‘जाना’ हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया मानी गई है. कवि केदारनाथ सिंह ने इसपर अच्छे से लिखा भी है. मगर घर से निकलते ही जाम में फंस ‘जाना’ भी इससे कम दुखद नहीं होता है. इसकी वजह से आप दफ्तर, अस्पताल, पार्टीनिमंत्रण में लेट हो जाते हैं. जब हम इस जाम में फंसने के कारण के बारे में सोचते हैं को अक्सर खराब सड़कें दिमाग में आती हैं, लेकिन आपको अपनी मंजिल पर देरी से पहुंचाने में यही एक कारण नहीं है और भी कुछ फैक्टर्स हैं जो जाम लगने में प्रमुख हैं.

नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस यानी NSO के पहले नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे के मुताबिक, काम पर जाने वाले सिर्फ करीब 15% कर्मचारी ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं. वहीं, करीब 46% कर्मचारी टूव्हीलर या कार से सफर करते हैं. यानी बड़ी संख्या में लोग रोज अपनी गाड़ियों के साथ सड़कों पर निकलते हैं.

कैसे काम पर जाते हैं लोग?

देशभर में कर्मचारियों के काम पर आनेजाने में टूव्हीलर की हिस्सेदारी 43% है, जबकि कार की हिस्सेदारी 3% है. शहरी इलाकों में निजी वाहनों पर निर्भरता और ज्यादा है. यहां 53% कर्मचारी टूव्हीलर और 5.7% कार से काम पर जाते हैं. ऐसे में सुबह और शाम जब बड़ी संख्या में लोग एक ही समय पर ऑफिस या काम के लिए निकलते हैं, तो सड़कों पर वाहनों का दबाव बढ़ना स्वाभाविक है. पब्लिक ट्रांसपोर्ट की कम हिस्सेदारी इस दबाव को और बढ़ा सकती है.

हालांकि, देश में काम पर जाने का सबसे आम तरीका निजी वाहन ही नहीं है. NSO के आंकड़ों के मुताबिक, 28.3% कर्मचारी पैदल काम पर जाते हैं, जबकि 10.7% साइकिल का इस्तेमाल करते हैं. ग्रामीण इलाकों में यह तस्वीर और अलग है, जहां 36% से ज्यादा कर्मचारी पैदल काम पर जाते हैं. इसके मुकाबले शहरों में सिर्फ 14% कर्मचारी पैदल काम पर जाते हैं. यानी शहरों में लोगों की काम के लिए यात्रा जितनी ज्यादा मोटराइज्ड है, सड़कों पर वाहनों का दबाव भी उतना ही ज्यादा है.

NSO का यह सर्वे जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच किया गया था. इसमें 1 किलोमीटर से ज्यादा दूरी की यात्राओं को शामिल किया गया. आंकड़े बताते हैं कि जाम को समझने के लिए सिर्फ सड़क की चौड़ाई या उसकी हालत देखना काफी नहीं है. यह भी देखना होगा कि किसी शहर में कितने लोग काम पर जाने के लिए बस, ट्रेन या दूसरे पब्लिक ट्रांसपोर्ट की जगह अपनी बाइक और कार का इस्तेमाल कर रहे हैं.

ट्रैफिक क्यों लगता है

  1. पब्लिक ट्रांसपोर्ट का कम इस्तेमाल NSO का डेटा बताता है कि शहरों में डेली काम पर जाने वालों में सिर्फ करीब 15% लोग ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेते हैं. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। बाकी बड़ी संख्या बाइक, कार या दूसरे साधनों पर निर्भर है.
  2. दोपहिया वाहनों की बढ़ती संख्या जिन लोगों पर रिसर्च की गई है. उनमें से करीब 42.6% लोग दोपहिया यानी बाइक या स्कूटी से ऑफिस पर जाते हैं. इससे सड़कों पर ट्रैफिक वॉल्यूम बढ़ता है.
  3. कार पर बढ़ती निर्भरता जिन लोगों के पास पब्लिक ट्रांसपोर्ट का आसान विकल्प नहीं है, वे कार का इस्तेमाल करते हैं. एक कार में अक्सर सिर्फ 12 लोग होते हैं, लेकिन सड़क की उतनी ही जगह घेरती है.

ऑफिस जाने में कितना होता है खर्च

  1. ऑफिस टाइम में एक साथ ट्रैफिक अक्सर आपने देखा होगा कि आपके शहर में जाम सुबह और शाम को ज्यादा लगता है. इसका मुख्य कारण है ऑफिस टाइमिंग. ज्यादातर लोगों का ऑफिस का समय सुबह 812 से शुरू होता है और सभी इसी वक्त में घर से दफ्तर के लिए निकलते हैं. इससे पीक आवर्स में सड़क की क्षमता से ज्यादा वाहन आ जाते हैं.
  2. सड़कों पर पार्किंग और अतिक्रमण रोड पर जाम लगने का एक कारण सड़क पर होने वाली पार्किंग और अतिक्रमण है. सड़क किनारे लगनी वाली दुकानों से भी रोड़ पर जाम जैसी स्थिति बनती है, क्योंकि इससे वास्तविक रोड स्पेस कम हो जाता है.
  3. बाटलनेक और खराब ट्रैफिक मैनेजमेंट फ्लाईओवर खत्म होने, संकरी सड़क, चौराहे या मर्जिंग पॉइंट पर अचानक सड़क की क्षमता घट जाती है और लंबा जाम बनता है. कैब, ऑटो और डिलीवरी वाहनों का लगातार रुकनाचलना भी खासकर बाजार और ऑफिस इलाकों में ट्रैफिक की रफ्तार घटाता है.