एक छोटी बच्ची स्कूल से अपनी बनाई हुई तस्वीर लेकर घर आई. तस्वीर में लाल छत वाला घर था, दो पेड़ थे और पीला सूरज चमक रहा था. वह दौड़कर मां के पास पहुंची और बोली, मम्मी, देखो मैंने क्या बनाया! मां मुस्कुराई, लेकिन तुरंत पूछ बैठी, अच्छा, टीचर ने कितने नंबर दिए? पहला इनाम मिला? बच्ची ने अपनी तस्वीर को दोबारा देखा. कुछ पल पहले वह बहुत खुश थी. अब सोचने लगी कि कहीं किसी दूसरे बच्चे ने उससे अच्छी तस्वीर तो नहीं बनाई. तस्वीर में कुछ नहीं बदला था. घर की छत अब भी लाल थी, पेड़ हरे थे और सूरज चमक रहा था. बदली थी तो केवल बच्ची की खुशी. अनजाने में उसने जिंदगी की एक अजीब बात सीख ली थी. कई बार अपना किया हुआ काम तब तक अच्छा नहीं लगता, जब तक पता न चल जाए कि दूसरों ने क्या किया है.

बच्चा चलना सीखता है तो उसे नहीं पता होता कि पड़ोस का बच्चा उससे पहले चलने लगा था. कोई तीन कदम चलकर गिरता है, कोई दस कदम चलकर. लेकिन बड़ा होते ही उसकी जिंदगी में तुलना शुरू हो जाती है. स्कूल के नंबर, कॉलेज, पहली नौकरी, तनख्वाह, मकान, गाड़ी और फिर अपने बच्चों की सफलता. जो पिता कभी बेटे के बोलना सीखने पर खुश होता था, वही बाद में परेशान रहने लगता है कि दोस्त का बेटा उससे ज्यादा क्यों कमाता है. जिस महिला को कभी अपना छोटासा घर बहुत प्यारा लगता था, वही पड़ोसी का बड़ा मकान देखकर उदास होने लगती है. धीरेधीरे हमारी खुशी भी दूसरों की जिंदगी देखकर तय होने लगती है. हम एक ऐसी दौड़ में शामिल हो जाते हैं जिसमें न किसी ने हमें बुलाया, न मंजिल बताई और न हमने कभी पूछा कि आखिर दौड़ना क्यों है.

हमारी खुशी किसी दूसरे की जिंदगी पर निर्भर

इस आदत में एक अजीब दुख छिपा है. अपने से ज्यादा सफल व्यक्ति को देखकर हम खुद को छोटा समझने लगते हैं. अपने से कम सफल व्यक्ति को देखकर संतोष महसूस करते हैं. दोनों ही स्थितियों में हमारी खुशी किसी दूसरे की जिंदगी पर निर्भर हो जाती है. एक आदमी अपनी तनख्वाह से खुश था. अचानक पता चला कि उसका पुराना दोस्त उससे दोगुना कमाता है. अगले दिन उसकी तनख्वाह कम नहीं हुई. मकान छोटा नहीं हुआ. परिवार से कुछ छिना नहीं. फिर भी वह खुद को गरीब महसूस करने लगा. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। आखिर उसने खोया क्या था? शायद कुछ भी नहीं. केवल अपने बारे में बनाई हुई एक धारणा टूट गई थी.

ज्यादा कमाने वाले दोस्त की स्थिति

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है. ज्यादा कमाने वाला दोस्त शायद परिवार के साथ समय बिताने को तरसता हो. बड़े मकान में रहने वाला व्यक्ति शायद उस छोटे घर को याद करता हो जहां सब साथ बैठकर खाना खाते थे ऊंचे पद पर बैठा व्यक्ति शायद कभी बिना पहचाने बाजार में घूमना चाहता हो. हम लोगों की उपलब्धियां देखते हैं, लेकिन उनकी कीमत नहीं देखते. उनकी सफलता दिखाई देती है, उसके पीछे की थकान नहीं. और संभव है कि जिसकी जिंदगी देखकर हम दुखी होते हैं, वही हमारी जिंदगी की किसी बात को पाने की इच्छा रखता हो.

इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरों से तुलना करना हमेशा गलत है. एक बच्चा दूसरे को तैरते देखकर तैरना सीखना चाहता है. कोई कर्मचारी अपने साथी की जानकारी देखकर और पढ़ने लगता है. दूसरों की सफलता हमें नई संभावनाएँ दिखा सकती है. फर्क हमारे भीतर पैदा होने वाली भावना में है. प्रेरणा कहती है, वह कर सकता है तो मैं भी सीख सकता हूं. ईर्ष्या कहती है, वह मुझसे आगे निकल गया, इसलिए मैं उससे कम हूं. पहली भावना हमें आगे बढ़ाती है. दूसरी भीतर से कमजोर करती है.

और तुमने जिंदगी में क्या हासिल किया?

कल्पना कीजिए, दो पुराने दोस्त चालीस साल बाद मिले. एक बड़ी संस्था का प्रमुख बन गया था. दूसरा छोटे शहर में शिक्षक रहा. चाय पीते हुए पहले ने अपने बड़े दफ्तरों, विदेश यात्राओं और महत्वपूर्ण लोगों से मुलाकातों के किस्से सुनाए. शिक्षक ध्यान से सुनता रहा. फिर पहले ने पूछा, और तुमने जिंदगी में क्या हासिल किया? शिक्षक मुस्कुराया. बोला, पैंतीस साल बच्चों को पढ़ाया। कुछ आज भी मिलने आते हैं. छोटासा बगीचा है. शाम को पत्नी के साथ टहलने जाता हूं. पहला दोस्त मुस्कुराया, लेकिन होटल लौटते समय उसे अपनी जवानी याद आ गई. कभी वह भी शिक्षक बनना चाहता था. पहली बार उसने सोचा कि वह अपने सपने के पीछे भाग रहा था या ऐसी सफलता के पीछे जिसे देखकर दूसरे लोग प्रभावित हों.

परिवार के साथ बिताई शांत शाम की क्या कीमत होगी?

शायद असली परेशानी तुलना नहीं, बल्कि यह है कि हमें खुद पता नहीं होता कि हमारे लिए क्या जरूरी है. जब हम अपने मन की बात नहीं समझते, तो दुनिया हमें सफलता का अर्थ बताने लगती है. ज्यादा पैसा, बड़ा पद, बड़ा घर और ज्यादा पहचान. हम उन चीजों को जमा करने लगते हैं जिन्हें गिना जा सकता है. लेकिन जिन बातों से जिंदगी सचमुच सुंदर बनती है, उन्हें गिनना मुश्किल है. परिवार के साथ बिताई शांत शाम की क्या कीमत होगी? वर्षों पुरानी दोस्ती को किस तराजू पर तौलेंगे? अपनी पसंद का काम करने से मिलने वाले संतोष को कितने नंबर देंगे? इन बातों की कोई सूची नहीं बनती, लेकिन इनके बिना बड़ी सफलता भी अधूरी लग सकती है.

एक सवाल अपने आप से पूछकर देखिए. अगर दुनिया में किसी को आपकी उपलब्धियों के बारे में पता ही न चले, तो क्या आप फिर भी उन्हें पाना चाहेंगे? क्या वही नौकरी करेंगे? वही चीजें खरीदेंगे? उसी पद के पीछे भागेंगे? मेहनत करना, पैसा कमाना और आगे बढ़ना गलत नहीं है. लेकिन जब हमारी मेहनत का उद्देश्य अपनी खुशी के बजाय दूसरों से बड़ा दिखाई देना बन जाए, तब सफलता भी बोझ बन सकती है.

क्या वह आज भी आपकी अपनी मंजिल है?

कभी अकेले बैठकर अपनी जिंदगी को देखिए. बिना किसी दूसरे से तुलना किए. यह मत सोचिए कि कौन आगे है और कौन पीछे. केवल यह पूछिए कि जो काम कर रहे हैं, क्या वह आपको अच्छा लगता है? जिन चीजों के पीछे भाग रहे हैं, क्या वे सचमुच जरूरी हैं? जिन लोगों से प्यार करते हैं, क्या उनके लिए समय निकाल पाते हैं? और जिस मंजिल की ओर बढ़ रहे हैं, क्या वह आज भी आपकी अपनी मंजिल है? क्योंकि देर से मंजिल पर पहुंचना उतना दुखद नहीं, जितना समय पर पहुंचकर यह पता चलना कि हम तो वहाँ जाना ही नहीं चाहते थे. अगर दुनिया में किसी को पता ही न चले कि हमने जिंदगी में क्या हासिल किया, तो क्या हम फिर भी वही जिंदगी जीना चाहेंगे जो आज जी रहे हैं?