Himachal Politics: हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री शांता कुमार ने प्रदेश सरकार की आर्थिक नीतियों और फिजूलखर्ची पर गहरा असंतोष व्यक्त किया है। उन्होंने राज्य के वर्तमान वित्तीय संकट के बीच नए मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्माण पर हुए भारी खर्च को लेकर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू पर सीधा निशाना साधा है।

वरिष्ठ नेता ने कहा कि जिस कार्यालय भवन से डॉ. वाई. एस. परमार के समय से लेकर अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों ने प्रदेश का कामकाज सुचारू रूप से चलाया, वह वर्तमान मुख्यमंत्री को पर्याप्त नहीं लगा। शांता कुमार ने कहा कि जिस भवन की मरम्मत और सजावट पर हर दूसरे-तीसरे साल लाखों रुपये खर्च किए जाते रहे हैं, उसके स्थान पर लगभग 40 से 50 करोड़ रुपये की लागत से नया कार्यालय बना दिया गया। उन्होंने इस निर्णय को भयंकर फिजूलखर्ची की संज्ञा दी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अनावश्यक खर्च ऐसे समय में किया गया है जब हिमाचल प्रदेश अपने इतिहास के सबसे भीषण कर्ज संकट के दौर से गुजर रहा है। स्थिति यह बन चुकी है कि राज्य को पिछले लिए गए कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए भी नया कर्ज लेने पर मजबूर होना पड़ रहा है। ऐसी विकट आर्थिक परिस्थिति में करोड़ों रुपये स्वयं के कार्यालय पर खर्च करना मुख्यमंत्री का प्रदेश-विरोधी कदम है, जिसका समर्थन कोई नहीं कर सकता।
वरिष्ठ भाजपा नेता के अनुसार, सरकार के इसी प्रकार के निर्णयों और नीतियों के कारण हिमाचल प्रदेश की जनता वर्तमान शासन के विरुद्ध हो रही है। हाल ही में संपन्न हुए पंचायती राज चुनावों के परिणामों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी को इनमें भारी पराजय का सामना करना पड़ा है। प्रदेश की कुल 11 जिला परिषदों में से 10 जिला परिषदों में भारतीय जनता पार्टी की जीत हुई है। यह जनादेश स्पष्ट संदेश देता है कि राज्य की जनता परिवर्तन चाहती है और कांग्रेस सरकार की विदाई तय है।
शांता कुमार ने कहा कि आज की गंभीर आर्थिक परिस्थिति में मुख्यमंत्री को स्वयं बचत का एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए था। उन्होंने कहा कि सरकार की कार्यप्रणाली समुद्र की भांति होती है, यदि एक-एक बूंद बचाई जाए तो समुद्र भर जाता है और यदि एक-एक बूंद लुटाई जाए तो विशाल समुद्र भी खाली हो जाता है। इसलिए प्रदेश सरकार को प्रशासनिक स्तर पर एक-एक पैसे की बचत करने की नीति अपनानी चाहिए।
अपने प्रशासनिक अनुभवों को साझा करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने बताया कि वर्ष 1977 में जब उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री का पदभार संभाला था, तब उन्होंने बचत की शुरुआत स्वयं से की थी। उन्होंने अपने कार्यालय का एक टेलीफोन कटवाया, निचले स्तर तक के प्रशासनिक तंत्र में होने वाले अनावश्यक खर्चों पर रोक लगाई और मुख्यमंत्री के काफिले में चलने वाली गाड़ियों की संख्या को सीमित किया।
इन कठोर बचत उपायों के फलस्वरूप थोड़े ही समय में लगभग 50 करोड़ रुपये की बचत की गई थी। इस बचत राशि का उपयोग प्रदेश में पीने के पानी की व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए किया गया था। उन्होंने याद दिलाया कि उस दौर में सरकार पर कोई उधार या वित्तीय देनदारी नहीं थी।
शांता कुमार ने आरोप लगाया कि आज राज्य के प्रत्येक प्रशासनिक विभाग में बड़े पैमाने पर फिजूलखर्ची हो रही है। एक तरफ जहां अनावश्यक कार्यों पर करोड़ों रुपये व्यय किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्रीय विश्वविद्यालय के धर्मशाला कैंपस निर्माण के लिए प्रदेश सरकार अपने हिस्से के 30 करोड़ रुपये जारी नहीं कर रही है। राज्य सरकार की इस वित्तीय लापरवाही के कारण केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत 300 करोड़ रुपये की राशि भी उपयोग में नहीं आ पा रही है।
उन्होंने इसे सरकार की बड़ी प्रशासनिक नालायकी करार देते हुए कहा कि भारत सरकार ने 12 वर्ष पूर्व हिमाचल प्रदेश को केंद्रीय विश्वविद्यालय स्वीकृत किया था, लेकिन इतने लंबे समय की समयावधि बीत जाने के बाद भी इसका मुख्य कैंपस धर्मशाला में निर्मित नहीं हो सका है। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। अंत में शांता कुमार ने प्रदेश की जनता से आह्वान किया कि वे वर्तमान परिस्थितियों को समझें और आगामी चुनावों में इस प्रकार की कार्यप्रणाली वाली सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट हों।
