नई दिल्ली। कॉलेज की तख्तियों और लकड़ी की कुर्सियों पर आपने भी तीर की निशान वाला दिल और कई घिसेपिटे संदेश पढ़े होंगे. उन्हीं में एक पंक्ति अक्सर दिखती थी “आज एक उपहार है, इसलिए इसे प्रेजेंट कहते हैं.” बीजेपी ने ऐसे किसी छोटे शहर के कॉलेज में पढ़ाई नहीं की.

लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा की राजनीतिक शिक्षा किसी छोटे शहर के कॉलेज की बेंचों पर नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के बाद की धूप, पसीने और कड़ी प्रतिस्पर्धा वाली सड़कों पर हुई है, जहां सिर्फ़ टिके रहना ही एक बड़ी चुनौती हुआ करती थी और हमेशा आने वाले कल की चिंता सताती थी.
भारत में लाखों लोगों का मानना था कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को नई दिल्ली के जंतरमंतर पर उनका इस्तीफा मांगने के लिए जुटी भीड़ के बेकाबू होने से बहुत पहले ही पद छोड़ देना चाहिए था. पहले नीटयूजी का पेपर लीक हुआ और उसके तुरंत बाद सीबीएसई की ऑनलाइन मार्किंग स्कीम की गड़बड़ी सामने आई, ऐसे में छात्रों का आक्रोश वाजिब था.
जब भारत की उच्च शिक्षा टेबल पर बिखरे जेंगा के ब्लॉक की तरह बिखरती हुई दिख रही थी, तब न तो पार्टी की ओर से और न ही सरकार की ओर से कोई कार्रवाई या संवाद हुआ. विपक्ष के नदारद रहने पर, कॉकरोच टेबल पर आ गए. सोनम वांगचुक ने अपनी भूख हड़ताल से इस नएनवेले आंदोलन को हवा दी. लेकिन वे जो हासिल करने में असफल हो सकते थे, उसे दिल्ली पुलिस और आरएएफ ने कर दिखाया. 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों जिनमें से हजारों नाबालिग थे. उस पर बल प्रयोग ने भाजपा को राजनीतिक रूप से एक ऐसी गली में धकेल दिया, जहां से निकलना मुश्किल था.
हालांकि, प्रधान को हटाने में जितनी देरी हुई, उसने खुद को उतनी ही एक कठोर सत्ता के रूप में पेश किया, जो लोगों की मांगों को पूरा करने के लिए कोई नरम रूख नहीं दिखा रही थी. ‘अगर कल ऐसा हुआ तो…’ वाली सोच के साथ भाजपा ने उस स्थिति को टालने की कोशिश की, जिसका अंत होना तय था.
आखिर, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा सिर्फ़ एक पद छोड़ने का मामला नहीं था, बल्कि वह एक ऐसी मिसाल बन सकता था, जिसका असर आने वाले कल और न जाने कितने समय तक रहने वाला था. शायद इसी वजह को देखते हुए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने आख़िरी वक्त तक उन्हें बचाने की हरसंभव कोशिश की.
हालांकि, जितनी देरी धर्मेंद्र प्रधान को हटाने में हुई, उतना ही सरकार अड़ियल और सख्त नजर आई. संसद का मॉनसून सत्र शुरू होने को था इसलिए राजधानी में राजनीतिक हलचल और तेज़ हो गई. विपक्षी दलों के नेता जंतरमंतर पहुंचने लगे जिससे वे आमरण अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक के साथ फ्रेम में दिख सकें.
मॉनसून सत्र 20 जुलाई को शुरू हुआ और पहला हफ़्ता बिना किसी कामकाज के गुज़र गया. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सदन के भीतर और प्रधानमंत्री आवास के बाहर विरोध प्रदर्शन किया जिसके बाद उन्हें हिरासत में ले लिया गया. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। विपक्ष सदन का कामकाज चलने देने के मूड में नहीं था. विपक्ष को पता था कि सरकार का मकसद क्या था और सरकार को भी पता था कि विपक्ष क्या चाहता है.
ऐसे में केंद्र सरकार के दो वरिष्ठ मंत्री जे.पी. नड्डा और जितेंद्र सिंह मैदान में उतारे गए. कॉकरोच जनता पार्टी से बातचीत का ज़िम्मा उन्हें सौंपा गया. सबसे पहले उन्होंने वांगचुक को अनशन खत्म करने के लिए मनाया और उनकी मांगों को भी कुछ कम कराया. लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी, अब यह विरोध प्रदर्शन कॉकरोच जनता पार्टी या वांगचुक से बहुत बड़ा हो चुका था. विरोध का स्वर तेज हो चुका था और इसके लिए किसी की बलिदान ज़रूरी हो गया था.
न तो कड़े कानून, न फास्टट्रैक अदालतें और न ही पोर्ट्रेट मोड वाले वीडियो इस धधकती आग को शांत कर सकते थे. उसे एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी, जो ढह चुकी शिक्षा व्यवस्था का प्रतीक बन चुका था धर्मेंद्र प्रधान. तब भाजपा ने भविष्य के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू किया. परंपराओं और मिसालों की चिंता बाद में भी की जा सकती थी, लेकिन बड़े राजनीतिक लक्ष्य ज्यादा महत्वपूर्ण थे.
मॉनसून सत्र पर थी सरकार की नजर
सूत्रों की मानें तो, इस मॉनसून सत्र में परिसीमन बिल सदन के पटल पर पेश किया जा सकता है. हालांकि सरकार द्वारा सूचीबद्ध पांच बिलों में यह बिल शामिल नहीं था, लेकिन खबरों की मानें तो 13 अगस्त से पहले सरकार इस बिल को पेश कर सकती है. यह बिल बहुत अहम है, इसे पहले भी मोदी सरकार ने पेश करने की कोशिश की थी. अप्रैल में महिला आरक्षण बिल से जोड़ते हुए इसे पास कराने के लिए एक विशेष सत्र आहूत किया गया था. लेकिन सरकार दो तिहाई बहुमत नहीं जुटा पाई थी और ये बिल गिर गया था.
सूत्रों के अनुसार, Delimitation विधेयक मानसून सत्र में पेश किया जा सकता है. हालांकि सरकार की ओर से सूचीबद्ध पांच विधेयकों में इसका नाम नहीं था, लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक 13 अगस्त तक चलने वाले इस सत्र में इसे लाया जा सकता है. यह विधेयक बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. अप्रैल में मोदी सरकार ने इसे महिला आरक्षण विधेयक के साथ जोड़कर विशेष सत्र में पारित कराने की कोशिश की थी, लेकिन दोतिहाई बहुमत नहीं जुटा पाने के कारण यह प्रयास विफल हो गया.
यह पहली बार था जब मोदी सरकार द्वारा लाया गया कोई संवैधानिक संशोधन विधेयक पारित नहीं हो सका. लेकिन अप्रैल के बाद सियासी परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं. हाल के दलबदल, दलों के भीतर कलह, विपक्ष की कमजोर एकजुटता और राजनीतिक पुनर्संरेखण ने सरकार को उम्मीद दी कि अब वह सीमांकन विधेयक पारित कराने की फिर कोशिश कर सकती है.
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद एनडीए के पास 293 सांसद थे, जिनमें भाजपा के 240 सांसद शामिल थे. बाद में यह संख्या बढ़कर 318 हो गई. इसमें मुख्य योगदान तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों के एनडीए के साथ आने और शिवसेना के छह सांसदों के शिंदे गुट में शामिल होने का रहा. राज्यसभा में जून 2024 के मध्य तक एनडीए के पास 101 सदस्य थे. अब यह संख्या बढ़कर 152 हो चुकी है.
यह बढ़ोतरी किसी चमत्कार का परिणाम नहीं थी, बल्कि सीमांकन के बड़े लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए बेहद सोचसमझकर और लगातार की गई राजनीतिक रणनीति का नतीजा थी. इस राजनीतिक इंजीनियरिंग के साथसाथ शरद पवार और एमके स्टालिन जैसे नेताओं को भी साथ लाना जरूरी था, जो किसी आसान काम से कम नहीं था.
भारी पड़े कॉकरोच
ऐसे में यह मानसून सत्र भाजपा के साहस, राजनीतिक कौशल और खासकर कांग्रेस सहित विपक्ष में बढ़ती टूटफूट का मंच बनने वाला था. लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन बाकी सभी मुद्दों पर भारी पड़ गया. कांग्रेस ने इस मौके का इस्तेमाल भाजपा के संसदीय एजेंडे को पटरी से उतारने के लिए किया. जब तक जंतरमंतर का आंदोलन उग्र बना रहता, सरकार अपना एजेंडा आगे नहीं बढ़ा सकती थी. इसलिए अंततः धर्मेंद्र प्रधान राजनीतिक बलि की भेंट चढ़ गए.
इसलिए, यह एक तरफ प्रतिष्ठा और प्रधान, तो दूसरी तरफ कड़ी मेहनत और बड़े लक्ष्यों के बीच का चयन था. इसलिए, मोदी सरकार ने स्थिति को संभालने और किसी और दिन बड़ी लड़ाई लड़ने के लिए पीछे हटने का रास्ता चुना.ऑप्टिक्स पहले ही खराब हो चुका था. वरिष्ठ नेता नड्डा और सिंह नौसिखिए सौरव दास और आशुतोष रांका के साथ बातचीत कर रहे थे, जो दोनों हाथ बांधकर बैठे थे. अनुभवी जोड़ी के लिए यह कोई बहुत अच्छी तस्वीर नहीं थी.
हालांकि सरकार के बारे में माना जाता है कि वह बहुत ही कम मौकों पर रणनीतिक रूप से पीछे हटती है. लंबे किसान आंदोलन के बाद तीन कृषि कानूनों को वापस लेना इसका एक उदाहरण है. जंतरमंतर के प्रदर्शन की तरह ही वह विरोध भी एक बिल्कुल अलग रूप ले रहा था. कोई भी सरकार नहीं चाहती कि कोई प्रदर्शन हाईजैक हो जाए और वह ऐसी आग में बदल जाए जो उसके नियंत्रण से बाहर हो जाएसंसद में दांव पर बहुत कुछ लगा था और प्रधान की कुर्सी जाना एक छोटी सी कुर्बानी थी.
हालांकि हर कोई जानता है कि उस पार्टी के लिए परंपरा, प्रतिष्ठा और अनुशासन का क्या मतलब है जिसकी जड़ें परंपराओं में रचीबसी हैं. जो सभ्यता से जुड़े लक्ष्यों को हासिल करना चाहती है. सवाल तो बना रहेगा कि आखिर भाजपा ने इस मुद्दे को इतना आगे बढ़ने को क्यों दिया? भाजपा, जो हमेशा कल की प्लानिंग करती है उसने प्रधान की बलि कल ही क्यों नहीं दे दी?



