भारत में E20 पेट्रोल को लेकर लगातार चर्चा हो रही है. अब मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने सुझाव दिया है कि सरकार को E20 के साथसाथ कम एथेनॉल वाला पेट्रोल, जैसे E10 भी पेट्रोल पंपों पर उपलब्ध कराना चाहिए. उनका कहना है कि इससे पुरानी गाड़ियों के मालिकों की चिंता काफी हद तक कम हो सकती है. नागेश्वरन ने आर्थिक मामलों के विभाग के सलाहकार आकाश पूजारी के साथ लिखे एक लेख में यह बात कही है. उनके मुताबिक E20 के साथ E10 जैसे कम एथेनॉल वाले पेट्रोल का विकल्प उपलब्ध रहने से पुरानी गाड़ियों को ज्यादा आसानी से चलाया जा सकेगा.

सरकार ने पिछले महीने साफ किया था कि फिलहाल E0 या E10 जैसे कम एथेनॉल वाले पेट्रोल को दोबारा शुरू करने का कोई प्रस्ताव नहीं है. पिछले साल E20 को देशभर में शुरू किया गया था और अप्रैल से पेट्रोल पंपों पर यही पेट्रोल ग्रेड उपलब्ध है.
E20 से माइलेज क्यों घटता है?
नागेश्वरन और पूजारी के मुताबिक एथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में करीब दोतिहाई ऊर्जा होती है. इसलिए पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ने पर माइलेज में कुछ कमी आती है. उनके अनुमान के मुताबिक E20 से ऊर्जा के मामले में करीब 67% का अंतर पड़ सकता है. हालांकि, इंटरनेट पर माइलेज में 30% तक गिरावट के दावे किए जा रहे हैं, जिन्हें उन्होंने गलत बताया. उन्होंने यह भी कहा कि एथेनॉल मिलाने से कार्बन मोनोऑक्साइड और बिना जले हाइड्रोकार्बन जैसे कुछ प्रदूषक उत्सर्जन कम होते हैं.
पुरानी बाइक और स्कूटर के लिए क्यों है समस्या?
सबसे बड़ी चिंता उन पुराने दोपहिया वाहनों को लेकर है, जो BS4 से पहले बने हैं और कार्बोरेटर का इस्तेमाल करते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक भारत में ऐसे करीब 7.5 से 8 करोड़ पुराने दोपहिया वाहन हो सकते हैं. कार्बोरेटर पेट्रोल में मौजूद अतिरिक्त ऑक्सीजन के हिसाब से ईंधन की मात्रा को खुद एडजस्ट नहीं कर सकता. ऐसे में E20 पर इंजन में हवा के मुकाबले कम ईंधन पहुंच सकता है और इंजन ज्यादा गर्म चल सकता है. पुरानी गाड़ियों में लगे रबर सील भी एक समस्या हो सकते हैं. अगर ये सील एथेनॉल के लिए डिजाइन नहीं किए गए हैं, तो लंबे समय तक ईंधन के संपर्क में रहने से खराब हो सकते हैं.
E10 क्यों हो सकता है समाधान?
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन रबर सील को बदलना बहुत महंगा काम नहीं है, लेकिन करोड़ों पुराने वाहनों में ऐसा करने में काफी समय लगेगा. इसलिए जब तक पुरानी गाड़ियों को E20 के अनुकूल बनाने का काम पूरा हो, तब तक पेट्रोल पंपों पर E10 का विकल्प रखा जा सकता है. नागेश्वरन और पूजारी का मानना है कि E10 और E20 दोनों विकल्प उपलब्ध कराने से पुरानी गाड़ियों के मालिकों की चिंता कम होगी. साथ ही इससे कुल एथेनॉल इस्तेमाल को बढ़ाने के बजाय कम भी किया जा सकता है.
E20 से आगे बढ़ना कितना सही?
E27 या E30 जैसे ज्यादा एथेनॉल मिश्रण को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं. भारत हर साल करीब ₹1112 लाख करोड़ का कच्चा तेल आयात करता है और E20 से इसमें करीब 34% तक कमी आने का अनुमान है. लेकिन ज्यादा एथेनॉल के लिए मक्का और दूसरे अनाज की जरूरत बढ़ सकती है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। मक्का भारत में एथेनॉल उत्पादन का करीब आधा हिस्सा देता है. इसके लिए जमीन और पानी की जरूरत होती है, जो खेती की दूसरी जरूरतों से भी जुड़ी है. दोनों ने कहा कि मक्का की बढ़ती मांग से सोयाबीन, मूंगफली और सरसों जैसी तिलहन फसलों के लिए भी दबाव बन सकता है. इसलिए एथेनॉल नीति को केवल पेट्रोल की जरूरत के नजरिए से नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, पानी और किसानों की आय को ध्यान में रखकर देखना चाहिए.
सरकार को क्या करना चाहिए?
नागेश्वरन और पूजारी ने सुझाव दिया है कि सरकार पुरानी गाड़ियों के लिए कम एथेनॉल वाला पेट्रोल वापस लाए और फिलहाल E20 पर बनी रहे. साथ ही मक्का के लिए कीमत और पानी से जुड़े नियमों की समीक्षा की जाए और खाद्य तेलों की इंपोर्ट ड्यूटी पर भी दोबारा विचार किया जाए. उनके मुताबिक असली बहस सिर्फ इस बात पर नहीं है कि E20 से इंजन को नुकसान होगा या नहीं. बड़ी बहस यह है कि एथेनॉल के लिए भारत अपनी जमीन, पानी और फसलों का इस्तेमाल किस तरह करना चाहता है.



