
What is VitalID Technology: आज के समय में हम हर दिन दर्जनों ऐप्स और वेबसाइट का इस्तेमाल करते हैं. जिनके पासवर्ड याद रखना किसी सिरदर्द से कम नहीं होता है. फिंगरप्रिंट और फेस-आईडी ने इस परेशानी को जरूर थोड़ा कम किया है लेकिन अभी भी डेटा चोरी और प्राइवेसी का खतरा बना रहता है. ऐसे में वैज्ञानिकों ने सुरक्षा की एक ऐसी तकनीक तैयार की है जो सीधे आपके हड्डियों और धड़कनों से जुड़ी होगी.
वैज्ञानिकों ने VitalID नाम की एक कमाल की टेक्नोलॉजी तैयार की है जो आपके लॉग-इन करने का तरीका पूरी तरह से बदल देगी. अब आपको न तो कुछ टाइप करना होगा और न ही कैमरे के सामने चेहरा दिखाना होगा. आपके सिर के अंदर होने बारीक हलचलों, जो आपकी सांसों और दिल की धड़कन से पैदा होते हैं अब आपकी डिजिटल पहचान बनेंगे. इस टेक्नोलॉजी को न सिर्फ पासवर्ड याद करने के झंझट को खत्म करने वाली बल्कि सुरक्षा के मामले में इसे हैक करना लगभग नामुमकिन माना जा रहा है.
क्या है यह VitalID तकनीक?
न्यू जर्सी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, टेम्पल यूनिवर्सिटी और टेक्सास A&M यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने एक साथ मिलकर ये स्टडी की है, जिसमें यह तकनीक तैयार की गई है. यह टेक्नोलॉजी हमारे शहीर के अंदर होने वाले बारीक हलचल जैसे सांस लेने और दिल की धड़कन से पैदा होने वाले वाइब्रेशंस का इस्तेमाल करती है. ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। ये कंपन गर्दन से होते हुए हमारे सिर तक पहुंचते हैं.
बता दें कि हर इंसान की हड्डियों की बनावट और टिश्यू यानी ऊतक अलग-अलग होते हैं, इसलिए इन वाइब्रेशंस का पैटर्न भी हर व्यक्ति के लिए उंगलियों के निशान की तरह की पूरी तरह से यूनिक होता है.
नए हार्डवेयर की भी नहीं होगी जरूरत
इस तकनीक की सबसे खास बात यह है कि इसके लिए आपको कोई नया गैजेट भी नहीं खरीदना होगा. रटगर्स यूनिवर्सिटी की कंप्यूटर इंजीनियर यिंगयिंग चेन के मुताबिक यह तकनीक पूरी तरह से सॉफ्टवेयर आधारित है. आज के एक्सटेंडेड रियलिटी (XR) हेडसेट जैसे Meta Quest या Oculus में पहले से ही मोशन सेंसर लगे होते हैं जो इन बारीक कंपनों को पकड़ सकते हैं.
कोई नहीं कर सकता हैक
रिसर्चर्स ने 52 लोगों पर 10 महीनों तक इसका टेस्ट किया. जिसके रिजल्ट में पाया गया कि VitalID ने 95% से ज्यादा सटीकता के साथ सही यूजर की पहचान की और 98% मामलों में दूसरे लोगों को रोक दिया. सबसे अच्छी बात यह है कि अगर कोई आपकी सांस लेने के तरीके को भी नकल करे तब भी वह आपकी हड्डियों के माध्यम से होने वाले वाइब्रेशन को कॉपी नहीं कर सकता.
क्यों है इसकी जरूरत?
जैसे-जैसे हम डिजिटल दुनिया में वर्चुअल रियलिटी और मेटावर्स में आगे बढ़ रहे हैं वहां हाथों के इशारों से पासवर्ड टाइप करना काफी थकाऊ काम हो जाता है. VitalID बैकग्राउंड में चुपचाप काम करता है जिससे यूजर को बिना किसी रुकावट के एक सेफ एक्सपीरियंस मिलता है. फिलहाल इस तकनीक का प्रोविजनल पेटेंट फाइल कर दिया गया है. हालांकि यह अभी मार्केट में उपलब्ध नहीं है, लेकिन भविष्य में यह हमारे डिजिटल जीवन को पूरी तरह से सेफ और आसान बना सकती है.






