विपक्ष के INDIA गठबंधन में हालिया टूट और बड़े पैमाने पर हुए दलबदल के बाद, मोदी सरकार के लिए संसद का नया गणित काफी अनुकूल हो गया है. हालांकि पूर्ण बहुमत अभी भी दूर है, लेकिन सरकार के लिए विधायी कामकाज और महत्वपूर्ण बिल पास कराना पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है. हाल के दिनों में विपक्षी खेमे में बढ़ी राजनीतिक हलचल ने संसद के शक्ति संतुलन को प्रभावित किया है.

INDIA गठबंधन के कई सांसदों के अलगअलग राजनीतिक दलों की ओर रुख करने के बाद सत्ता पक्ष की स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत दिखाई देने लगी है. आम आदमी पार्टी , तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना से जुड़े कई सांसदों के पाला बदलने की खबरों ने विपक्ष की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन घटनाक्रमों का सीधा असर संसद के भीतर बनने वाले समीकरणों पर पड़ सकता है. अब सरकार को कई विधेयकों और नीतिगत प्रस्तावों पर समर्थन जुटाने के लिए पहले जितनी मशक्कत नहीं करनी पड़ सकती. खास तौर पर उन मुद्दों पर, जहां पहले संख्या बल को लेकर अनिश्चितता बनी रहती थी, वहां सरकार की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत मानी जा रही है.

क्या है पूरा मामला? जानिए यहां
इस पूरे सियासी घटनाक्रम की शुरुआत 16 अप्रैल 2026 को हुई. नरेंद्र मोदी की सरकार को अपने 12 साल के कार्यकाल में पहली बार किसी संवैधानिक संशोधन विधेयक बिल पेश किया था और इस बिल पर मोदी सरकार को विपक्ष के सामने हार का सामना करना पड़ा था. इस प्रस्तावित संशोधन के जरिए लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या बढ़ाकर लगभग 850 करने का सुझाव दिया गया. साथ ही, नए परिसीमन की प्रक्रिया को 2011 की जनगणना के आंकड़ों से जोड़ने की बात कही गई है.विधेयक में एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह भी शामिल है, जिसके तहत भविष्य में होने वाले परिसीमन के लिए किस जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाएगा, इसका निर्णय करने का अधिकार संसद को देने का प्रस्ताव रखा गया है.

परिसीमन बिल पर सरकार को लगा था 54 वोट का झटका
संसद में पेश किया गया परिसीमन विधेयक अपेक्षित समर्थन हासिल नहीं कर सका और जरूरी दोतिहाई बहुमत के अभाव में पारित होने से चूक गया. मतदान के दौरान विधेयक के पक्ष में 298 सांसदों ने वोट दिया, जबकि 230 सांसद इसके विरोध में खड़े नजर आए. इस तरह सरकार बहुमत के तय आंकड़े से 54 वोट पीछे रह गई. इस परिणाम को केंद्र सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण सियासी झटका माना जा सकता है. सरकार जिस आत्मविश्वास के साथ विधेयक को आगे बढ़ा रही थी, उसके मुकाबले मतदान का नतीजे अलग नजर आए थे. विधेयक के असफल होने के बाद राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है.

दलबदल की सियासत ने बदल दिए समीकरण
विभिन्न दलों के भीतर असंतोष और संभावित खींचतान की खबरें सामने आने लगी हैं. पहले आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस से जुड़ी अटकलों ने सुर्खियां बटोरीं, वहीं शिवसेना के 6 सांसद शिंदे गुट में शामिल हो गए. आप के राघव चड्ढा के साथ 7 बागी सांसद अब राज्यसभा में एनडीए को समर्थन देंगे, तो वहीं पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने बगावत कर दी और इन सभी सांसदों ने ‘नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ में विलय कर लिया है.इन बागी सांसदों ने केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को अपना समर्थन देने का ऐलान किया है इसी बीच सियासी गलियारों में एक बार फिर ‘ऑपरेशन लोटस’ और ‘ऑपरेशन टाइगर’ जैसे शब्द चर्चा का विषय बन गए.

‘जादुई आंकड़े’ से कितनी दूर बीजेपी?
लोकसभा में किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता. इसके लिए सदन में मौजूद और मतदान करने वाले सदस्यों के अलावा कुल सदस्य संख्या के आधार पर भी लगभग 360 वोटों का समर्थन जुटाना होता है. 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पास 293 सांसदों का समर्थन था. हालांकि, पिछले कुछ समय में राजनीतिक परिस्थितियों में हुए बदलावों ने इस संख्या को प्रभावित किया है. अब अगर TMC के करीब 20 बागी सांसद सरकार के पक्ष में मतदान करते हैं, तो NDA का प्रभावी समर्थन आंकड़ा बढ़कर 313 तक पहुंच सकता है. इसके अलावा, अगर शिवसेना से जुड़े बागी सांसद भी सरकार का साथ देते हैं, तो यह संख्या लगभग 319 तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है.इसके बावजूद, आवश्यक माने जा रहे 360 वोटों के आंकड़े तक पहुंचने के लिए सरकार को अभी भी अतिरिक्त समर्थन की जरूरत होगी. ऐसे में क्षेत्रीय दलों और अन्य गैरएनडीए सांसदों की भूमिका बेहद अहम हो सकती है.

SP के 2530 सांसदों के टूटने का दावा, तो UPA से DMK की नाराजगी
इस बीच उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने बड़ा दावा किया है. उन्होंने कहा है कि समाजवादी पार्टी के 25 से 30 लोकसभा सांसद पार्टी से अलग होने की तैयारी में हैं. इसके मुताबिक, सपा के लगभग 30 सांसद उनके संपर्क में हैं. ऐसे में अगर सपा के ये बागी सांसद NDA का समर्थन करते हैं, तो संसद में NDA की संख्या और मजबूत हो सकती है. इसी बीच तमिलनाडु की सियास में भी कई तरह की अटकलें सामने आ रही हैं. सियासी हलकों में यह चर्चा है कि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और कांग्रेस के बीच कुछ मुद्दों को लेकर मतभेद उभरे हैं. ऐसे में अगर भविष्य में किसी महत्वपूर्ण संसदीय मतदान के दौरान डीएमके के 22 सांसद अनुपस्थित रहते हैं, तो इससे सत्तारूढ़ गठबंधन को अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है.