हंसने की आदत बड़ी अजीब चीज़ है. हम अक्सर सोचते हैं कि हंसी अच्छे दिनों के लिए होती है. जब सब ठीक चल रहा हो, तो हम आसानी से हंस लेते हैं. दोस्तों के साथ मजाक करते हैं, छोटीछोटी बातों पर खुश होते हैं. लेकिन शायद हंसी असल में अच्छे दिनों के लिए बनी ही नहीं है. अच्छे दिनों को किसी सहारे की ज्यादा जरूरत नहीं होती. असली जरूरत उन दिनों में होती है, जब जिंदगी अचानक हमें जोर का झटका देती है.

गाड़ी में लगे शॉक एब्जॉर्बर को देखिए. वे बिल्कुल चिकनी सड़क के लिए नहीं बने होते. चिकनी सड़क पर उनका काम हमें दिखाई भी नहीं देता. उनका असली काम तब शुरू होता है, जब सड़क पर गड्ढे हों, पत्थर हों और अचानक बड़ेबड़े झटके आएं. गाड़ी फिर भी आगे बढ़ती रहती है, लेकिन अंदर बैठे लोगों को हर झटका पूरी ताकत से महसूस नहीं होता.

जिंदगी की सड़क

जिंदगी की सड़क भी ऐसी ही होती है. कभी कई महीने सब ठीक चलता है. फिर अचानक अस्पताल आ जाता है. कोई मुश्किल फोन आता है. नौकरी चली जाती है. कोई दोस्त दूर हो जाता है. अचानक कोई बड़ा खर्च सामने आ जाता है. कोई अपना बदल जाता है. जिस बात पर हमें भरोसा था, वही एक दिन समझ में नहीं आती. जिंदगी हमारी तैयारी पूछे बिना सड़क पर पत्थर रख देती है.

लोगों को हंसाने की कला

ऐसे समय में हंसी सिर्फ लोगों को हंसाने की कला नहीं रहती. वह दर्द को अपने साथ लेकर चलने का एक तरीका बन जाती है, बिना इस दर्द को पूरी जिंदगी बनने दिए. दर्द पर हंसना और दर्द के साथ हंसना, दोनों अलग बातें हैं. पहले में किसी की तकलीफ का मज़ाक हो सकता है. दूसरे में इंसानियत होती है. अस्पताल के बाहर इंतज़ार कर रहा कोई आदमी अचानक छोटीसी मज़ेदार बात कह देता है.

कोई बड़ी परेशानी में भी अपनी ही किसी गलती पर मुस्कुरा देता है. मुश्किल समय से गुजर रहा परिवार भी रात के खाने पर हंस सकता है. समस्या वहीं रहती है. कुछ हल नहीं होता. लेकिन कुछ पल के लिए समस्या कमरे में अकेली नहीं रहती. शायद हंसी यही करती है. वह मन में थोड़ीसी जगह बना देती है.

मेरे साथ ही हमेशा ऐसा क्यों होता है?

सोचिए, दो लोग एक ही मुश्किल दिन से गुजर रहे हैं. पहला कहता है, मेरे साथ ही हमेशा ऐसा क्यों होता है? दूसरा कहता है, आज ही होना था? लगता है जिंदगी ने मेरा कैलेंडर देखकर ही यह दिन चुना है. समस्या दोनों की एक ही है. लेकिन दूसरे इंसान के भीतर कुछ ऐसा है जिसने खुद को पूरी तरह हारने नहीं दिया. यह बहुत महत्वपूर्ण है.

जिस इंसान में हंसी की जगह बिल्कुल नहीं बची, उसके लिए जिंदगी की हर छोटी परेशानी पूरी ताकत से आती है. छोटी गलती बड़ी मुसीबत बन जाती है. देर होना अपमान लगने लगता है. असहमति हमला लगती है. खराब दिन इस बात का सबूत बन जाता है कि जिंदगी ही गलत है. ऐसा इंसान कमजोर हो, यह जरूरी नहीं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। शायद उसके भीतर सड़क और दिल के बीच कोई शॉक एब्जॉर्बर ही नहीं बचा है.

मैंने अक्सर महसूस किया है कि जो लोग हमें सबसे आसानी से हंसा देते हैं, वे अपने भीतर ऐसी बातें लेकर चल रहे होते हैं, जिनके बारे में हमें कुछ पता नहीं होता. उनका हंसना यह नहीं बताता कि जिंदगी उनके साथ हमेशा अच्छी रही है. कई बार इसका मतलब यह होता है कि उन्होंने यह सीख लिया है कि हर दुख को अपने पूरे मन पर कब्जा करने का अधिकार नहीं देना है.

दुनिया की पुरानी समझ

दुनिया की पुरानी समझ भी हमें यही बताती रही है कि जो हमारे साथ हो रहा है, हमें खुद को सिर्फ वही नहीं समझ लेना चाहिए. तूफान सच हो सकता है, लेकिन हम केवल तूफान नहीं हैं. कोई कठिन दिन सच हो सकता है, लेकिन वह हमारी पूरी जिंदगी नहीं है. शायद हम अपने ऊपर एक छोटासा प्रयोग कर सकते हैं. अगली बार जब कुछ गलत हो, तो मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?

पूछने से पहले खुद से पूछें, क्या इस पूरे दुख के बीच ऐसी कोई छोटी बात है, जिस पर मैं मुस्कुरा सकता हूं? दर्द को झुठलाने के लिए नहीं. यह दिखाने के लिए नहीं कि सब ठीक है. बस बंद कमरे में एक छोटीसी खिड़की खोलने के लिए. कई बार वही खिड़की काफी होती है. मुझे उन लोगों के लिए सच में दुख होता है जिनके पास हंसने की यह छोटीसी ताकत नहीं होती. इसलिए नहीं कि वे मज़ाक नहीं कर सकते, बल्कि इसलिए कि जिंदगी का हर पत्थर शायद सीधे उनके दिल तक पहुंचता है. उनके और जिंदगी के झटके के बीच कोई मुलायम जगह नहीं बचती.

उम्र बढ़ने के साथ हंसी और भी जरूरी

शायद उम्र बढ़ने के साथ हंसी और भी जरूरी हो जाती है. बच्चा इसलिए हंसता है क्योंकि उसके लिए दुनिया अभी नई है. बड़ा आदमी इसलिए हंसना सीखता है क्योंकि दुनिया हमेशा आसान नहीं होती. और बूढ़ा आदमी शायद इसलिए हंसता है क्योंकि उसने इतना देख लिया होता है कि उसे पता होता है, कल फिर कोई नई सड़क होगी, कोई नया पत्थर होगा और जिंदगी फिर कोई नया आश्चर्य लेकर आएगी. हम हमेशा सड़क नहीं चुन सकते. हर पत्थर हटा नहीं सकते. हर झटका रोक नहीं सकते. लेकिन जब जिंदगी हमारे पहियों के नीचे कोई बड़ा पत्थर डाल दे, तो क्या हमारे भीतर इतनी हंसी बची रहेगी कि हम फिर भी गाड़ी चलाते रहें?