-साथ एक मानसिक बीमारी भी बन गई थी. यही नशा आगे चलकर चीन के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक पतन का कारण बना था.
सोशल मीडिया के नशे में युवा
ठीक इसी प्रकार आज 21वीं सदी में युवा सोशल मीडिया के नशे से घिरता जा रहा है. भारतीय युवा पीढ़ी अपनी आंखें फोन स्क्रीन पर कई-कई घंटे गड़ाये रहती है. शॉर्ट्स वीडियो और रील का नशा कुछ ऐसे है कि हर बार बस एक और वीडियो सोच कर स्क्रॉल करते रहते हैं और घंटों अंतहीन रील्स की दुनिया में खो जाते हैं. स्क्रीन पर अनगिनत स्क्रॉल की लत एक तरह का डिजिटल नशा है, जो मस्तिष्क को धीमा, सुस्त और निष्क्रिय बना रहा है. एक शोध वेबसाइट रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की आधी से अधिक आबादी सोशल मीडिया का उपयोग करती है. वर्ष 2024 तक 5.17 अरब उपयोगकर्ता सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं. भारत में यह आंकड़ा लगभग 50 करोड़ के पार पहुंच चुका है. आईआईएम अहमदाबाद द्वारा प्रकाशित एक शोध में पाया गया कि भारत में रोजाना लोग चार घंटे से अधिक का समय सोशल मीडिया पर बिता रहे हैं. कुछ युवाओं में यह अवधि 5 घंटे से अधिक की देखी जा रही है जो वैश्विक मानकों से कहीं अधिक है. वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू रिपोर्ट के अनुसार भारत में 40 करोड़ इंस्टाग्राम उपयोगकर्ता है.
युवाओं को मानसिक कमजोर बना रही रील्स
इंस्टाग्राम रील्स जैसे कंटेंट की आदत युवाओं को मानसिक तौर पर कमजोर बना रही है. अगर डाटा आधारित आंकड़ों पर ध्यान दें तो हम पाते हैं कि साल भर में एक महीने से ज्यादा का समय रील देखकर बर्बाद किया जा रहा है, जो किसी रचनात्मक रूप से कैरियर अपग्रेड करने के लिए किया जा सकता था. जीवन में इसकी भरपाई कैसे होगी. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ऐसे में हमें यह समझना होगा कि हमारा मस्तिष्क प्रकृति का एक अनुपम उपहार है, जो सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि रचनात्मक संवाद के लिए रचा गया है. डिजिटल मीडिया का यह नशा बच्चों के अंदर की रचनात्मक प्रतिभा को मार रहा है और उसे कमजोर कर रहा है. जहां दुनिया भर के युवा इंजीनियर, वैज्ञानिक और चिकित्सा के क्षेत्र में नई-नई खोजने में लगे हैं वहीं भारतीय युवा रील्स देखने और बनाने में व्यस्त है. देश भर में युवाओं का एक बड़ा वर्ग डिजिटल नशे का शिकार हो रहा है अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण घंटे नष्ट कर रहा है बेशक ये रील्स किसी मनोरंजन का साधन हो सकती हैं लेकिन अब इसका नकारात्मक पिछले असर कुछ वर्षों से देखने को मिल रहा है. कैसे चुपके से रील्स युवाओं जीवन में करियर और कमाई के साथ सेहत को भी बुरी तरह से प्रभावित कर रही है.
टिक-टॉक ने ली रील्स की जगह
एक समय था जब भारतीय युवा टिक टॉक बनाने में व्यस्त थे जब इससे पीछा छूटा तो उसकी जगह रील्स और शॉट्स ने ले लिया. कैसे रील्स का जाल हमारे रिश्तों और संस्कारों पर गहरा आघात कर रहा है. सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जुड़ी द्रोपदी ड्रीम की ट्रस्ट चेयरपर्सन नीरा मिश्रा का कहना है कि रील्स के माध्यम से हमारी संस्कृति और संस्कारों के बारे में भ्रामक जानकारी दी जा रही है. मनोरंजन की आड़ में फूहड़ता और अश्लीलता परोसी जा रही है जिसे देखकर युवा भ्रमित हो रहे है. लोग उसे ही सच मानकर उसका अनुकरण कर रहे हैं. भारतीय ऐतिहासिक तथ्यों भी भ्रामक तरीके से दिखाए और बताए जा रहे हैं






