‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ की दिशा में केंद्र सरकार अब तक का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाने जा रही है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने एक महाब्लूप्रिंट तैयार किया है, जिसके तहत 189 बिलियन डॉलर के भारीभरकम इंपोर्ट को पूरी तरह से रोकने या कम करने की तैयारी है. इस बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार ने ऐसे 1,272 विदेशी उत्पादों की एक व्यापक लिस्ट फाइनल की है, जिन्हें अब विदेशों से मंगाने के बजाय सीधे भारत में ही निर्मित किया जाएगा. इसका सीधा असर देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, रोजगार और वैश्विक व्यापार संतुलन पर पड़ेगा.

189 अरब डॉलर के इंपोर्ट को कम करने की तैयारी

बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर एक प्रोडक्टलेवल रणनीति बनाई है. इसका मकसद 1,272 प्रोडक्ट्स के लिए घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाकर सालाना 189 अरब डॉलर के इंपोर्ट को कम करना है. इन प्रोडक्ट्स में केमिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और स्पेशलिटी स्टील शामिल हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से हर प्रोडक्ट का सालाना इंपोर्ट 50 मिलियन डॉलर से ज्यादा है और या तो इनका भारत में प्रोडक्शन नहीं होता या फिर जरूरत के हिसाब से कम मात्रा में होता है. इस प्लान को लागू करने में राज्यों की भूमिका अहम होगी, क्योंकि जमीन अधिग्रहण, इंडस्ट्रियल मंजूरी और इन्वेस्टमेंट इंसेंटिव जैसे मामले ज़्यादातर उनके अधिकार क्षेत्र में आते हैं.

भारत के पास किन चीजों को बदलने की है क्षमता?

यह कवायद भारत के वित्त वर्ष 2026 के इंपोर्ट बास्केट के बारे में सरकार के आकलन पर आधारित है. ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ की रिपोर्ट के अनुूसार केवल 26 फीसदी आयातों को ही घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के माध्यम से बदलने के लिए व्यावहारिक रूप से उपयुक्त माना गया है.

अन्य 46 फीसदी में कच्चे तेल, सोने और कोयले जैसे उत्पाद शामिल थे, जिन्हें लोकल मैन्युफैक्चरिंग के माध्यम से आसानी से नहीं बदला जा सकता है. शेष 28 फीसदी में ऐसे उत्पाद शामिल थे जिनका भारत पहले से ही प्रतिस्पर्धी ढंग से निर्माण करता है, लेकिन कीमत या गुणवत्ता संबंधी कारणों से उनका इंपोर्ट जारी रखा हुआ है.

रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में भारत का वस्तुओं का आयात बिल रिकॉर्ड 776 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें कच्चे तेल और सोने पर खर्च किए गए 246 अरब डॉलर शामिल हैं. इसका उद्देश्य ठीकठीक यह पहचानना है कि भारत में कहां क्षमता की कमी है.

राज्यों को काम करने का तरीका सौंपा गया

केंद्र ने राज्यों को सलाह दी है कि वे पहचाने गए प्रोडक्ट्स के लिए खास सेक्टर वाले मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर बनाएं और अपनी इंडस्ट्रियल पॉलिसी को उन इंडस्ट्रीज की ज़रूरतों के हिसाब से ढालें. राज्यों से यह भी कहा गया है कि वे रेगुलेटरी मंजूरी की प्रक्रिया तेज करने के लिए ‘नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम’ की तर्ज पर ‘सिंगलविंडो क्लीयरेंस सिस्टम’ बनाएं. डॉक्यूमेंट के मुताबिक, प्रस्तावित आर्थिक मदद में स्टैम्पड्यूटी में छूट और कैपिटलएक्सपेंडिचर के लिए इंसेंटिव शामिल हो सकते हैं. ऐसे उपाय अलगअलग राज्य उन इंडस्ट्रीज़ के आधार पर तैयार और लागू करेंगे जिन्हें वे आकर्षित करना चाहते हैं.

‘डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड’ ने ऐसे और प्रोडक्ट्स की पहचान करने के लिए वर्किंग ग्रुप भी बनाए हैं जिनका देश में ही प्रोडक्शन किया जा सके. डॉक्यूमेंट में बताया गया है कि ‘एडवांस ऑथराइजेशन’ और ‘एक्सपोर्ट प्रमोशन कैपिटल गुड्स प्रोग्राम’ जैसी स्कीम अभी मैन्युफैक्चरर्स और एक्सपोर्टर्स को कुछ रॉ मटीरियल, इनपुट और मशीनरी कम या ज़ीरो ड्यूटी पर इम्पोर्ट करने की इजाज़त देती हैं. लोकल सप्लायर क्लस्टर विकसित करने से धीरेधीरे इनमें से कुछ प्रोडक्ट्स को इम्पोर्ट करने की जरूरत कम हो सकती है.

एक दिन पहले आई थी ये रिपोर्ट

ब्लूमबर्ग ने 16 जुलाई को रिपोर्ट दी थी कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने अहम मंत्रालयों को ऐसे 100 से ज्यादा प्रोडक्ट्स की पहचान करने का निर्देश दिया था जिन पर इंपोर्ट की निर्भरता ज्यादा है और जिनकी जगह देश में बने प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल किया जा सकता है या उनकी कमी पूरी की जा सकती है. ब्लूमबर्ग के हवाले से अधिकारियों ने बताया कि उस लिस्ट में इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स, जरूरी दवाएं, फर्टिलाइजर्स, सेमीकंडक्टर्स, ऑटोमोबाइल्स और मशीनरी शामिल थे.

रिपोर्ट में कहा गया है कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर और प्रधानमंत्री के मौजूदा प्रधान सचिव शक्तिकांत दास की अगुवाई वाली एक टास्क फोर्स इसका बड़ा ब्लूप्रिंट तैयार कर रही थी. इसमें प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य भी शामिल थे. विचार किए जा रहे उपायों में प्राइवेट और विदेशी इन्वेस्टर्स के लिए इंसेंटिव, सरकारी कंपनियों के साथ जॉइंट वेंचर और ट्रेड स्कीम में बदलाव शामिल थे, जिनसे एक्सपोर्टर्स को देश में बने इनपुट और कैपिटल गुड्स का ज़्यादा इस्तेमाल करने के लिए बढ़ावा मिल सके. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में कहा गया था कि बातचीत अभी चल रही है और कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है.

बढ़ता इंपोर्ट बिल बढ़ा रहा है चिंता

कॉमर्स मिनिस्ट्री के डाटा के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 की अप्रैलजून तिमाही में भारत का सामान का इंपोर्ट एक साल पहले के मुकाबले 19.89 फीसदी बढ़कर 216.18 अरब डॉलर हो गया. इस तीन महीने की अवधि में सामान के व्यापार का घाटा बढ़कर 86.86 अरब डॉलर हो गया.

16 जुलाई को डॉलर के मुकाबले रुपया 96.3450 पर बंद हुआ. 3 जुलाई को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 674.19 अरब डॉलर था, जो फरवरी में बने रिकॉर्ड स्तर से लगभग 54 अरब डॉलर कम है. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के फाउंडर अजय श्रीवास्तव ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि गहरे स्तर की मैन्युफैक्चरिंग के लिए लगातार प्रोडक्टलेवल की इंडस्ट्रियल पॉलिसी, इंजीनियरिंग क्षमताएं, टूलिंग और कुशल सप्लायर्स की जरूरत होती है.

उन्होंने कहा कि घरेलू गतिविधियों को सिर्फ़ इंपोर्ट किए गए पार्ट्स की फाइनल असेंबली तक सीमित रखने के बजाय पूरी प्रोडक्शन चेन में क्षमता विकसित करने से ही यह तय होगा कि भारत आखिरकार पहचाने गए इंपोर्ट बिल का कितना हिस्सा कम कर सकता है.