केंद्र सरकार इसी महीने संसद का विशेष सत्र बुला सकती है. इसमें लोकसभा सीटें बढ़ाने के लिए संविधान बिल, परिसीमन बिल और केंद्र शासित प्रदेश कानून बिल पास कराया जाएगा. 6 महीने पहले भी सरकार ने बिल पास कराने का प्रयास किया था लेकिन लोकसभा में दो तिहाई बहुमत जुटा नहीं पाई थी. कहा जा रहा है कि सरकार ने अब जरूरी बहुमत जुटा लिया है.

लोकसभा में अभी 543 सांसद हैं. अगर सरकार के 50% बढ़ोतरी वाले मॉडल के हिसाब से सीटें बढ़ती हैं, तो लोकसभा में करीब 816 सांसद हो सकते हैं. संसद में 850 सीटों की अधिकतम सीमा तय करने का प्रस्ताव है. इस मॉडल में उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120 और बिहार की 40 से बढ़कर 60 हो सकती हैं. महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और कर्नाटक में भी सीटें बढ़ेंगी. लेकिन सीटें बढ़ने का मतलब यह नहीं कि हर राज्य में एक सांसद के हिस्से में आने वाली आबादी बराबर हो जाएगी. आबादी बढ़ने की रफ्तार राज्यों में अलगअलग रही है. यही वजह है कि नए परिसीमन की चर्चा में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के राज्यों के प्रतिनिधित्व का सवाल अहम हो गया है.

8 बड़े राज्यों में कितनी आबादी पर एक सांसद?

नीचे का अनुमान 2026 की सरकारी जनसंख्या परियोजनाओं और हर राज्य की मौजूदा लोकसभा सीटों में 50% बढ़ोतरी के मॉडल पर आधारित है. ये अंतिम सीटें नहीं हैं. आबादी के आंकड़े 2026 के अनुमान हैं, जनगणना के अंतिम आंकड़े नहीं.

बिहार और यूपी में एक सांसद पर ज्यादा आबादी क्यों?

सरकारी अनुमानों के मुताबिक, 2026 में बिहार की आबादी करीब 13.23 करोड़ और उत्तर प्रदेश की करीब 24.29 करोड़ हो सकती है. अगर बिहार में 60 और यूपी में 120 सीटें हों, तो एक सांसद के हिस्से में बिहार में करीब 22 लाख और 20 लाख लोग आएंगे. महाराष्ट्र में 72 सीटों के हिसाब से करीब 18 लाख और पश्चिम बंगाल में 63 सीटों पर करीब 16 लाख लोग प्रति सांसद होंगे. मध्य प्रदेश और राजस्थान में यह संख्या फिर 20 लाख से ज्यादा हो सकती है. इससे पता चलता है कि सभी राज्यों में सीटें 50% बढ़ाने पर भी हर सांसद के हिस्से में आने वाली आबादी बराबर नहीं होगी.

तमिलनाडु इसका दूसरा उदाहरण है. 2011 की जनगणना में राज्य की आबादी करीब 7.21 करोड़ थी. 59 सीटों से भाग देने पर प्रति सीट करीब 12.2 लाख लोग आते हैं. वहीं 2026 के अनुमान के आधार पर यह संख्या करीब 13.1 लाख होती है. कर्नाटक में 42 सीटों पर करीब 16.4 लाख लोग प्रति सांसद होंगे.

परिसीमन पर विवाद क्यों है?

परिसीमन का मतलब लोकसभा सीटों की संख्या और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव करना है. संविधान के मौजूदा प्रावधानों के तहत सीटों का राज्यों के बीच बंटवारा 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर रखा गया है, जबकि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं 2001 की जनगणना के आधार पर तय की गई थीं. संविधान अधिकतम दस लाख की आबादी पर एक सांसद की बात कहता है. साथ ही कहता है कि सांसदों की संख्या 550 से ज्यादा नहीं हो सकती.

संविधान में मूल प्रावधान यही है कि जनसंख्या के आधार पर सीटें तय होंगी. यानी जहां आबादी ज्यादा, वहां सीटें भी ज्यादा. 1970 के दशक में सरकार ने फैमिली प्लानिंग पर भी जोर दिया. इसका नतीजा ये हुआ कि दक्षिण के राज्यों ने तो इस पर काम किया, लेकिन उत्तर भारत के राज्यों में इस पर ज्यादा काम नहीं हुआ. नतीजतन दक्षिण के राज्यों में आबादी कम और उत्तरी राज्यों में आबादी बढ़ने लगी. अब चिंता ये हुई कि जिन्होंने फैमिली प्लानिंग कर आबादी काबू में की, उनके यहां सीटें कम हो जाएंगी. यानी संसद में उन राज्यों का प्रतिनिधित्व भी कम हो जाएगा. और जिन राज्यों में आबादी बढ़ी, वहां सीटें बढ़ेंगी और संसद में उनका प्रतिनिधित्व भी बढ़ेगा. इस पर विवाद हुआ और 1977 में सरकार ने संविधान में संशोधन कर तय कर दिया कि 2001 तक 1971 की जनगणना के आधार पर ही संसद में सीटें होंगी. लेकिन 2002 में अटल सरकार ने इसे बढ़ाकर 2026 तक कर दिया.

किसी राज्य में लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या कितनी होगी, इसका काम परिसीमन आयोग करता है. 1952 में परिसीमन आयोग का गठन किया गया था. संविधान के अनुच्छेद 82 में आयोग का काम भी तय किया गया है. इसके मुताबिक 10 साल में जब पहली बार जनगणना होगी, तो उसके बाद परिसीमन किया जाएगा. 2011 की जनगणना के आधार पर आबादी के अनुपात में सीटें बांटने का अलग अनुमान है. आबादी के अनुपात के मुताबिक, अगर कुल सीटें नहीं बढ़तीं तो यूपी की सीटें 80 से 89 और बिहार की 40 से 46 हो सकती हैं.

गृह मंत्री ने 50% फॉर्मूले की बात कही

अप्रैल 2026 में पेश किए गए विधेयकों में लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 850 करने और परिसीमन की प्रक्रिया बदलने का प्रस्ताव था. गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि 50% बढ़ोतरी के मॉडल में दक्षिण के पांच राज्यों की सीटें 129 से बढ़कर 195 होंगी और कुल सीटों में उनका हिस्सा करीब 24% बना रहेगा. तमिलनाडु की सीटें 39 से 59 और कर्नाटक की 28 से 42 होने का अनुमान दिया गया था.

अप्रैल 2026 में जब बिल पेश किया गया था, तब सरकार ने बिल में लिखित तौर पर 50% वाले फॉर्मूला का जिक्र नहीं किया था. इस पर जब बहस हुई, तो गृह मंत्री अमित शाह ने बयान देकर कहा कि हम इसे लिखित भी दे सकते हैं. हालांकि, उस वक्त कांग्रेस का कहना था कि आप इसमें राज्यों के अधिकार को भी शामिल करिए. इसको लेकर पेच फंस गया और आखिर में बिल को विपक्ष का समर्थन नहीं मिला. राज्यों के अधिकार को शामिल करने का मुद्दा सिर्फ कांग्रेस का था. सपा और डीएमके की मांग सिर्फ 50 प्रतिशत लिखित देने की थी. ऐसे में रिजीजू के दावे से लग रहा है कि सरकार नए बिल में इसे शामिल कर सकती है.

फिलहाल 16 लाख लोगों पर एक सांसद

140 करोड़ की आबादी के हिसाब से 850 सांसदों की संख्या देखें तो परिसीमन के बाद करीब 16.47 लाख लोगों पर एक सांसद होगा. फिलहाल 25.78 लाख लोगों पर एक सांसद है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। अमेरिका में प्रतिनिधि सभा के एक सदस्य पर करीब 7.8 लाख, ब्रिटेन में एक सांसद पर 1.07 लाख और फ्रांस में एक सांसद पर करीब 1.15 लाख लोग हैं. 6 महीने पहले 131वें संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में जरूरी समर्थन नहीं मिला. इसलिए 816 सीटों को अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता. अगर भविष्य में परिसीमन होता है, तो अंतिम सीटें लागू कानून, जनगणना के आंकड़ों और परिसीमन आयोग की प्रक्रिया से तय होंगी.