Himachal Se: Padmini Ekadashi Vrat Katha: 27 मई को पद्मिनी एकादशी का व्रत रखा जाएगा। यह एकादशी कई गुना अधिक पुण्यकारी और फलदायी माना जाता है। पद्मिनी एकादशी 3 साल में एक बार आती है। दरअसल, अधिकमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आने वाली एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहते हैं। इसे पुरुषोत्तमी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से निसंतान दंपतियों को संतान का सुख प्राप्त होता है। इसके साथ ही व्यक्ति के सभी दुख और कष्ट दूर हो जाते हैं। अगर आप भी पद्मिनी एकादशी का व्रत करने वाले हैं तो इस कथा का पाठ जरूर करें वरना आपको पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होगा।

3 साल में एक बार आती पद्मिनी एकादशी, जरूर पढ़ें यह व्रत कथा, तभी मिलेगा पूजा का पूर्ण फल​
3 साल में एक बार आती पद्मिनी एकादशी, जरूर पढ़ें यह व्रत कथा, तभी मिलेगा पूजा का पूर्ण फल​

पद्मिनी एकादशी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार,त्रेतायुग में हैहय वंश में कृतवीर्य नाम के एक परम प्रतापी राजा राज करते थे। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। राजा के पास सब कुछ था—वैभव, सेना, धन और मानसम्मान; लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान न होने के कारण राजा और उनकी रानियां हमेशा अत्यंत दुखी और चिंतित रहते थे।

कृतवीर्य की एक हजार ​पत्नियां थीं। लेकिन उनमें से किसी से भी कोई संतान न थी। उनके बाद महिष्मती पुरी का शासन संभालने वाला कोई न था। इसको लेकर राजा परेशान थे। उन्होंने हर प्रकार के उपाय कर लिए लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। इसके बाद राजा कृतवीर्य ने तपस्या करने का निर्णय लिया। उनके साथ उनकी एक पत्नी पद्मिनी भी वन जाने के लिए तैयार हो गईं। राजा ने अपना पदभार मंत्री को सौंप दिया और योगी का वेश धारण कर पत्नी पद्मिनी के साथ गंधमान पर्वत पर तप करने निकल पड़े।

पद्मिनी और कृतवीर्य ने हजारों साल तक तप किया, फिर भी पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं हुई। रानी पद्मिनी ने जब राजा को निराश देखा तो वे सती अनुसूया के पास गईं। रानी ने आंसुओं के साथ अपनी व्यथा सुनाई और पूछा, ‘हे माता! हमारे तप और त्याग में क्या कमी रह गई कि ईश्वर हमें संतान सुख नहीं दे रहे? कृपा कर मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे भगवान प्रसन्न हों।’ माता अनुसूया ने पद्मिनी से मलमास के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि मलमास 32 माह के बाद आता है और सभी मासों में महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने कहा कि अधिक मास में आने वाली एकादशी भगवान पुरुषोत्तम को अत्यंत प्रिय है। यदि तुम इस मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विधिविधान से व्रत करोगी तो भगवान विष्णु तुम्हें अवश्य ही एक ऐसा पुत्र देंगे जो सर्वगुण संपन्न और अजेय होगा।
 
माता अनुसूया के कहे अनुसार, रानी पद्मिनी ने अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी आने पर अत्यंत श्रद्धा और कठोर नियमों के साथ व्रत रखा। उन्होंने निर्जला रहकर भगवान विष्णु की पूजा की और रात्रि जागरण किया। रानी के इस निश्छल और कठिन व्रत से भगवान पुरुषोत्तम अत्यंत प्रसन्न हुए। वे प्रकट हुए और बोले, ‘हे कल्याणी! मैं तुम्हारे इस व्रत से अत्यंत प्रसन्न हूं। मांगो, क्या वरदान चाहती हो?’ रानी पद्मिनी ने हाथ जोड़कर कहा, ‘हे प्रभु! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरे स्वामी की इच्छा पूरी कीजिए।’

भगवान विष्णु ने राजा से वरदान मांगने को कहा। राजा कृतवीर्य ने कहा, ‘हे जगत के पालनहार! मुझे एक ऐसा पुत्र प्रदान करें जो तीनों लोकों में अजेय हो, जिसे देवता, मनुष्य या असुर कोई भी पराजित न कर सके और जो केवल आपके ही किसी स्वरूप द्वारा जीता जा सके।’ भगवान विष्णु ‘तथास्तु’ कहकर अंतर्ध्यान हो गए। व्रत के प्रभाव से समय आने पर रानी पद्मिनी ने एक अत्यंत ओजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम कार्तवीर्य अर्जुन रखा गया। वह बालक आगे चलकर इतना शक्तिशाली और पराक्रमी राजा बना कि उसने अपनी हजार भुजाओं के बल पर पूरे विश्व को जीत लिया।