
नई दिल्ली. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये को लेकर कुछ कड़े फैसले लिए हैं, जिस कारण रुपये में गिरावट सिर्फ थमी ही नहीं, बल्कि बड़ी उछाल आई है. RBI द्वारा करेंसी में अस्थिरता को कम करने के लिए अतिरिक्त उपाय पेश करने के लिए एक दिन बाद यह तेजी आई है.
2 अप्रैल को डॉलर की तुलना में रुपये में 12 सालों से ज्यादा समय में सबसे अधिक तेजी देखी गई है, जबकि बैंक अपने ऑफशोर लॉन्ग डॉलर पोजीशन को कम करना जारी रखे हुए थे. करेंसी मार्केट खुलने के बाद करेंसी ट्रेड फिर से शुरू होने पर रुपया डॉलर के मुकाबले 1.8 प्रतिशत तक बढ़कर 93.17 पर पहुंच गया, जो सितंबर 2013 के बाद सबसे ज्यादा है.
क्यों आई इतनी बड़ी तेजी?
1 अप्रैल को, RBI ने फॉरेक्स मार्केट के नियम को कड़ा किया है. आरबीआई ने बैंकों को रेजिडेंस और नॉन-रेजिडेंस कस्टमर्स को रुपये के नॉन-डिलीवर फॉरवर्ड (एक तरह का फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट) जारी करने से रोक दिया. नॉन-डिलीवर फॉरवर्ड एक तरह का कॉन्ट्रैक्ट है, जो फ्यूचर में रुपया का स्तर क्या होगा? उस आधार पर खरीदारी करने की अनुमति देता है. एक तरह से आप इसे करेंसी में डेरिवेटिव ट्रेडिंग भी कह सकते हैं. बस इसी कॉन्ट्रैक्ट को जारी करने से आरबीआई ने रोक लगा दी है. आरबीआई ने यह भी कहा कि कंपनियां रद्द किए गए विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट को दोबारा बुक नहीं कर सकतीं.
रुपये में गिरावट के कई कारण
सबसे बड़ा कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली रही है. मार्च महीने में ही विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 1.11 लाख करोड़ रुपये की सेलिंग कर डाली थी. इसके साथ ही जंग के शुरू होने से दुनिया भर में महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ गया है. साथ ही होमुर्ज के रास्ते के बंद होने की वजह से कच्चे तेल के दाम में लगातार तेजी रही है, जिस कारण रुपये में लगातार गिरावट रही है.
वहीं रुपये पर बैंकों के शुद्ध खुले पदों के जोखिम को सीमित करने के लिए आरबीआई द्वारा कदम उठाए जाने के बावजूद, 30 मार्च को करेंसी में 95 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर लिया. हालांकि, ट्रंप के ईरान वॉर को लेकर दिए गए संबोधन के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है.
कच्चे तेल के भाव में उछाल
ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी सेना ने ईरान जंग को लेकर अपने लक्ष्यों को लगभग हासिल कर ही लिया है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। 2 से 3 हफ्तों के दौरान हम एक बड़ा कदम उठाएंगे. हालांकि उन्होंने जंग को समाप्त करने की कोई समयसीमा नहीं बताई, जिस कारण कच्चे तेल के भाव में तगड़ी उछाल देखने को मिली और यह 106 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चला गया.





