कल तक ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता कराने को आतुर पाकिस्तान दुनिया को अपनी कूटनीति की क्षमता दिखाने निकला था, लेकिन उसे पहले अपने घर की हालत सुधारनी चाहिए थी। न तो ईरान और अमेरिका के बीच तनाव थमा और न ही पाकिस्तान अपनी साख बचा पाया। उल्टा हाल यह हो गया है कि उसकी अर्थव्यवस्था ढहने के कगार पर पहुंच गई है। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। पाकिस्तान में तेल की भारी कमी है और जो उपलब्ध है वह इतना महंगा हो चुका है कि आम जनता त्राहि त्राहि कर रही है।
देखा जाये तो इस्लामाबाद की चमकदार कूटनीति का मुखौटा उस वक्त पूरी तरह उतर गया जब ईरान ने आखिरी समय पर ऐसा कदम उठाया जिसने पाकिस्तान की सारी रणनीति ध्वस्त कर दी। जिस मंच को उसने खुद को वैश्विक मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने के लिए तैयार किया था, वही मंच उसकी दोहरी नीति और कमजोर रणनीतिक समझ को उजागर कर गया। पाकिस्तान ने खुद को अमेरिका और चीन के बीच संतुलन साधने वाला देश दिखाने की कोशिश की, लेकिन यह संतुलन अब बिखरता नजर आ रहा है।
 

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ईरान-अमेरिका संघर्ष को शांत करने के उद्देश्य से आयोजित इस्लामाबाद वार्ता को ऐतिहासिक पहल बताया गया था, लेकिन शुरुआती दौर में ही यह नाकाम हो गई। लगभग 21 घंटे चली बातचीत के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच मतभेद कम नहीं हुए। इसके बाद भी पाकिस्तान ने दूसरे दौर की वार्ता के जरिए अपनी प्रतिष्ठा बचाने की कोशिश की, लेकिन ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी प्रतिनिधियों से मिलने से साफ इंकार कर दिया। यह केवल एक कूटनीतिक मतभेद नहीं था, बल्कि पाकिस्तान की उस महत्वाकांक्षा पर सीधा प्रहार था जिसमें वह खुद को अनिवार्य मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत कर रहा था।
ईरान का यह रुख अचानक नहीं था। पहले से संकेत मिल रहे थे कि तेहरान प्रत्यक्ष बातचीत से बचना चाहता है और केवल अप्रत्यक्ष संपर्क को ही स्वीकार करेगा। इसके बावजूद पाकिस्तान ने इन संकेतों को नजरअंदाज किया और अपने कूटनीतिक प्रयासों को जरूरत से ज्यादा बढ़ा चढ़ाकर पेश किया। परिणामस्वरूप, जैसे ही ईरान पीछे हटा, पूरी प्रक्रिया ध्वस्त हो गई और पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे।
यह घटनाक्रम पाकिस्तान की विदेश नीति के उस जोखिम भरे खेल को भी सामने लाता है जिसमें वह एक साथ कई दिशाओं में संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। एक ओर वह अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है, तो दूसरी ओर चीन के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करना चाहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे मामले में चीन की भूमिका भले ही प्रत्यक्ष रूप से सामने न आई हो, लेकिन उसका प्रभाव स्पष्ट रूप से महसूस किया गया, जिससे स्थिति और जटिल हो गई।
इस कूटनीतिक असफलता के साथ-साथ पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति भी तेजी से बिगड़ रही है। इस्लामाबाद में कड़े सुरक्षा इंतजाम, बार-बार का लॉकडाउन और आर्थिक गतिविधियों का ठप होना यह दिखाता है कि यह पूरा प्रयोग देश पर भारी पड़ रहा है। खुद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने स्वीकार किया है कि ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव का सीधा असर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है और देश को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
 

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वैश्विक स्तर पर तेल संकट ने इस स्थिति को और गंभीर बना दिया है। मध्य पूर्व में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में आपूर्ति बाधित होने के कारण कच्चे तेल की कीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। यह मार्ग विश्व की ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा वहन करता है और इसमें आई रुकावट ने पाकिस्तान जैसे आयात निर्भर देशों को गहरे संकट में डाल दिया है।
इस बीच, पाकिस्तान के पेट्रोलियम मंत्री मलिक ने स्वीकार किया है कि देश के पास केवल पांच से सात दिनों का कच्चे तेल का भंडार है, जबकि परिष्कृत उत्पाद अधिकतम 21 दिनों तक ही चल सकते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि पाकिस्तान के पास एक दिन के लिए भी रणनीतिक पेट्रोल भंडार उपलब्ध नहीं है। इसके विपरीत भारत के पास साठ से सत्तर दिनों का भंडार है और मजबूत विदेशी मुद्रा स्थिति के कारण वह इस संकट का सामना अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से कर पा रहा है।
इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पर निर्भरता के कारण पाकिस्तान के पास नीतिगत लचीलापन भी सीमित है। पाकिस्तान सरकार को पेट्रोल और डीजल पर कर लगाने पड़े हैं, हालांकि बढ़ती कीमतों के दबाव में डीजल पर कर शून्य कर दिया गया और उसका बोझ पेट्रोल पर डाल दिया गया। साथ ही मोटरसाइकिल चालकों को लक्षित सब्सिडी देने की कोशिश भी की गई। इसके बावजूद हालात इतने बिगड़ गए हैं कि पेट्रोल की कीमतें चार सौ पचासी रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गईं हैं जिसके बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। बाद में सरकार को कीमतों में अस्सी रुपये प्रति लीटर की कटौती करनी पड़ी, लेकिन इससे जनता की परेशानी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
यह पूरा घटनाक्रम एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या पाकिस्तान अपनी क्षमता से अधिक बड़ा खेल खेलने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ वह खुद को शांति का दूत बताता है, तो दूसरी तरफ उसकी आंतरिक कमजोरियां और असफल कूटनीतिक प्रयास उसकी साख को लगातार कमजोर कर रहे हैं। यह स्थिति एक कड़वी सच्चाई सामने लाती है कि वैश्विक मंच पर दिखावा ज्यादा देर तक नहीं टिकता। जब हकीकत सामने आती है तो सबसे पहले मुखौटा ही गिरता है। इस्लामाबाद में जो हुआ, वह इसी सच्चाई का ताजा उदाहरण है, जहां कूटनीतिक महत्वाकांक्षा और आर्थिक वास्तविकता के बीच का अंतर साफ तौर पर उजागर हो गया है।