: दिवाली का त्योहार देशभर में रोशनी, मिठाइयों और आतिशबाजी के साथ मनाया जाता है, लेकिन राजस्थान के पाली जिले के एक गांव में इस पर्व का रंग कुछ अलग ही नजर आता है। यहां गोवर्धन पूजा के दिन बैलों को दौड़ाने की अनोखी परंपरा निभाई जाती है। बैलों के सींगों पर नारियल, मिठाइयों और नकद रुपयों से भरी पोटली बांधी जाती है। इसके बाद उन्हें दौड़ाया जाता है और गांव के युवा इनाम हासिल करने के लिए उनके पीछे दौड़ पड़ते हैं। यह परंपरा जितनी रोमांचक है, उतनी ही जोखिम भरी भी है।

पाली जिले के रायपुर मारवाड़ उपखंड स्थित कानूजा गांव में यह आयोजन हर साल ग्रामीणों के उत्साह और पारंपरिक रीतिरिवाजों के साथ होता है। आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग इसे देखने पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है और गांव की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है।

सुबह से शुरू हो जाती है आयोजन की तैयारी

गोवर्धन पूजा के दिन सुबह करीब 7 बजे से ही गांव की मुख्य चौपाल पर चहलपहल शुरू हो जाती है। पशुपालक अपने बैलों के साथसाथ गांव में घूमने वाले बेसहारा बैलों को भी यहां लेकर पहुंचते हैं। इसके बाद बैलों को सजानेसंवारने का सिलसिला शुरू होता है। बैलों के शरीर पर मेहंदी और लाल रंग लगाया जाता है। फिर लाल और केसरिया कपड़ों से एक पोटली तैयार की जाती है, जिसमें नारियल, नकद रुपये और मिठाइयां रखी जाती हैं। इस पोटली को मजबूती से बैलों के सींगों पर बांध दिया जाता है। ये खबर आप हिमाचल से में पढ़ रहे हैं। यही पोटली इस आयोजन का मुख्य आकर्षण और इनाम होती है।

पटाखों की आवाज से दौड़ने लगते हैं बैल

पोटली बांधने के बाद गांव के मुख्य रास्ते पर पटाखे और आतिशबाजी की जाती है। धमाकों और शोर के बीच बैल बिदककर दौड़ने लगते हैं। इसी दौरान गांव के युवा उनके पीछे दौड़ते हैं। कोशिश होती है कि दौड़ते हुए बैल के सींगों से बंधी इनाम की पोटली निकाल ली जाए। इस दौरान युवाओं के बीच इनाम हासिल करने की होड़ लग जाती है। हालांकि, भड़के हुए बैलों के करीब जाना और उनके सींगों से पोटली निकालना आसान नहीं होता। इस वजह से आयोजन में चोट लगने और हादसे का खतरा भी बना रहता है। कई बार युवा गिरकर या बैलों की टक्कर से घायल हो जाते हैं। इसके बावजूद परंपरा के प्रति उत्साह उन्हें मैदान में उतरने के लिए प्रेरित करता है।

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छतों से आयोजन देखते हैं महिलाएं और बुजुर्ग

इस आयोजन में खतरे को देखते हुए गांव की महिलाएं, युवतियां और बुजुर्ग आमतौर पर घरों की छतों से इसे देखते हैं। वहीं, मैदान में मौजूद युवाओं का उत्साह और ग्रामीणों की आवाज से पूरा गांव गूंज उठता है। इस आयोजन में रावत समाज के साथ अन्य जातियों के लोग भी शामिल होते हैं। ग्रामीण इसे आपसी मेलजोल और भाईचारे का प्रतीक मानते हैं। यही वजह है कि हर साल बड़ी संख्या में लोग इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं।

400 साल पुरानी परंपरा, 60 साल से लगातार आयोजन का दावा

कानूजा गांव के बुजुर्गों और स्थानीय लोगों के अनुसार, इस परंपरा का इतिहास काफी पुराना है। कुछ ग्रामीण इसे करीब 400 साल पुरानी रस्म बताते हैं। वहीं, उनका कहना है कि मौजूदा संगठित स्वरूप में इस आयोजन को पिछले 60 वर्षों से भी अधिक समय से लगातार किया जा रहा है। गांव के लोगों के लिए यह सिर्फ मनोरंजन या इनाम जीतने का खेल नहीं, बल्कि पूर्वजों से मिली सांस्कृतिक विरासत है, जिसे वे पीढ़ीदरपीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि, बैलों को पटाखों से डराकर दौड़ाने और उनके करीब जाकर इनाम निकालने की इस परंपरा में पशुओं और युवाओं, दोनों की सुरक्षा को लेकर सवाल भी उठते हैं।

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