आज की जेनजी पीढ़ी के आक्रोश और प्राथमिकताओं की तुलना उन नौजवानों से करना, जिन्होंने पराधीन भारत में विदेशी शासन की बेड़ियां तोड़ने के लिए हंसतेहंसते फांसी का फंदा चूम लिया, न्यायसंगत नहीं होगा. वे क्रांतिकारी विदेशी सत्ता से आजादी के लिए लड़ रहे थे. लेकिन उनके प्रेरक जीवन का एक दूसरा पहलू भी था. वे आजाद भारत के लिए एक बेहतर समाज का सपना संजोए हुए थे. उनकी महान विरासत की दावेदारी करते समय सोचना चाहिए कि क्या उनके सपनों को सच करने में आज की युवा पीढ़ी की कुछ भूमिका हो सकती है? सरकार की जिम्मेदारियां हैं. उसे जगाते रहना है. अधिकारों के लिए उससे लड़ना भी है. लेकिन अपने भविष्य को सोचतेसंवारते समाज के लिए भी क्या कुछ सकारात्मक जोड़ सकते हैं? खुदीराम बोस की शहादत को याद करते समय जरूर जानना चाहिए कि गुलामी के खिलाफ लड़ने के साथ ही छोटी सी जिंदगी में उन्होंने सेवा सहयोग और समर्पण के जरिए एक नेक और सच्चे इंसान की अपनी प्रेरक पहचान भी पीछे छोड़ी,

1857 की क्रांति की विफलता के बाद ब्रिटिश सरकार की देश पर फौलादी पकड़ और मजबूत हो गई थी. राजनीतिक गुलामी के साथ ही जनता को मानसिक तौर पर अपने प्रभुत्व में रखने के लिए सरकार हर हथकंडे आजमा रही थी. लेकिन बीसवीं सदी की शुरुआत के साथ इन बेड़ियों को तोड़ने की खासतौर पर युवा पीढ़ी में अकुलाहट बढ़ रही थी.

प्रार्थना नहीं अब रण होगा

इस पीढ़ी की सोच थी कि प्रार्थनाओंप्रतिवेदनों से अंग्रेजों से छुटकारा मिलना मुमकिन नहीं होगा. उन्हें सबक सिखाना होगा. 30 अप्रैल 1908 का मुजफ्फरपुर बम कांड आजादी के मतवाले दो नौजवानों खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी का ऐसा ही साहसिक प्रयास था, जिसे करते समय उन्हें अपनी जान न्योछावर करने की फिक्र नहीं थी.

उन्होंने मुजफ्फरपुर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश किंग्सफोर्ड को बम से उड़ाने की असफल कोशिश की थी. कलकत्ता में चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट के पद पर रहते हुए किंग्सफोर्ड की छवि क्रांतिकारियों की नजर में एक क्रूर अधिकारी की बन चुकी थी. संभावित हमले की खुफिया सूचनाओं के बाद उसका तबादला मुजफ्फरपुर कर दिया गया, लेकिन क्रांतिकारी उससे बदला लेने के लिए वहां भी पहुंच गए.

खुदीराम बोस.

अंधविश्वास पर चोट, करुणा से लबरेज

सिर्फ 19 साल का नौजवान खुदीराम बोस जो विदेशी दासता के विरोध में बम फेंकने में नहीं हिचका, उसकी शख्सियत का करुणा से लबरेज और जरूरतमंदों के लिए समर्पण का पहलू भीतर तक तरल करता है. 3 दिसम्बर 1889 को मिदनापुर के समीप हबीबपुर गांव में जन्मे खुदीराम के पिता त्रिलोक्यनाथ बसु नाराजोल स्टेट में तहसीलदार थे. पुत्र जन्म के बाद अकाल मृत्यु के अंधविश्वास से बचाने के लिए मां लक्ष्मीप्रिया देवी ने प्रतीकात्मक रूप से उसे किसी को बेच दिया.

उस दौर और इलाके के चलन के अनुसार बहन अपरूपा ने तीन मुट्ठी खुदी चावल के छोटेछोटे टुकड़े देकर अपने भाई को वापस लिया. इसी कारण उसका नाम पड़ा, खुदीराम. महज छह साल की उम्र पूरी होने तक खुदीराम के सिर से मातापिता दोनों का साया उठ चुका था. आगे के छोटे से जीवन में बहन अपरूपा ने मां और बहन दोनों की जिम्मेदारी निभाई.

अपनी ससुराल हाटगछिया ले जाकर उसे तमलुक के हैमिल्टन स्कूल में दाखिल कराया. इन्हीं दिनों वहां हैजा फैल गया. लोग रोगियों के पास जाने से भी डरते थे. इसके उलट खुदीराम उनकी सेवा में जुटे रहते थे. रोज मौतें होती थीं. रात में श्मशान के पास एक पेड़ पर प्रेत का वास होने के अंधविश्वास के कारण लोग वहां जाने से कतराते थे. खुदीराम देर रात वहां पहुंचे और उस पेड़ की टहनी तोड़कर वापस लौट आए. असलियत में वे कम उम्र में ही डर की चुनौती से पार पा चुके थे.

संघर्षसेवा का अनूठा मेल

तब न आज जैसी सूचना क्रांति थी और न हर हाथ में मोबाइल. लेकिन 1905 में आठवीं कक्षा में पढ़ने वाला सोलह साल का किशोर खुदीराम बंगभंग आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ चुका था. अब ध्यान पढ़ाई में नहीं लग रहा था. मातृभूमि के लिए कुछ कर गुजरने की बेचैनी बढ़ रही थी. फिर जगन्नाथ मंदिर में अन्य लोगों के साथ यह शपथ ली कि बंगभंग रद्द होने तक विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल नहीं करेंगे. शपथ लेकर भूल नहीं गये. स्वदेशी वस्तुओं के प्रति उनका आग्रह बढ़ता गया. विदेशी वस्तुओं का व्यापार करने वाले दुकानदारों पर दबाव डालना, बहिष्कार कराना और चेतावनी देना उनके आंदोलन का हिस्सा बन गया.

एक दुकानदार के विदेशी माल से भरे गोदाम को आग लगाने की घटना उनके उग्र तेवर को दिखाती है. लेकिन खुदीराम को इस उग्रता तक समेटना मुनासिब नहीं होगा. उनके भीतर करुणा का गहरा सागर था. कासवंती नदी की बाढ़ में गोबर्धनपुर और आसपास के गांवों की तबाही के समय वे साथियों के साथ राहत कार्य में जुट गए. बिना थकेरुके वे पानी में फंसे लोगों को बचाने और सुरक्षित ठिकानों तक पहुंचाने में जुटे रहे. एक ठिठुरते भिखारी को उन्होंने अपनी पिता की निशानी पश्मीने की कीमती शाल दे दी. बहन ने कहा कि भिखारी उसे बेच देगा. खुदीराम ने कहा तो क्या हुआ, वह पैसे भी उसके किसी काम आ जाएंगे.

खुदीराम बोस ब्रिटिश सत्ता के लिए चुनौती बन गए थे.

वह किशोर बना सरकार के लिए चुनौती

बंगभंग आंदोलन के दौरान खुदीराम शिक्षक सत्येन बोस के संपर्क में आए, जो मिदनापुर के युवकों को क्रांतिकारी गतिविधियों से जोड़ रहे थे. 1906 के आरंभ में खुदीराम अन्य साथियों अविनाश चंद चक्रवर्ती, कार्तिक चंद्र दत्त, भुजंगधर घोष, चंद्रकांत चक्रवर्ती और इंद्रनाथ नंदी आदि के साथ शारीरिक प्रशिक्षण, धार्मिक ग्रंथों और क्रांतिकारी साहित्य के अध्ययन में जुट चुके थे. वंदेमातरम्, युगांतर और संध्या जैसे पत्रों के लेख इन युवाओं में विदेशी दासता के विरुद्ध संघर्ष की चेतना भर रहे थे. इसी साल मिदनापुर के पुराने जेल प्रांगण में कृषि प्रदर्शनी के दौरान जिलाधिकारी किसानों को प्रमाणपत्र और उसी भीड़ में खुदीराम उत्तेजक सामग्री से भरे वंदेमातरम् के अंक बांट रहे थे. पुलिस ने उन्हें पकड़ना चाहा तो एक हवलदार की नाक पर घूंसा मारकर वे भाग निकले. 1907 में क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए डाक का बैग लूटने की घटना में भी उनका नाम आया. पुलिस की नजर में वे अब एक साधारण किशोर नहीं, ब्रिटिश सत्ता के लिए चुनौती बन चुके थे.

निशाना चूका लेकिन हुकूमत को अचूक संदेश

जल्दी ही वे मिदनापुर से कलकत्ता पहुंचे और अरविंद घोष, बारीन्द्र कुमार घोष, कनाईलाल दत्त, उपेन्द्रनाथ बंदोपाध्याय और उल्हासकर दत्त जैसे क्रांतिकारियों के संपर्क में आए. क्रांतिकारियों ने मुजफ्फरपुर स्थानांतरित किए जा चुके जज किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने का निर्णय किया. इस एक्शन के लिए प्रफुल्ल चाकी के साथ खुदीराम आगे आए. 1011 अप्रैल 1908 के आसपास दोनों मुजफ्फरपुर पहुंचे. एक धर्मशाला को ठिकाना बनाया और कई दिनों तक किंग्सफोर्ड की गतिविधियों पर नजर रखी. 30 अप्रैल की रात करीब साढ़े आठ बजे किंग्सफोर्ड और अन्य लोग एक सी नजर आने वाली दो बग्घियों पर क्लब से निकले . खुदीराम ने एक बग्घी पर बम फेंका.

बम उस बग्घी पर गिरा जिसमें प्रिंगल कैनेडी की पत्नी और पुत्री सवार थीं. दोनों की मृत्यु हो गई.क्रांतिकारी अभियान अपने लक्ष्य में विफल रहा था और दो निर्दोष महिलाओं की जान चली गई थी. लेकिन ब्रिटिश शासन के लिए संदेश स्पष्ट था—1857 के बाद दबा हुआ विद्रोही मन अब फिर हथियार लेकर सामने आ चुका था.

प्रफ़ुल्ल की शहादत, गिरफ्त में खुदीराम बेखौफ

प्रफुल्ल और खुदीराम हमले के बाद अलगअलग दिशाओं में भागे. प्रफुल्ल चाकी पुलिस की गिरफ्त में आने की स्थिति में पहुंचे तो उन्होंने आत्मसमर्पण के बजाय स्वयं को गोली मार ली. खुदीराम 1 मई को वैनी स्टेशन के निकट पानी पीते समय पकड़े गए. पुलिस की गाड़ी में बैठते समय भी बेख़ौफ़ खुदीराम के होंठों पर वंदेमातरम् का उद्घोष था. 25 मई 1908 को मुकदमा शुरू हुआ. दुबलेपतले खुदीराम अदालत में नतीजे से बेफिक्र निर्भीक खड़े थे. उन्हें इस बात का अफसोस था कि बम से निर्दोष महिलाएं मारी गईं, लेकिन देश की स्वतंत्रता का संकल्प उसके भीतर अडिग था.

13 जून को जूरी ने उन्हें हत्या का दोषी ठहराया और उसी दिन फांसी की सजा सुनाई गई. कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी सजा को बरकरार रखा. महज अठारह साल के खुदीराम बोस को 11 अगस्त 1908 को फांसी दे दी गई. अंग्रेजी अखबार इम्पायर ने लिखा कि फांसी के फंदे की ओर बढ़ते समय खुदीराम तनकर खड़े थे और मुस्कुरा रहे थे.

हर घर में पैदा हो खुदीराम

श्मशान घाट पर उनकी अस्थियों की राख पाने के लिए लोगों में होड़ लग गई. माताओं ने उनकी राख ताबीज में भरकर बच्चों के गले में बांधी. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। उनकी शहादत लोगों के दिलदिमाग में टंक गई. विप्लव के प्रतीक बनकर उभरे खुदीराम बोस की शहादत का संदेश क्षणिक नही था. महान बांग्ला कवि नजरुल इस्लाम ने 18 वर्षों बाद उन्हें याद करते हुए लिखा “खुदीराम वापस लौटने के लिए गया था, देश के हर घर में पैदा होने के लिए. खुदीराम बोस और देश के लिए न्योछावर होने वाले उन जैसे अमर शहीद आने वाली नस्लों को संदेश दे गए कि आक्रोश का कोई उद्देश्य हो. विरोध के साथ विचार भी हो. व्यवस्था बदलने की इच्छा हो तो स्वयं को बदलने का संकल्प भी .

शब्दों में आग हो तो व्यवहार में करुणा भी हो. और देश से शिकायत हो तो देश के लिए अपना योगदान देने की तैयारी भी हो.