भारत जैसे बड़े लोकतान्त्रिक देश में संसद का घेराव या संसद तक मार्च आम है. अलगअलग समय पर देश के अनेक हिस्सों से इस तरह के मार्च की खबरें आती रहती हैं. कुछ मार्च चलने के साथ ही रोक दिए जाते हैं तो कुछ दिल्ली तो पहुंच पाते हैं लेकिन संसद तक नहीं पहुंच पाते. लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरत तस्वीर यह है कि बिना संसद पहुंचे भी आंदोलनकारियों की कई मांगें पूरी हुई हैं. अतीत में ऐसे अनेक आंदोलन हैं, जहां पूर्ण कामयाबी मिली तो कई बार आंशिक सफलता भी मिली. काकरोच जनता पार्टी के सदस्य भी 20 मार्च को घोषित संसद मार्च को पुलिस ने जंतरमंतर पर ही रोक लिया. इसे आंदोलन के प्रमुख चेहरे सोनम वांगचुक को पुलिस ने दो दिन पहले ही उठाकर अस्पताल में दाखिल करवा दिया था. आइए, इसी बहाने जानते हैं कि हाल के वर्षों में दिल्ली चलो या संसद तक मार्च के आंदोलनों का क्या हश्र हुआ?

भारत में संसद तक मार्च केवल एक जुलूस नहीं होता. यह जनता के दबाव का प्रतीक होता है. लोग तब सड़क पर आते हैं, जब उन्हें लगता है कि उनकी बात दफ्तरों, अदालतों या चुनावी मंचों तक नहीं पहुंच रही है. संसद देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था है, इसलिए आंदोलनकारी उसकी ओर बढ़कर अपनी मांग को राष्ट्रीय मुद्दा बनाना चाहते हैं.

काकरोच जनता पार्टी का संसद मार्च

सीजेपी ने परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक, बेरोजगारी और जवाबदेही के सवाल पर संसद मार्च का आह्वान किया है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। संगठन की प्रमुख मांगों में परीक्षा प्रणाली में सुधार और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग शामिल है. 20 जुलाई 2026 को जंतरमंतर से संसद की ओर बढ़ने की कोशिश हुई. मार्च को अनुमति नहीं मिली.

पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया था.

पुलिस ने बैरिकेड लगाए. प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोका गया. कुछ जगह धक्कामुक्की और लाठीचार्ज की खबरें भी आईं. इस तरह मार्च संसद तक नहीं पहुंच सका. हालांकि, आंदोलन का मुद्दा राष्ट्रीय चर्चा में जरूर आया. इस मार्च का अंतिम राजनीतिक परिणाम अभी तय नहीं माना जा सकता. कोई ठोस सरकारी घोषणा या कानून बदलाव सामने आने तक इसे अधूरा परिणाम ही कहा जाएगा.

किसान आंदोलन सबसे बड़ा उदाहरण

संसद मार्च और दिल्ली कूच की बात हो तो किसान आंदोलन सबसे बड़ा उदाहरण है. साल 2020 में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों ने दिल्ली चलो का आह्वान किया. पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और कई अन्य राज्यों के किसान दिल्ली की सीमाओं पर पहुंचे. उन्हें दिल्ली के भीतर जाने से रोका गया. कई जगह बैरिकेडिंग हुई. पानी की बौछारें और आंसू गैस का भी इस्तेमाल हुआ.

पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया था.

किसान सिंघु, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डर पर लंबे समय तक डटे रहे. किसानों की मुख्य मांग थी कि तीन कृषि कानून वापस लिए जाएं. MSP की कानूनी गारंटी की मांग भी उठी. आंदोलन लगभग एक साल चला. नवंबर 2021 में सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की. बाद में संसद ने कानून निरस्त कर दिए. यह आंदोलन की बड़ी जीत थी लेकिन एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग अभी भी अधूरी है.

अन्ना आंदोलन और लोकपाल की मांग

साल 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के नेतृत्व में बड़ा जन आंदोलन हुआ. जंतरमंतर और रामलीला मैदान इसके प्रमुख केंद्र बने. आंदोलन की मांग थी कि मजबूत जन लोकपाल कानून बने. यह मार्च और धरने का मिश्रित आंदोलन था. संसद भवन तक स्थायी कब्जे का लक्ष्य नहीं था, लेकिन आंदोलन का दबाव संसद तक साफ पहुंचा. लोकपाल पर राष्ट्रीय बहस हुई. राजनीतिक दलों पर जवाब देने का दबाव पड़ा. बाद में लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम बना. इसलिए इसे आंशिक सफलता वाला आंदोलन कहा जा सकता है. कानून तो बना, लेकिन भ्रष्टाचार खत्म होने का दावा नहीं किया जा सकता.

अन्ना आंदोलन.

निर्भया आंदोलन और कानून में बदलाव

दिसंबर 2012 के निर्भया कांड के बाद दिल्ली समेत देश भर में बड़े प्रदर्शन हुए. प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट और संसद क्षेत्र के आसपास तक पहुंचे. पुलिस ने कई जगह रोक लगाई. हालात तनावपूर्ण रहे. इस आंदोलन का असर तेज था. महिलाओं की सुरक्षा राष्ट्रीय मुद्दा बन गई. सरकार ने जस्टिस वर्मा समिति बनाई. आपराधिक कानून में संशोधन हुआ. बलात्कार और यौन हिंसा से जुड़े कई प्रावधान सख्त किए गए. इस आंदोलन का असर कानून बदलाव के रूप में सामने आया. मगर महिलाओं की सुरक्षा की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई. इसलिए इसे कानूनी सफलता, लेकिन सामाजिक चुनौती वाला आंदोलन कहा जा सकता है.

भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ आंदोलन

साल 2015 में भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव के प्रस्ताव के खिलाफ किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने दिल्ली में प्रदर्शन किए. संसद सत्र के दौरान यह मुद्दा लगातार उठा. सरकार पर किसान विरोधी होने के आरोप लगे. यहां सड़क और संसद दोनों का दबाव साथ दिखा. सरकार को राज्यसभा में पर्याप्त समर्थन नहीं मिला. विरोध बढ़ता गया. अंत में प्रस्तावित संशोधन आगे नहीं बढ़ सके. इस आंदोलन का हश्र सरकार के पीछे हटने के रूप में हुआ. यह दिखाता है कि हर जीत केवल सड़क पर नहीं मिलती. संसद के भीतर संख्या बल भी मायने रखता है.

वन रैंक वन पेंशन की मांग के लिए प्रदर्शन .

वन रैंक वन पेंशन आंदोलन

पूर्व सैनिकों ने वन रैंक वन पेंशन की मांग को लेकर लंबे समय तक प्रदर्शन किया. जंतरमंतर इसका बड़ा केंद्र रहा. संसद सत्रों में भी यह मुद्दा उठता रहा. सरकार ने वन रैंक वन पेंशन लागू करने की घोषणा की. यह आंदोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, लेकिन पेंशन की गणना, समीक्षा और लागू करने के तरीके पर विवाद बने रहे. कुछ पूर्व सैनिक संगठनों ने बाद में भी असहमति जताई. इस तरह कहा जा सकता है कि इस आंदोलन से समाधान निकला लेकिन यह आंशिक ही कहा जाएगा.

एससीएसटी कानून बचाने का आंदोलन

साल 2018 में एससीएसटी अत्याचार निवारण कानून से जुड़े एक न्यायिक फैसले के बाद देश भर में विरोध हुआ. कई दलित और आदिवासी संगठनों ने भारत बंद बुलाया. आंदोलन ने संसद और सरकार पर दबाव बनाया. केंद्र सरकार ने कानून में संशोधन कर पुराने प्रावधान बहाल किए. संसद ने संशोधन पारित किया. इस मामले में संगठित सामाजिक दबाव का सीधा असर कानून पर दिखा. यह आंदोलन अपेक्षाकृत स्पष्ट परिणाम वाला माना जाता है.

CAA के विरोध में हुआ था प्रदर्शन.

CAA विरोध और शाहीन बाग

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ साल 2019 और 2020 में देश भर में प्रदर्शन हुए. शाहीन बाग आंदोलन इसका प्रमुख चेहरा बना. लोग संसद की तरफ बढ़ने से अधिक धरने और प्रतीकात्मक विरोध पर टिके रहे. आंदोलन ने कानून को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में रखा. संसद में विपक्ष ने मुद्दा उठाया, लेकिन कानून वापस नहीं हुआ. इसलिए इसका हश्र राजनीतिक और सामाजिक असर के रूप में हुआ, न कि तत्काल कानूनी जीत के रूप में.

संसद गेट तक पहुंचे प्रदर्शनकारी

Protestors reached the main gate of parliament.
Police fires tear gas. pic.twitter.com/N47ixHswEm

— Loveena🕉 July 20, 2026

पुलिस इस तरह के मार्च क्यों रोकती है?

संसद भवन एक उच्च सुरक्षा क्षेत्र है. वहां राष्ट्रपति भवन, मंत्रालय और अन्य संवेदनशील संस्थान भी पास हैं. इसलिए प्रशासन अक्सर मार्च को जंतरमंतर या किसी तय स्थल तक सीमित रखना चाहता है. यहां दो बातें साथ चलती हैं. पहली, शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है. दूसरी, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था भी प्रशासन की जिम्मेदारी है. असली परीक्षा यह है कि रोक लगने पर संवाद होता है या केवल टकराव.

संसद तक मार्च का अर्थ केवल संसद भवन पहुंच जाना नहीं है. कई बार मार्च बैरिकेड पर रुक जाता है, पर उसका मुद्दा संसद के भीतर पहुंच जाता है. किसान आंदोलन इसका बड़ा उदाहरण है. किसान संसद भवन तक रोज नहीं पहुंचे, लेकिन उनकी मांग के कारण सरकार ने तीन कृषि कानून वापस लिए. सीजेपी का मार्च फिलहाल रोका गया है. इसका अंतिम परिणाम भविष्य की बातचीत, जांच, नीतिगत फैसलों और संसद में उठने वाली बहस पर निर्भर करेगा. भारत के आंदोलनों का इतिहास यही कहता है. सड़क की आवाज तब ज्यादा असर डालती है, जब वह शांतिपूर्ण हो, मांग साफ हो, संगठन मजबूत हो और जनता का भरोसा साथ हो.